सुनील दत्त पांडेय

11 सितंबर 1893 को अमेरिका के शिकागो के सभागार में स्वामी विवेकानंद का ऐतिहासिक आध्यात्मिक उद्बोधन की प्रेरणा स्थली उत्तराखंड देवभूमि रही है। स्वामी जी के शिकागो उद्बोधन में उन्हें पूरी दुनिया मैं एक विशिष्ट पहचान दी थी और स्वामी विवेकानंद दुनिया में छा गए थे। शिकागो उद्बोधन के पीछे जिस आध्यात्मिक मूल ज्ञान तत्व की जो शक्ति थी, वह उन्हें देवभूमि उत्तराखंड से ही मिली। यह ज्ञान उन्हें उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के नैनीताल से बद्रीकाश्रम की ओर जाते वक्त कोसी नदी के तट पर पीपल के पेड़ के नीचे उस वक्त मिला जब वे ध्यानमग्न थे।

स्वामी विवेकानंद के लिए देवभूमि उत्तराखंड साधना स्थली के साथ-साथ उनकी कर्मस्थली भी रही। स्वामी विवेकानंद उत्तराखंड में 1890 से 1901 तक 11 साल में कई दफा आए। उन्होंने देवभूमि उत्तराखंड के कई देवालयों तथा घने जंगलों में कठोर तपस्या की। उन्होंने देवभूमि उत्तराखंड के लोगों के कष्ट को महसूस किया और यहां कठोर तप कर रहे साधु-संतों की कठिनाइयों से वे रूबरू हुए। इसलिए उन्होंने यहां कई मठ मंदिरों तथा चिकित्सालयों की स्थापना की। जब स्वामी विवेकानंद हरिद्वार से होते हुए ऋषिकेश पहुंचे तो उन्होंने रास्ते में कई गरीबों और साधु-संतों को इलाज के अभाव में कठिन कष्ट सहते हुए देखा तो उनका संन्यासी हृदय द्रवित हो गया। स्वामी जी ने अपने दो शिष्य स्वामी कल्याणानंद और स्वामी निश्चलानंद को हरिद्वार में भेजा और एक धर्मार्थ रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम एवं चिकित्सालय के तौर पर 1901 में करवाई। जिसमें संतों और गरीबों के लिए निशुल्क चिकित्सा की व्यवस्था की गई।

स्वामी विवेकानंद के अपने लंदन प्रवास में आल्पस की खूबसूरत पहाड़ियों को देखकर उनके मन में देवभूमि उत्तराखंड में एक आश्रम की स्थापना का विचार आया। उनके इस विचार को उनके अनुयायियों स्वामी स्वरूपानंद और कैप्टन सेवियर तथा उनकी पत्नी ने 19 मार्च 1899 में कुमाऊं मंडल के चंपावत जिले के मायापुरी में अद्घैत आश्रम की स्थापना कर साकार किया। स्वामी जी कुमाऊं मंडल के चंपावत के जिन जंगलों से होकर देवभूमि के दर्शन करने के लिए निकले थे और जिन भवनों में वे रुके थे उन भवनों को संग्रहालय के रूप में उत्तराखंड सरकार संरक्षित करने की दिशा में कार्य कर रही है। चंपावत जिले के जिलाधिकारी एसएन पांडे ने बताया कि एक भवन को चिन्हित किया गया है और खंडहर नुमा इस भवन को संरक्षित करने के लिए जिला प्रशासन अपनी ओर से कार्य कर रहा है।

बद्रीनाथ में 1890 में भीषण अकाल पड़ने के कारण स्वामी विवेकानंद श्रीनगर के रास्ते टिहरी होते हुए देहरादून पहुंचे थे। देहरादून के राजपुर में बावड़ी के प्राचीन शिव मंदिर में अपने गुरु भाई तुर्यानंद को तपस्या में लीन देखकर स्वामी जी शिव मंदिर में ही रुक गए। करीब एक पखवाड़े तक अपने गुरु भाई के साथी एक कक्ष में तपस्या की। और उनके शिष्यों ने किशनपुर राजपुर रोड देहरादून में स्वामी रामकृष्ण आश्रम की स्थापना की।

रामकृष्ण मिशन सेवाश्रम एवं चिकित्सालय, कनखल, हरिद्वार, उत्तराखंड के सचिव स्वामी नित्यशुद्धानंद महाराज बताते हैं कि स्वामी विवेकानंद ने देवभूमि उत्तराखंड को अपनी कर्मभूूमि के साथ आध्यात्मिक भूमि भी बनाया और उन्होंने रोगी नारायण सेवा का जो सिद्धांत प्रतिपादित किया था। उसे हर साल रामकृष्ण मिशन मठ के समस्त संन्यासी, चिकित्सक और कर्मचारी उनके जन्मदिन के दिन रोगियों की पूजा करके मनाते हैं। मठ के समस्त चिकित्सालय में संतो और गरीबों का निशुल्क इलाज किया जाता है। स्वामी विवेकानंद आधुनिक भारत के निर्माण के प्रेरणा स्रोत हैं। उनके विचार हमेशा हर पीढ़ी को प्रेरित करते रहेंगे।

स्वामी विवेकानंद पर शोध कार्य करने वाली अध्यात्म से जुड़ी हुई डॉ राधिका नागरथ का कहना है कि 1890 में स्वामी विवेकानंद बंगाल से साधना करने के लिए देवभूमि उत्तराखंड आए और उन्हें यहां एक अलौकिक आध्यात्मिक ज्ञान का अहसास हुआ। नैनीताल क्षेत्र में कोसी नदी के तट पर पीपल के एक पेड़ के नीचे ध्यान मग्न हो गए। ध्यान टूटने पर उन्होंने अपने साथी गंगाधर से कहा कि आज इस वृक्ष के नीचे मेरे जीवन की एक प्रमुख समस्या का हल हुआ है । उन्होंने अणु ब्रह्मांड और विश्व ब्रह्मांड की एकात्मकता का अनुभव किया। इस विश्व में जो कुछ भी विद्यमान है। वही इस देह में है। इस सिद्धांत को स्वामी विवेकानंद द्वारा शिकागो के भाषण में 11 सितंबर 1893 को व्याख्यान का मुख्य विषय बनाया गया था जिसने पूरे विश्व को हिला कर रख दिया।