हार ने रार बढ़ा दी है राजस्थान में कांग्रेस के भीतर। छह महीने भी तो नहीं बीते थे कांग्रेस को सूबे की सत्ता संभाले। लेकिन लोकसभा चुनाव में 2014 की ही पुनरावृत्ति हो गई। सारी पच्चीस सीटें झटक ली फिर भाजपा ने। जबकि कांग्रेस को कम से कम चार-पांच सीट जीतने का तो पक्का भरोसा था। अलवर और अजमेर की लोकसभा सीटों के उपचुनाव तो कांग्रेस ने वसुंधरा के जमाने में ही जीते थे। और तो और जोधपुर में भी कांग्रेस के जादूगर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत कोई जादू नहीं दिखा पाए। जहां उनके बेटे वैभव गहलोत का गजेंद्र सिंह शेखावत से था मुकाबला। सीटें तो हारी हीं, जीत का फासला भी बढ़ गया। राजस्थान के नतीजों से राहुल गांधी भी हैरान रह गए। तभी तो पार्टी की कार्यसमिति की बैठक में अशोक गहलोत पर तंज कसा कि वे पुत्रमोह में फंसे रहे और पार्टी का बेड़ा गर्क हो गया। इस एक टिप्पणी ने ही अशोक गहलोत के सियासी भविष्य पर सवालिया निशान लगा दिया है।

कई मंत्री और विधायक हार के लिए जवाबदेही तय करने की मांग कर रहे हैं। मकसद परोक्ष रूप से गहलोत पर निशाना साधना ही है। सूबे में मोदी लहर का तो बेशक असर था पर कांग्रेस की बुरी गत गुटबाजी के कारण भी हुई। गहलोत और सचिन पायलट दोनों के अपने खेमे हैं। कांग्रेस के दो सौ में 99 ही विधायक ठहरे। बसपा के छह और बारह निर्दलियों की मदद से चल रही है गहलोत सरकार। चुनाव से पहले ही अटकलें शुरू हो गई थी कि नतीजे खराब आए तो सचिन पायलट का गुट आक्रामक तेवर दिखाएगा। खासकर जोधपुर की हार ने गहलोत को रक्षात्मक स्थिति में ला दिया है। पार्टी के आम कार्यकर्ता विधायकों और मंत्रियों की करतूतों का खमियाजा भी बता रहे हैं। जिन्होंने जनहित की चिंता छोड़ तबादला उद्योग में ध्यान लगा खूब माल कमाया। नतीजतन नाराज कार्यकर्ता सक्रिय नहीं हुए।

चालबाजी पलटू की
रमेश पोखरियाल निशंक अपने विरोधियों पर भारी पड़े। सियासी विरोधी कांग्रेस को तो उन्होंने चुनाव में दूसरी बार हरा दिया लेकिन पार्टी के भीतर अपना विरोध करने वालों को केंद्र में मंत्री बन कर दिखा दिया कि दिल्ली में उनके पांव जमे हैं। निशंक उत्तराखंड में लंबे समय तक मंत्री थे और फिर मुख्यमंत्री भी बने। पार्टी में त्रिवेंद्र सिंह रावत और मदन कौशिक की चलती तो निशंक को टिकट भी नहीं मिल पाता। पर अमित शाह किसी के प्रभाव में नहीं आए। साफ है कि एक तो उत्तराखंड को दूसरी बार पांचों सीटें झोली में डालने का ईनाम देना था दूसरी तरफ सूबे के असंतुष्ट ब्राह्मणों को यह संदेश दे दिया कि मुख्यमंत्री राजपूत है तो ब्राह्मण केंद्र में कैबिनेट मंत्री।