Syed Ali Shah Geelani Dies: जम्मू कश्मीर में लंबे समय तक अलगाववादी मुहिम की अगुवाई करने वाले, पाकिस्तान समर्थक सैयद अली शाह गिलानी (Syed Ali Shah Geelani) का बुधवार देर रात श्रीनगर में निधन हो गया। गिलानी काफी दिनों से बीमार चल रहे थे। अलगाववादी नेता (Syed Ali Shah Geelani) के निधन पर पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से लेकर क्रिकेटर तक ने शोक जाहिर किया है। साथ ही पाकिस्तान में एक दिन के राजकीय शोक का भी ऐलान किया है। गिलानी एक दशक से भी ज्यादा समय से अपने ही घर में नजरबंद थे। जम्मू कश्मीर में धारा 370 हटाने के बाद से ही गिलानी और हुर्रियत के कई नेताओं के खिलाफ NIA की जांच चल रही है।
पाकिस्तान में एक दिन झुका रहेगा झंडा: गिलानी के निधन पर पाकिस्तानी के प्रधानमंत्री इमरान खान ने शोक व्यक्त करते हुए एक दिन के शोक का ऐलान किया है। पाक PM ने ट्वीट कर कहा, ‘पाकिस्तान में एक दिन का शोक रहेगा और झंडे को आधा झुका दिया जाएगा।’
अभिषेक मनु सिंघवी ने लगाई कुरैशी को लताड़: पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी ने गिलानी (Syed Ali Shah Geelani) को कश्मीर आंदोलन का मशालवाहक करार देते हुए दुख जाहिर किया। कुरैशी के अनुसार, गिलानी ने कश्मीरियों के अधिकारियों के लिए लंबे समय तक लड़ाई लड़ी थी, उन्होंने कहा कि गिलानी को शांति मिले और उनकी आजादी का सपना साकार हो। इस पर कांग्रेसी नेता अभिषेक मनु सिंघवी ने लताड़ लगाते हुए कहा कि मिस्टर कुरैशी, निर्दोष कश्मीरियों की हत्या के लिए आपका देश और आपके नेता इतिहास में दर्ज होंगे।
इंटरनेट सेवा निलंबित: गिलानी की अंतिम यात्रा में बड़ी संख्या में लोगों के जुटने का अनुमान है, लिहाजा घाटी में सुरक्षा व्यवस्था को और मुस्तैद किया जा रहा है, इंटरनेट सेवा निलंबित कर दी गई है। सूत्रों के अनुसार, यहां कर्फ्यू का भी ऐलान किया जा सकता है।
गिलानी के बारे में: सयैद शाह गिलानी (Syed Ali Shah Geelani) ने कॉलेज की पढ़ाई पाकिस्तान के लाहौर से की थी वह तीन बार सोपोर से विधायक चुने गए थे। उन्होंने जून 2020 में हुर्रियत छोड़ दिया था। वह हर्ट, किडनी, शुगर समेत कई बीमारियों से पीड़ित थे। पिछले कई वर्षों से खराब स्वास्थ्य के कारण वह कम सक्रिय थे। गिलानी को पाकिस्तान अपने सर्वोच्च नागरिक सम्मान से नवाज चुका है।
शिक्षक के तौर पर की थी शुरुआत: 29 सितंबर 1929 को बांदीपोर के जुर्मांज गांव में जन्में गिलानी अलगाववादी नेताओं का चेहरा थे। उन्होंने अपने प्रोफेशनल जीवन की शुरुआत एक शिक्षक के तौर पर की थी। इसी दौरान उनका संपर्क नेशनल कॉन्फ्रेंस के नेता मौलाना मोहम्मद सईद मसूदी से हुआ। यहां से उनका झुकाव राजनीति की ओर हुआ था। लेकिन जल्दी ही वो जमात-ए-इस्लामी से जुड़ गए। यह संगठन नेशनल कॉन्फ्रेंस का समर्थक था और कश्मीर को विभाजन का अपूर्ण कार्य मानता था।
1972 में राजनीतिक जीवन की शुरुआत: 1972 में गिलानी ने चुनाव लड़ा और सक्रिय राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। वो तीन बार जम्मू कश्मीर के सोपोर से विधायक रहे। गिलानी कश्मीर मामले का सशस्त्र हल खोजने के पक्षधर थे। 1993 में उन्होंने सात लोगों के साथ मिलकर हुर्रियत कॉन्फ्रेंस का गठन किया, जो कश्मीर के मसले को हल करने के लिए आतंकवाद के रास्ते को भी सही मानती थी। हालांकि उनकी पार्टी में 2003 में उस समय दो फाड़ हो गया, जब अमन पसंद हुर्रियत नेताओं ने सशस्त्र तरीके को गलत माना और अलग हो गए। 2004 में गिलानी ने भी जमात-ए-इस्लामी से दूरी बना ली और आतंकवाद की खिलाफत करने लगे थे। उन्होंने तहरीक-ए-हुर्रियत नाम से अपनी एक अलग राजनीतिक पार्टी भी बनाई थी।
मुशर्रफ के सुझाव को नकार दिया था: गिलानी ने कई मौकों पर यह स्पष्ट किया था कि वो संयुक्त राष्ट्र द्वारा तय तरीकों के जरिए कश्मीर मामले का हल खोजने के पक्षधर हैं। कई ऐसे अवसर भी आए जब उन्होंने इस मामले पर दिल्ली का साथ भी दिया। एक समय ऐसा भी आया जब गिलानी ने कश्मीर मामले पर मुशर्रफ के सुझाव को नकार दिया था।
