ज्योतिर्पीठ शंकराचार्य स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने योगी सरकार को अपने वकील के जरिए एक कानूनी नोटिस भेजा है। इस नोटिस में कहा गया है कि अगर माघ मेला प्रशासन अपना 19 जनवरी का नोटिस 24 घंटे के भीतर वापस नहीं लेता, तो उस स्थिति में सरकार और तमाम जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ अवमानना सहित अन्य कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
एबीपी न्यूज़ की रिपोर्ट के मुताबिक, कानूनी नोटिस में अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने आरोप लगाया है कि सरकार और अधिकारियों की ओर से उनकी प्रतिष्ठा, सम्मान और गरिमा को ठेस पहुंचाई गई है। नोटिस में यह भी तर्क दिया गया है कि प्रशासन ने जिस मुद्दे को उठाया है, वह मामला पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है। ऐसे में इस तरह की कार्रवाई अदालत की गरिमा को भी चुनौती देने के समान है।
नोटिस में यहां तक दावा किया गया है कि गोवर्धन मठ, पुरी के शंकराचार्य की ओर से कथित तौर पर एक जाली आवेदन दाखिल किया गया था। उसी आवेदन के आधार पर अदालत के सामने यह दावा किया गया कि अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की नियुक्ति को अस्वीकार किया जाए। उन्हीं तथ्यों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम आदेश पारित किया था। हालांकि, अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती का कहना है कि यह आदेश उनके लिए व्यावहारिक रूप से अप्रभावी रहा, क्योंकि उनका अभिषेक उससे पहले ही पूरा हो चुका था।
इससे पहले भी स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने 9 मार्च 2024 को सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दाखिल की थी। उस याचिका में उन्होंने वासुदेवानंद सरस्वती पर झूठे हलफनामे दाखिल करने का आरोप लगाया था। उनका कहना था कि गलत तथ्यों को पेश कर अदालत को गुमराह करने की कोशिश की गई।
अगर मौजूदा विवाद की बात करें, तो माघ महीने के दौरान मौनी अमावस्या के दिन प्रशासन ने शंकराचार्य के समर्थकों को स्नान करने से रोक दिया था। इस दौरान पुलिस के साथ धक्का-मुक्की की स्थिति भी पैदा हुई थी। इसके बाद प्रशासन ने 24 घंटे के भीतर जवाब मांगा था कि जब मामला पहले से सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, तो अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती अपने नाम के आगे ‘शंकराचार्य’ क्यों लगा रहे हैं।
पूरे विवाद के बाद स्वामी अभिमुक्तेश्वरानंद सरस्वती की ओर से योगी सरकार को करीब 8 पन्नों का विस्तृत कानूनी नोटिस भेजा गया है, जिसमें माघ मेला प्रशासन की कार्रवाई को गलत और दुर्भावनापूर्ण बताया गया है।
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