Sambhal Violence 2024: चंदौसी की एक अदालत ने नवंबर 2024 में जामा मस्जिद के सर्वे को लेकर हुई हिंसा के दौरान बिस्किट बेचने वाले मोहम्मद आलम को लगी गोली की चोटों के संबंध में तत्कालीन संभल सीओ अनुज चौधरी, संभल पुलिस स्टेशन के तत्कालीन इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर और अन्य पुलिसकर्मियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का आदेश देते हुए कहा कि पुलिस की तरफ से पेश की गई रिपोर्ट में संदेह है और यह मेडिकल रिपोर्टों और घटना की परिस्थितियों से मेल नहीं खाती है।

यह पूरी घटना 24 नवंबर 2024 को घटी थी, जब हैंडकार्ट पर बिस्किट बेचने वाले एक स्ट्रीट वेंडर आलम को गोली लगने से चोटें आईं। उनके पिता मोहम्मद यामीन ने अदालत में अपनी याचिका में कहा कि उनके बेटे को तीन गोलियां लगी हैं। यामीन ने कहा कि डर के मारे वे पहले शिकायत दर्ज नहीं करा पाए थे और अधिकारियों से संपर्क करने पर भी कोई सफलता न मिलने पर उन्होंने अदालत से एफआईआर दर्ज करने का निर्देश देने का आग्रह किया।

संभल पुलिस ने अपने जवाब में आरोपों से इनकार करते हुए कहा कि आलम के शरीर से निकाली गई गोली पुलिस द्वारा इस्तेमाल नहीं की गई थी। हालांकि, उन्होंने यह भी दावा किया कि आलम हिंसा से संबंधित एक मामले में वांछित था और जांच के दौरान उसका नाम सामने आया था। अदालत ने 9 जनवरी को अपने आदेश में कहा, “पीड़ित आलम से संबंधित मेडिकल डॉक्यूमेंट में दर्ज है कि उसे गोली लगने का घाव हुआ था और इसमें दंगे में पुलिस फायरिंग का भी जिक्र है, जिससे मामला संदिग्ध हो जाता है और घटना से संबंधित एक संज्ञेय अपराध होने का संकेत मिलता है।”

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आगरा की फोरेंसिक लैब भेजी गई थी गोली

पुलिस द्वारा पेश की गई रिपोर्ट के मुताबिक, आलम के शरीर से निकाली गई गोली को जांच के लिए आगरा की फोरेंसिक लैब भेजा गया था। एफएसएल की रिपोर्ट के मुताबिक, पुलिस ने बताया कि बरामद गोली 7.65 मिमी (32 बोर) की थी, जो पुलिस द्वारा इस्तेमाल नहीं की जाने वाली कैलिबर है। इसी आधार पर पुलिस ने दावा किया कि उपलब्ध सबूतों से यह साबित नहीं होता कि आलम पुलिसकर्मियों द्वारा चलाई गई गोली से घायल हुए थे।

हालांकि, अदालत ने कहा, “मेडिकल रिकॉर्ड से साफ है कि आलम की पीठ में दो और हाथ में एक गोली लगी थी। रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि उनके हाथ की हड्डी में फ्रैक्चर था, जिसके लिए संबंधित मेडिकल डॉक्यूमेंट और एक्स-रे रिपोर्ट रिकॉर्ड में मौजूद है। पुलिस ने खुद आलम के मेडिकल डॉक्यूमेंट रिकॉर्ड में रखे हैं और इलाज करने वाले डॉक्टरों के बयान भी दर्ज किए हैं। हालांकि, ये बयान मेडिकल रिपोर्ट और घटना की परिस्थितियों से मेल नहीं खाते हैं, जिससे पुलिस के बयान पर संदेह पैदा होता है और संज्ञेय अपराध होने का संकेत मिलता है।”

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सटीक तथ्य कोर्ट के सामने रखे जाएं

कोर्ट ने कहा, “यह जरूरी है कि मामले के सही और सटीक तथ्य कोर्ट के सामने रखे जाएं। रिकॉर्ड में मौजूद सामग्री से संज्ञेय अपराध का होना स्पष्ट होता है। संबंधित कानूनी प्रावधानों और मामले के तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, यह जरूरी और न्यायसंगत प्रतीत होता है कि जांच का आदेश दिया जाए।” हालांकि, कोर्ट ने संभल के एसएचओ को मामला दर्ज करने का आदेश दिया और सात दिनों के अंदर मामले के रजिस्ट्रेशन की डिटेल मांगी है। वहीं संभल के एसपी कृष्ण कुमार ने कहा कि वे अदालत के आदेश के खिलाफ इलाहाबाद हाई कोर्ट में अपील दायर करेंगे।

यामीन ने अपनी याचिका में कहा था कि उसका बेटा उस दिन सुबह 8 बजे काम पर जाने के लिए घर से निकला था। सुबह 8:45 बजे, वह जामा मस्जिद के पास थे और उन्होंने देखा कि वहां भारी भीड़ जमा है। जैसे ही आलम घटनास्थल के करीब पहुंचे, शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि तत्कालीन संभल सर्कल ऑफिसर अनुज चौधरी और संभल पुलिस स्टेशन के इंस्पेक्टर अनुज कुमार तोमर ने 15-20 अन्य पुलिसकर्मियों के साथ मिलकर अचानक भीड़ पर गोलियां चला दीं।

आलम ने अपनी ठेलागाड़ी छोड़कर भागने की कोशिश की, लेकिन दो गोलियां उसकी पीठ में और एक हाथ में लगीं। मौके पर मौजूद कुछ लोगों ने उसे बचा लिया। यास्मीन ने दावा किया कि वह अपने बेटे को मुरादाबाद और अलीगढ़ के अस्पतालों में ले गया, लेकिन उसे भर्ती नहीं किया गया। फिर वह अपने बेटे को मेरठ के एक अस्पताल में ले गया, जहां उसने अपना पता छिपाकर उसे भर्ती कराया। आलम का ऑपरेशन हुआ।

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