राजस्थान में जारी सियासी उठापटक जारी है। कुछ रिपोर्ट्स का कहना है कि यह कलह 2019 लोक सभा चुनाव के बाद से शुरू हो गई थी। ‘दैनिक भास्कर’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक मई 2019 के लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद ही कांग्रेस के भीतर कलह शुरू हो गई थी। तब कृषि मंत्री ने सादे कागज पर इस्तीफा लिखकर दे दिया था। वहीं तत्कालीन खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा और सहकारिता मंत्री ने खुले तौर पर विरोध जताते हुए बयान दिये थे।

कांग्रेस 2019 लोकसभा चुनाव में राज्य की 25 सीटें हार गई थी। इसके बाद से ही कांग्रेस के भीतर असंतोष बढ़ता गया था। खाद्य एवं नागरिक आपूर्ति मंत्री रमेश मीणा, सहकारिता मंत्री उदयलाल आंजना, पर्यटन मंत्री विश्वेंद्र सिंह ने ब्यूरोक्रेसी के बहाने आलाकमान पर निशाना साधा था। नेताओं का कहना था कि राज्य में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की कोई नहीं सुन रहा है। इसके कारण आम जनता परेशान हो रही है। मीणा ने आरोप लगाया था कि ब्यूरोक्रेट्स हावी हैं और उन पर अंकुश लगना चाहिए।

मीणा के अलावा सीनियर विधायक हेमाराम चौधरी ने पद से इस्तीफा देने की धमकी भी दी थी। रिपोर्ट के मुताबिक इन सब के बावजूद केंद्रीय आलाकमान की ओर से कभी गौर ही नहीं किया गया। ना ही किसी की सुनी गई इसीलिए कांग्रेस के भीतर की लड़ाई सड़क पर पहुंच गई है। देखते ही देखते राजस्थान कांग्रेस में दो गुट बन गए और अब लड़ाई हाई कोर्ट से होते हुए सुप्रीम कोर्ट तक जा पहुंची है।

लोकसभा चुनाव में मिली करारी हार के बाद कांग्रेस नेताओं और मंत्रियों की ओर से जारी बयानबाजी के बाद प्रदेश प्रभारी अविनाश पांडे ने सभी से अपील जारी की थी। पांडे ने सभी को बयानबाजी करने से परहेज करने की नसीहत दी थी। उन्होने कहा था कि हमारा संघर्ष जारी रहेगा। कांग्रेस कार्यकर्ता हताश और निराश ना हों। कांग्रेस ने चुनाव हारा है, लेकिन हमारा अदम्य साहस, हमारी संघर्ष की भावना और हमारे सिद्धांतों के प्रति हमारी प्रतिबद्धता पहले से ज्यादा मजबूत है।