पुलिस आयुक्त राकेश अस्थाना ने जिन इंस्पेक्टरों को एसीपी (सहायक पुलिस आयुक्त) बनाकर काम करने कहा था, उन्हें अभी तक स्थायी का तमगा नहीं मिला उन पर अब दोबारा इंस्पेक्टर के तौर पर काम करने का निर्देश मिल रहा है।

कहने का मतलब यह है कि, जिन थानेदार इंस्पेक्टरों को हवा में प्रमोशन देकर ऊंचे पद पर सजा दिया गया था, वे तब तक कानूनी रूप से उस पद के हकदार नहीं बन सकते हैं, जब तक कि उनकी पदोन्नति पर केंद्रीय गृह मंत्रालय की मुहर न लग जाए। लिहाजा जो संबंधित थानेदार-इंस्पेक्टर तब प्रमोशन पाकर खुशी से फूले नहीं समा रहे थे, अब वे ही बिचारे, मजलूम और खुद को बेबस समझ रहे हैं।

मेहनत बेकार गई

दिल्ली नगर निगम में आम आदमी पार्टी और भाजपा की लगातार चल रहे रार से निगम अधिकारी खुद परेशान हैं। बेदिल को एक अधिकारी ने बताया कि पूरी रात जागने के बाद सुबह पता चला की मेहनत बेकार गई और महापौर साहिबा के आदेश पर अदालत ने रोक लगा दी। तब भला रात काली करने का क्या मतलब हुआ? दरअसल, स्टैंडिंग कमेटी के चुनाव के लिए कई पार्षदों को अपनी सीट पर सोते देखा गया. मेयर डा शैली ओबेराय ने साफ कर दिया था कि चाहे पूरी रात गुजर जाए या सुबह हो जाए, स्टैंडिंग कमेटी के सदस्यों का चुनाव कराकर ही रहेंगी।

कुछ नहीं बदला

ग्रेटर नोएडा प्राधिकरण में कुछ महीनों से विभिन्न मामलों की शिकायतों का जो अंबार लगता चला जा रहा है, उसके आगे जांच प्रक्रिया पूरी तरह से विफल साबित हो रही है। संविदा कर्मियों की नियुक्ति घोटाले की जांच के बाद काफी संख्या में काम पर लगे कर्मियों को नौकरी से निकाले जाने का आदेश सुनाया गया। इस आदेश को प्रिंट, इलेक्ट्रानिक समेत सोशल मीडिया पर प्रसारित किया गया। लेकिन वास्तविकता में कुछ बदला ही नहीं।

जिन कर्मियों को नौकरी से हटाया जाना था, उनमें से अधिकांश वहीं अब भी काम कर रहे हैं। जबकि कुछ को नए संविदाकार के रूप में वहीं काम फिर से दिया गया है, जिसे वे जांच से पहले कर रहे थे। फर्जी नियुक्ति या गलत नियुक्ति के खिलाफ आवाज उठाने वाले अब जांच के बाद हुए आदेश के अनुपालन की जांच की मांग कर रहे हैं। दीगर है कि ये सिलसिला यूं ही चलता आया है और आगे भी इसी तरह चलते रहने की संभावना है।

‘विंटेज’ में झलका दर्द

दिल्ली में एक लंबे समय बाद पुरानी गाड़ियां (विंटेज) सड़कों पर दौड़ती नजर आई। सड़कों पर इन गाड़ियों को देखकर लोगों की नजर इन गाड़ियों पर टिक गई। इन गाड़ियों की आड़ में 15 साल पुरानी गाड़ियों के वाहन चालक अपने दुख को जनता के बीच रखते नजर आए। जैसे ही इन गाड़ियों की तस्वीरें उपराज्पयाल के साथ सोशल मीडिया पर आनी शुरू हुई तो सार्वजनिक वाहनों के मालिक अपनी पुरानी गाड़ियों के लिए राहत मांगते नजर आए। इनका सवाल भी वाजिब था जब 15 साल पुरानी गाड़ी पर दिल्ली में रोक है तो ये गाड़ियां सड़कों पर कैसे चली।
-बेदिल