मीना
हमारे आसपास के बाजारों की जगह अब आॅनलाइन ऐप लेने लगे हैं। हाल ही में हुए एसोचैम के एक अध्ययन में बताया गया कि इस साल 12 करोड़ उपभोक्ताओं के मोबाइल से खरीदारी करने की संभावना है। अध्ययन से पता चला है कि पिछले साल 10.8 करोड़ उपभोक्ताओं ने मोबाइल से खरीदारी की थी। क्रीटेओ मार्केटिंग कंपनी की ओर से 2017 में एक सर्वे किया गया था जिसमें बताया गया था कि 80 फीसद लोगों का मानना है कि वे आॅनलाइन खरीदारी से संतुष्ट और सुरक्षित महसूस करते हैं। सर्वे में बताया गया कि फैशन 88 फीसद, इलेक्ट्रॉनिक 78 फीसद, स्वास्थ्य और ब्यूटी 54 फीसद आदि वे उत्पाद हैं जो आॅनलाइल ऐप से अधिक खरीदे जाते रहे हैं। इन दो सालों के आंकड़ों से यह जाहिर होता है कि साल-दर-साल ऐप से खरीदारी बढ़ रही है। मिंत्रा, फ्लिपकार्ट और एमेजॉन जैसे ऐप से सामान खरीदने वालीं शालिनी का कहना है कि मैं अक्सर ऐप आधारित कंपनियों से सामान खरीदती हूं। इससे समय की बचत तो होती ही है साथ ही लोगों को अपनी पसंद की चीजें बिना किसी शारीरिक मेहनत के मिल जाती हैं।
पांडव नगर में रहने वाले अनुज मिश्र 2013 से ऐप से अपना रोजमर्रा का सामान खरीदते आ रहे हैं। वे जब किसी को कोई उपहार देते हैं तो ऐप आधारित कंपनी से ही खरीदते हैं। वहीं, दिल्ली विश्वविद्यालय के छात्र उज्ज्वल सागर ने बताया कि ऐप पर कोई भी चीज कई किस्मों में मिल जाती है। दुकान-दुकान भटकना नहीं पड़ता है। फूड डिलिवरी ऐप से खाना मंगाने की मांग इतनी बढ़ गई है कि सितंबर में फूडपांडा ने 60 हजार डिलिवरी ब्वॉयज के लिए नियुक्ति निकालने की घोषणा की थी। जोमाटो में डिलिवरी बॉय का काम करने वाले रवि का कहना है कि उनके पास एक दिन में लगभग 20 आॅर्डर आ जाते हैं। कौन सा आॅर्डर कहां से आ रहा है इसकी जानकारी भी हमें रनरअप ऐप से मिलती है। पटपड़गंज के डॉमिनोज में काउंटर संभालने वाले बबलू का कहना है कि दिनभर में लगभग 300 आॅर्डर आते हैं जिनमें से लगभग 200 आॅर्डर ऐप के होते हैं।
पूर्वी दिल्ली में सलीम की मोबाइल की दुकान है। उनका कहना है कि आॅनलाइन बाजार से हम जैसे छोटे दुकानदारों पर असर पड़ रहा है। अब लोग हमसे कम ही फोन रिचार्ज कराते हैं। तो वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता श्रुति का मानना है कि वे ऐप के माध्यम से सामान खरीदना पसंद नहीं करती हैं क्योंकि वहां से खरीदे गए सामान का भरोसा नहीं होता है।

