मीना

दिल्ली सरकार ने सभी सरकारी स्कूलों में शिक्षकों को 15 हजार रुपए तक का टैबलेट खरीदना अनिवार्य कर दिया है। ऐसा नहीं करने पर संबंधित शिक्षकों के खिलाफ कार्रवाई करने के निर्देश दिए गए हैं। सरकार के इस आदेश के खिलाफ लोक शिक्षक मंच ने शिक्षा मंत्री मनीष सिसोदिया को खुला पत्र लिखा है। सरकार ने दिसंबर, 2018 में सभी शिक्षकों को टैबलेट खरीदने के लिए परिपत्र जारी किया था। जनवरी में सरकार की ओर से एक और परिपत्र जारी कर कहा गया कि सभी शिक्षक 15 जनवरी तक टैबलेट खरीद कर बिल जमा करा दें। इस दिनांक तक टैब नहीं खरीदे गए तो सरकार बिल का भुगतान नहीं करेगी और शिक्षकों के खिलाफ जरूरी कार्रवाई की जाएगी। इस आदेश के बाद शिक्षक व अन्य संगठनों ने विरोध करना शुरू कर दिया है।

लोक शिक्षक मंच ने पत्र लिखकर आदेश पर चिंता व्यक्त की है। उन्होंने पत्र में लिखा है कि किसी भी वस्तु की खरीद अनिवार्य करना असंवैधानिक है। शिक्षा विभाग की ओर से भी टैबलेट की आवश्यकता से संबंधित कोई ठोस कारण नहीं दिए गए हैं। मंच ने कहा है कि परिपत्र में यह भी स्पष्ट नहीं किया गया है कि टैबलेट नहीं खरीदने पर क्या कार्रवाई होगी। उनका कहना है कि अगर दिल्ली सरकार शिक्षकों को स्वयं टैब खरीदकर देती है, तब भी गैर-शैक्षणिक आदि कार्यों का बोझ बढ़ेगा।

मंच का मानना है कि डिजिटलीकरण और ई-गवर्नेंस के नाम पर स्कूलों में अनावश्यक रूप से काम बढ़ा है। दाखिले, नतीजे, बैंक खाते, आधार संख्या, पहचान पत्र की मांग, मिशन बुनियाद की दैनिक प्रगति के डाटा आदि के डिजिटलीकरण ने शिक्षकों पर पहले ही अत्यधिक दबाव था, लेकिन टैबलेट की अनिवार्यता से हमें पूरी तरह से डाटा एंट्री ऑपरेटर बना देने की साजिश है। मंच ने प्रश्न उठाया कि जब डाटा एंट्री स्कूलों के कंप्यूटर पर होती है और कंप्यूटर प्रयोगशाला विकसित किए जा रहे हैं तो प्रत्येक शिक्षक को टैब किस आवश्यकता के तहत दिए जा रहे है? मंच ने टैब से जुड़े आदेशों को निरस्त करने और ऐसी किसी व्यवस्था को लागू करने से पहले विचार करने की सलाह दी है।

शिक्षा निदेशालय में संयुक्त निदेशक (सूचना तकनीक) के मुरगन का कहना है कि सरकार के आदेश के तहत पालन किया गया है। उन्होंने कहा कि टैबलेट आने के बाद शिक्षकों पर काम का बोझ कम होगा। पहले शिक्षक रजिस्टर पर हाजिरी लेते थे फिर कंप्यूटर पर फीड करते थे तब हमारे पास डाटा आता था। इसमें बहुत समय लग जाता था, लेकिन अब ये काम 15 मिनट में हो जाएगा।

अतिथि शिक्षकों का कहना है कि सरकार ने टैबलेट खरीदने के लिए जो शर्तें बताई हैं वैसा टैबलेट ढूंढ़ना मुश्किल हो रहा है। दूसरा, जितने शिक्षक हैं उतने टैबलेट बाजार में उपलब्ध नहीं हैं। इस वजह से भी बहुत से शिक्षक तय दिनांक तक उन्हें खरीद नहीं पाएं हैं। स्कूल में जो खेल के शिक्षक हैं उन्हें टैबलेट की उतनी आवश्यकता नहीं होती लेकिन उन्हें भी लेने को कहा गया है। टैबलेट में हाजिरी लगाने में नेटवर्क की समस्या भी आ रही है। शिक्षक न्याय मंच के महासचिव अमित मारीची ने कहा कि सरकार के इस आदेश का स्वागत करना चाहिए, लेकिन समस्या अतिथि शिक्षकों के साथ आ रही है। उनका वेतन उतना नहीं है कि वे 15 हजार में टैब खरीद पाएं।

सरकार के टैबलेट खरीदने के आदेश के बाद कंपनियों ने 12 से 13 हजार वाले टैबलेट 20 से 25 हजार रुपए तक कर दिए। उन्होंने कहा कि अगर बच्चों की हाजिरी रजिस्टर में लगाने के बाद टैबलेट पर भी लगाएं तो इससे शिक्षकों को दिक्कत होगी। सरकार इस नियम को व्यवस्थित तरीके से लागू करती तो शिक्षक इतना विरोध नहीं करते। लोक शिक्षक मंच ने पत्र में लिखा है कि अगर विद्यार्थियों की उपस्थिति भरने से लेकर गृहकार्य, पाठ-योजना, शिक्षण और शिक्षक का मूल्यांकन आदि स्कूल की प्रत्येक गतिविधि को टैबलेट पर भरवाया जाएगा तो कल शिक्षकों को ऐसी पाठ-योजना या गृहकार्य बनाने के लिए मजबूर भी किया जाएगा जो कंप्यूटर में पहले से फीड किए गए सॉफ्टवेयर के अनुसार हो। इससे निश्चित ही शिक्षा की गुणवत्ता और शिक्षक की अकादमिक स्वायत्ता में कमी आएगी।

एक विद्यालय के प्रधानाचार्य का कहना है कि सरकार के इस आदेश के बाद बच्चों की हाजिरी सीधे सरकार के पास पहुंचती है जिससे बच्चे गंभीर हो जाएंगे। सभी शिक्षकों को काम करने में भी आसानी हो रही है। तो वहीं, लोक शिक्षक मंच का मानना है कि टैब के अनिवार्य इस्तेमाल से विद्यार्थियों में यह भ्रामक संदेश जाएगा कि शिक्षण में यांत्रिकरण गुणवत्ता का परिचायक है। मंच का कहना है कि हम अपनी योजना व जरूरत के अनुसार लैपटॉप-कंप्यूटर जैसे उपकरणों को अपने विद्यार्थियों के लिए इस्तेमाल करते रहे हैं, लेकिन टैब जैसे यांत्रिक औजार को अनिवार्य करना अलग बात है। उन्होंने कहा कि शिक्षा के व्यापक हित में टैब से जुड़े आदेशों को निरस्त किया जाना चाहिए।