सुमन केशव सिंह 

‘जिन लोगों की वजह से शास्त्रीय संगीत की पहचान थी वे लोग चले गए, जिसकी वजह से एक खालीपन है। बिस्मिल्लाह खां, रविशंकर, भीमसेन जोशी, कुमार गंधर्व, बेगम अख्तर जैसे लोग अब नहीं रहे, जिनसे संगीत की पहचान होती थी।’ ये अल्फाज सरोद वादक अमजद अली खां ने आठवें विश्व थिएटर ओलंपिक के 16वें दिन दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय (एनएसडी) के छात्रों से ‘लीविंग लीजेंड’ कार्यक्रम के दौरान कहे। उन्होंने शास्त्रीय संगीत में नई पीढ़ी के उन योग्य कलाकारों की कमी की ओर इशारा किया जिससे भारतीय शास्त्रीय संगीत का क्षेत्र जूझ रहा है। उन्होंने कहा कि संगीत एक पूरी संस्कृति, एक विरासत, एक परंपरा है, जो पुरानी पीढ़ी अपनी अगली पीढ़ी को सौंपती है। लेकिन वर्तमान पीढ़ी अपने गुरु के सामने वह पात्र नहीं बनकर उभरती जिसमें गुरु अपने ज्ञान का निचोड़ डाल सके। उन्होंने हंसते-हंसाते अपनी उस पीड़ा को भी व्यक्त कर दिया जिसकी वजह से भारतीय शास्त्रीय संगीत अपनी मिट्टी में ही पहचान खोने लगा है। उन्होंने कहा कि ‘अब गुरु-शिष्य का रिश्ता कमजोर हो चुका है। अब गुरु टीवी है, रेडियो है, सीडी है’।

अब संगीत की विरासत को संजोने वाले शिष्य नहीं मिलते हैं। उस्ताद ने कहा कि गुरु और शिष्य में विश्वास की कमी है। आज कल के शिष्यों को गुरुओं की आवश्यकता नहीं, उन्हें उस्ताद की जरूरत नहीं है। इस दौरान उन्होंने छात्रों के सवालों के जवाब दिए। उन्होंने शास्त्रीय संगीत में अर्जित किए गए अनुभवों को भी छात्रों से साझा किया। इस दौरान भारतीय शास्त्रीय संगीत परंपरा में उन अनछुए पहलुओं को भी इशारों में रखने की कोशिश की।

पद्मभूषण की उतनी खुशी नहीं थी जितनी…
उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के एक भाषण का जिक्र करते हुए कहा कि प्रधानमंत्री ने एक कहानी सुनाई थी जिसमें उनके पिता हाफिज अली खां का जिक्र था। उन्होंने कहा मेरे पिताजी राष्ट्रपति भवन डॉ. राजेंद्र प्रसाद से मिलने गए, तब वह भी उनके साथ थे। उस वक्त उन्हें पद्म भूषण पुरस्कार से नवाजा जाना था। राजेंद्र प्रसाद ने जब हाफिज अली खां से पूछा कि खां साब आपको क्या चाहिए? तो उन्होंने कांगडा की विरासत राग-दरबारी को बचाने की बात कही। उन्होंने कहा कि उनके पिताजी की ऐतिहासिक फरमाइश के बाद राष्ट्रपति भी घबरा गए क्योंकि उन्हें पता ही नहीं था कि राग-दरबारी क्या होती है। इसके बाद उन्होंने दोबारा पूछा कि और क्या चाहिए। लेकिन उन्होंने कहा ‘नहीं साहब मेरी नमाज का वक्त हो गया है और मैं चलता हूं’। यह कहकर वह चल दिए। अमजद अली कहते हैं कि उनके ‘पिता को ये पता भी नहीं था कि प्रोटोकॉल क्या होता है और उन्हें राष्ट्रपति के बाद उठना था। उन्हें किसी सुरक्षाकर्मी ने रोकने की कोशिश भी नहीं की। इसके बाद उन्होंने घर आकर मेरी मां को बताया कि राग-दरबारी को बचाने की जिम्मेदारी वो राजेंद्र बाबू को सौंप आए हैं।