महाराष्ट्र निकाय चुनाव को लेकर सभी पार्टियां जोर-शोर से प्रचार कर रही हैं। 2 दिसंबर को मतदान होना है, लेकिन इस चुनाव ने कई ऐसे गठबंधन सामने ला दिए हैं जो चौंकाते हैं और पूर्व राजनीतिक समीकरणों को तोड़ते हुए दिखाई देते हैं।
याद दिला दें कि 2022 में शिवसेना में दो फाड़ हो गया था। डिप्टी सीएम एकनाथ शिंदे कई विधायकों के साथ अलग होकर एनडीए से जा मिले थे। उस समय शिंदे गुट का आरोप था कि उद्धव ठाकरे ने कांग्रेस और एनसीपी के साथ गठबंधन कर शिवसेना की विचारधारा से समझौता किया है, जो बालासाहेब ठाकरे के सिद्धांतों के खिलाफ था।
लेकिन अब, स्थानीय निकाय चुनाव में कई सीटों पर उद्धव गुट और शिंदे गुट दोनों ही एक-दूसरे के साथ आते दिखाई दे रहे हैं। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि यह केवल स्थानीय स्तर का एडजस्टमेंट है और इसका बड़े राजनीतिक समीकरणों से कोई लेना-देना नहीं है।
सूत्र बताते हैं कि उद्धव ठाकरे इस तरह के स्थानीय गठबंधनों से बहुत खुश नहीं हैं और कई बार आपत्ति भी जता चुके हैं। हालांकि स्थानीय नेताओं का तर्क है कि उनकी पहली प्राथमिकता भाजपा को रोकना है। कई क्षेत्रों में स्थानीय इकाइयाँ अपने-अपने हालात के अनुसार फैसले ले रही हैं। ऐसा ही रुख शिंदे गुट की तरफ से भी दिख रहा है, जहां कहा जा रहा है कि कुछ क्षेत्रों की परिस्थितियों को देखते हुए स्थानीय स्तर पर समझौते किए जा रहे हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि विचारधारा में कोई बदलाव आ रहा है।
शिंदे गुट को यहां पसंद उद्धव गुट
पुणे जिले की चाकन म्युनिसिपल काउंसिल में शिंदे गुट के प्रत्याशी मनीषा सुरेश गोरे ने नामांकन भरा तो उनके साथ विधायक शरद सोनवणे और उद्धव गुट के विधायक बाबाजी काले मौजूद थे। बाद में बाबाजी काले ने सफाई दी कि यह कोई औपचारिक गठबंधन नहीं है, बल्कि यह समर्थन केवल चाकन क्षेत्र और पूर्व विधायक सुरेश गोरे के सम्मान में दिया गया है।
सिंधुदुर्ग जिले की कणकवली म्युनिसिपल काउंसिल में भी उद्धव ठाकरे और शिंदे गुट एक साथ आ गए हैं। यहां उनके गठबंधन को “शहर विकास आघाडी” नाम दिया गया है और इसका नेतृत्व उद्धव गुट के नेता संदेश पवार कर रहे हैं, जो अध्यक्ष पद के उम्मीदवार भी हैं। जानकारों का मानना है कि दोनों ही गुट यहां भाजपा के प्रभाव को सीमित करने की कोशिश कर रहे हैं।
कांग्रेस भी ले रही शिंदे गुट का समर्थन
कुछ जगह कांग्रेस और शिंदे गुट भी साथ आते दिखे हैं। धराशिव जिले के उमरेगा में कांग्रेस और शिंदे गुट ने स्थानीय स्तर पर गठबंधन किया है। यहां पूर्व विधायक रविंद्र गायकवाड़ कांग्रेस के साथ स्थानीय समझौता कर भाजपा उम्मीदवार हर्षवर्धन चौलक्या को चुनौती दे रहे हैं।
चोपडा में शिंदे गुट के विधायक चंद्रकांत सोनवाणे अध्यक्ष पद के लिए कांग्रेस के साथ गठबंधन कर चुनाव लड़ रहे हैं और आरोप लगा रहे हैं कि भाजपा ने उनसे समर्थन छीनने की कोशिश की।
शरद पवार का गुट भी शिंदे के करीब
उधर, शिंदे गुट और एनसीपी (शरद गुट) भी कुछ जगह साथ दिखे हैं। नासिक जिले की Yeola परिषद में शिंदे गुट के उम्मीदवार रूपेश दर्दे शरद गुट का समर्थन किया है और यहां वे भाजपा तथा अजित पवार गुट दोनों को चुनौती दे रहे हैं। रायगढ़ जिले में भी कुछ सीटों पर ऐसा ही समीकरण देखने को मिला है। वहीं कोल्हापुर जिले के कागल सीट पर एनसीपी की दोनों धड़ें एक साथ आ चुकी हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि स्थानीय स्तर पर बने ये गठबंधन महाराष्ट्र निकाय चुनाव के परिणामों पर असर डाल सकते हैं। इसका प्रभाव आगे चलकर बड़े चुनावी मुकाबलों में भी देखने को मिल सकता है।
ऐसे गठबंधन के क्या मायने?
इस चुनाव में एक और बड़ी बात यह देखी गई कि कई जगह भाजपा और एनडीए के ही सहयोगी आमने-सामने खड़े हैं- खासतौर पर पश्चिम महाराष्ट्र, मराठवाड़ा और विदर्भ के कुछ हिस्सों में। भाजपा का कहना है कि लोकल बॉडी चुनावों में ऐसी “फ्रेंडली फाइट्स” कभी-कभी टाली नहीं जा सकतीं। वहीं शिंदे गुट का दावा है कि ज्यादातर सीटों पर महायुति के साथ रहकर ही चुनाव लड़ा जा रहा है, लेकिन स्थानीय इकाइयों को जरूरत के मुताबिक थोड़ी स्वतंत्रता दी गई है ताकि वे अपने-अपने क्षेत्रों में जरूरी गठबंधन कर सकें।
ये भी पढ़ें- महाराष्ट्र नगर निगम चुनाव कब होंगे?
