सावन के दूसरे सोमवार (29 जुलाई) पर देशभर के शिवालयों मे भक्तों का तांता लगा हुआ है। मंदिर के घंटों के साथ ही जय शिव शंभू और बम-बम भोले के नारे लग रहे हैं। देर रात से ही भक्तों की कई किलोमीटर की लाइन लगी है। कानपुर का सिद्धनाथ मंदिर गंगा किनारे बना हुआ है। इस मंदिर को दूसरी काशी के नाम से भी जाना जाता है। भक्तों की सिद्धनाथ मंदिर में अटूट आस्था है। कहते हैं यहां दर्शन मात्र से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूर्ण हो जाती है।
सिद्धनाथ मंदिर का निर्माण त्रेतायुग में हुआ था। मंदिर का इतिहास त्रेतायुग से जुड़ा हुआ है। सिद्धनाथ मंदिर के इतिहासकारों की मानें तो जिस स्थान पर कानपुर मे जाजमउ बसा हुआ है। वो कभी राजा जयाद का राज्य हुआ करता था। गंगा किनारे राजा जयाद का बहुत ही सुंदर महल था। राजा के सौ पुत्र थे, वो भगवान शंकर के बड़े भक्त थे।
पुजारी मुन्नी लाल के मुताबिक राजा जयाद के पास बहुत बड़ी गोशाला थी, जिसमें हजारों गाय पली थीं। राजा के पास एक ऐसी गाय थी जिसके पांच थन थे। राजा उसी गाय का दूध पीता था। राजा के महल से कुछ दूरी पर एक मिट्टी का टीला था। पांच थन वाली गाय अक्सर उस मिट्टी के टीले के पास जाया करती थी। वो गाय अपना दूध उस टील पर गिरा देती थी। जब इसकी जानकारी राजा को हुई उसने टीले की खुदाई शुरू कराई। उस टीले से भगवान शंकर का शिवलिंग निकला। राजा ने शिवलिंग की स्थापना कर भव्य मंदिर बनावाने का फैसला किया।
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एक बार राजा को सपना आया जिसमें भगवान शिव ने उसे कहा कि यदि शिवलिंग की स्थापना कराना चाहते हो और अपने राज्य को छोटी काशी के नाम से मशहूर कराना चाहते हो तो सौ यज्ञ का अनुष्ठान कराना पड़ेगा। राजा ने बड़े-बड़े आचार्यों और पंडितों को यज्ञ के लिए बुलाया। वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ शुरू हुआ था। जब इसकी जानकारी इंद्रदेव को हुई तो उन्हें ये बाद नागवार गुजरी। इंद्र ने यज्ञ को खंडित करने की योजना बनाई। इंद्रदेव नहीं चाहते थे कि दूसरी काशी की स्थापना हो। राजा ने प्रकांड ब्राह्मणों से यज्ञ शुरू कराया। जब 99 यज्ञ का अनुष्ठान पूर्ण हो गया तो इंद्रदेव ने स्वयं कौए के रूप धारण किया और यज्ञ में हड्डी फेंक दी। जिससे यज्ञ खंडित हो गया, ये देखकर राजा बहुत दुखी हो गया।
राजा ने भगवान शिव की अराधना की और उन्हें प्रसन्न किया। राजा की अराधना से खुश होकर भगवान शिव ने दर्शन दिया। भगवान शिव ने राजा से कहा इस राज्य को छोटी काशी का दर्जा तो नहीं मिल पाएगा, लेकिन जिस स्थान पर शिवलिंग स्थापित होगा वो स्थान सिद्धनाथ के नाम से जाना जाएगा। सिद्धनाथ मंदिर में वैसे तो 12 माह श्रद्धालुओं की भीड़ रहती है। लेकिन सावन और शिवरात्रि के पर्व पर यहां पर अथाह भीड़ होती है। लाखों की तादाद में श्रद्धालु दर्शन करने को आते हैं। इस मंदिर की मान्यता है कि गंगा में स्नान करने के बाद नित्य दर्शन करने से बड़ी-बड़ी परेशानियां दूर हो जाती हैं। लोगों की मान्यता है कि जो लोग मुकदमों में फंसे होते हैं, बाबा के दरबार में आने से उन्हें निजात मिलती है।

