इसी साल 28 दिसंबर को इंदौर के भागीरथपुरा स्थित अर्बन प्राइमरी हेल्थ सेंटर में 6 मरीजों को भर्ती कराया गया था। इसके बाद महज 48 घंटों के भीतर मरीजों की संख्या में जबरदस्त इजाफा देखने को मिला। आंकड़ा 129 से बढ़कर एक ही दिन में 300 तक पहुंच गया। एक हफ्ते के भीतर कुल 66,107 मरीजों की स्क्रीनिंग की गई और करीब 13,000 घरों का सर्वे किया गया।

यह पूरा मामला इंदौर के भागीरथपुरा इलाके का है, जहां जहरीले पानी की वजह से स्वास्थ्य सेवाएं चरमरा गईं। सबसे बड़ी चुनौती उन डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों के सामने है, जो घर-घर जाकर लोगों की जांच कर रहे हैं। पूरा प्रयास इस बात का है कि दूषित पानी के कारण लोगों को और गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का सामना न करना पड़े।

मरीजों में दस्त (डायरिया) से लेकर किडनी फेल होने (रीनल शटडाउन) तक के लक्षण देखने को मिले हैं। इंडियन एक्सप्रेस ने ग्राउंड पर काम कर रहे कई डॉक्टरों से बातचीत की। जूनियर डॉक्टर नितिन ओझा भी इस अभियान में सक्रिय रूप से जुड़े हुए हैं। उनका कहना है कि संक्रमण के शुरुआती दिनों में सबसे बड़ी चुनौती यही थी कि इसकी शुरुआत आखिर कहां से हुई। इसके बाद उस इलाके के मरीजों को ट्रैक करना जरूरी हो गया।

चुनौती इसलिए भी बड़ी थी, क्योंकि भागीरथपुरा में गंदा पानी कई दिनों से आ रहा था, लेकिन बीमारी के मामले अचानक बढ़ने लगे। इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक, स्थानीय लोग अक्टूबर महीने से ही दूषित पानी की शिकायत कर रहे थे। हालांकि 29 दिसंबर तक प्रशासन की नींद नहीं खुली। जब स्वास्थ्य कर्मी जमीन पर सक्रिय हुए, तब तक संक्रमण पूरे इलाके में फैल चुका था।

डॉक्टरों का कहना है कि संक्रमण काफी बड़े स्तर पर फैल चुका था, जिसकी वजह से लोग पैनिक में आ गए। जब तक लोगों को उबला हुआ पानी पीने और अन्य सावधानियां बरतने की सलाह दी गई, तब तक काफी देर हो चुकी थी।

आउट पेशेंट अटेंडेंस के आंकड़े भी इस स्थिति की गंभीरता बयां करते हैं। प्राइमरी हेल्थ सेंटर, भागीरथपुरा में दिसंबर महीने में शुरुआती दिनों तक मरीजों की संख्या सामान्य रही। 25 दिसंबर को 96 मरीज, 26 दिसंबर को 110 और 27 दिसंबर को 70 मरीज पहुंचे। लेकिन 29 दिसंबर को अचानक यह संख्या बढ़कर 129 हो गई। इसके बाद 30 दिसंबर को 240 और 31 दिसंबर को 310 मरीज सामने आए।

स्वास्थ्य कर्मियों के मुताबिक, एक बड़ी समस्या यह भी रही कि भागीरथपुरा में मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर उतना मजबूत नहीं है। कई मरीज प्राइवेट नर्सिंग होम या छोटे क्लीनिकों में चले गए, जहां उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाया। इन जगहों पर स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी है और स्टाफ भी पर्याप्त रूप से प्रशिक्षित नहीं है। डॉक्टरों का सुझाव है कि गंभीर मामलों में मरीजों को शहर के मेडिकल कॉलेज में ले जाया जाना चाहिए, जहां मल्टी-स्पेशलिटी सुविधाएं मौजूद हैं।

डॉक्टरों का यह भी कहना है कि बुजुर्ग मरीजों को दूषित पानी से ज्यादा दिक्कत इसलिए हुई, क्योंकि उन्हें पहले से ही अन्य बीमारियां थीं, चाहे वह किडनी से जुड़ी हों या दिल से संबंधित।

भागीरथपुरा की वेस्ट ज़ोन में डॉक्टर उमेश नंदबर भी सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं। उन्होंने एक खास पैटर्न पर ध्यान दिया है। उनके मुताबिक, कई अस्पतालों में 95 फीसदी भर्ती मरीज महिलाए हैं। उनमें डिहाइड्रेशन की समस्या गंभीर रूप से देखने को मिली है। 70 से 80 प्रतिशत मरीजों में किडनी फेल होने के लक्षण पाए गए।

स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार, 31 दिसंबर तक अस्पताल में भर्ती हुए 310 मरीजों में से 203 अब भी भर्ती हैं, जबकि 107 मरीजों को डिस्चार्ज किया जा चुका है। वहीं 25 मरीजों को आईसीयू में रखा गया है। जिन मरीजों को पहले से अन्य बीमारियां थीं, उनकी हालत अपेक्षाकृत ज्यादा गंभीर पाई गई।

इंडियन एक्सप्रेस से बातचीत में एमडी मेडिसिन डॉक्टर अभिषेक निगम ने बताया कि कुछ ही दिनों के भीतर लक्षणों के आधार पर एक ट्रीटमेंट प्लान तैयार कर लिया गया था। उन्होंने कहा कि कई मरीजों को लूज मोशन और पेट दर्द की शिकायत थी, ऐसे में यह पहले से तय था कि कौन-सी पेनकिलर और कौन-सी एंटीबायोटिक असरदार होगी।

इस पूरे अभियान में डॉक्टर दिन-रात काम कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ-साथ अन्य स्वास्थ्य कर्मियों की चुनौतियां भी कम नहीं हैं। 59 वर्षीय विनोद नीम, जो स्वास्थ्य विभाग में अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं, अपना अनुभव साझा करते हुए कहते हैं कि उन्हें अपने काम से प्यार है और इस बात की तसल्ली है कि रिटायरमेंट से पहले वह समाज की सेवा कर पा रहे हैं।

विनोद रोज सुबह 6 बजे घर से निकलते हैं और इंदौर के अरविंदो अस्पताल पहुंचते हैं। वह उस टीम का हिस्सा हैं, जो डोर-टू-डोर स्क्रीनिंग करती है। उनके मुताबिक, सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक मरीजों को ट्रैक किया जाता है। वह आशा वर्करों की टीम के साथ घर-घर जाते हैं, मरीजों से बात करते हैं और डिहाइड्रेशन व अन्य लक्षणों पर ध्यान देते हैं। करीब 10 मिनट में एक मरीज की स्क्रीनिंग पूरी हो जाती है और एक फॉर्म भी भरा जाता है।

आंकड़ों के मुताबिक, 1 जनवरी तक इस टीम ने 48,112 लोगों की स्क्रीनिंग की। वहीं 2,714 मरीजों को ओआरएस के पैकेट वितरित किए गए। अकेले 31 दिसंबर को Dicyclomine दवाई के 6,255 पत्ते बांटे गए। इसके अलावा ओआरएस के भी 22,500 पैकेट दिए गए।

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