Himachal Pradesh Assembly Election 2022: हिमाचल प्रदेश में विधानसभा चुनाव की गहमागहमी के बीच राज्य में तमाम राजनीतिक दलों ने प्रचार-प्रसार तेज कर दिया है। वहीं, पांच साल पहले हुए दंगों का दंश झेलता एक गांव आज भी विकास की कमी से जूझ रहा है।

2017 में हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले चंबा जिले के चुराह क्षेत्र के गांव खुशनगरी की खुशी और शांति बिखर गई थी। स्थानीय सरकारी स्कूल में एक छात्रा के साथ बलात्कार ने राजनीतिक रंग ले लिया और खुशनगरी और पास के शहर तीसा-भंजरारू में सांप्रदायिक हिंसा भड़क गई थी। गांव में इस तरह की बदहाली पहले कभी नहीं देखी गयी थी।

बीजेपी ने दिया हंस राज को मौका: वहीं, विधानसभा चुनाव 2022 के लिए भाजपा ने चुराह व‍िधानसभा सीट से अपने सीट‍िंग व‍िधायक हंस राज पर एक बार फ‍िर से भरोसा जताते हुए चुनावी दंगल में उतारा है। इस सबके बीच खुशनगरी और तिस्सा के निवासी विकास की कमी के बीच संघर्ष करते हुए जीवनयापन कर रहे हैं। खुशनगरी में एक पहाड़ी के ऊपर एक सरकारी औषधालय में शायद ही कभी दवाएं या कर्मचारी होते हैं। यहां तक पक्की सड़क नहीं होने से बीमार व्यक्ति के लिए डिस्पेंसरी तक पहुंचना अपने आप में एक कठिन काम है।

सरकारी अस्पताल में कर्मचारी नहीं: स्थानीय ग्रामीण महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत अपनी मजदूरी जारी होने का एक साल से अधिक समय से इंतजार कर रहे हैं। तीसा में सरकारी कॉलेज में एक इमारत है लेकिन वाणिज्य और विज्ञान के लिए कोई शिक्षक नहीं है। बच्चे अभी भी सरकारी स्कूल तक पहुंचने के लिए कच्चे रास्ते से चलते हैं। वहीं, तीसा के स्थानीय सरकारी अस्पताल में मशीनें हैं लेकिन अल्ट्रासाउंड या एक्स-रे करने के लिए कोई कर्मचारी नहीं है।

स्थानीय मुद्दों को हल करने में विफल: पिछले पांच वर्षों में, शहर में कोई भी दंगों का उल्लेख नहीं करता है। लेकिन दो बार विधानसभा के लिए चुने जाने के बावजूद स्थानीय मुद्दों को हल करने में विफल रहने के लिए हंस राज और भाजपा के खिलाफ लोगों में गुस्सा है। चुराह से अपना तीसरा सीधा चुनाव जीतने के लिए बीजेपी विधायक का सामना कांग्रेस के यशवंत सिंह खन्ना से है। यशवंत सरकारी टीचर हैं और चुनाव लड़ने के लिए उन्होंने अपनी नौकरी छोड़ दी थी।

नहीं मिला मुआवजा: 2017 के दंगों के दौरान अपना भोजनालय गंवाने वाले मोहम्मद राशिद कहते हैं, “हमने स्थानीय विधायक से हाथ जोड़कर स्पष्ट रूप से कहा कि हम इस बार उन्हें वोट नहीं दे सकते हैं। पांच साल बीत गए और कोई भी हमारे पास नहीं आया, यहां तक ​​​​कि मानवता की खातिर भी नहीं। मुआवजा तो दूर की बात है।” उन्होंने कहा कि बिना किसी गलती के हमारी दुकानें जला दी गईं। मुआवजा कभी नहीं आया। सब कुछ जीरो से शुरू करना आसान नहीं था।

अटल चौक के पास एक दुकान के मालिक रंजीत सिंह ने कहा, “यहां के लोगों को जल्द ही एहसास हो गया कि स्थानीय भाजपा और कांग्रेस नेताओं ने अपने फायदे के लिए 2017 की घटना के दौरान आग में घी डाला। किसी ने हमें सलाह नहीं दी बल्कि हमने खुद शांति का विकल्प चुना। लेकिन अब मुद्दा दंगों का नहीं, बल्कि विकास का है। दो बार भाजपा विधायक चुने जाने के बावजूद स्थानीय मुद्दों का समाधान नहीं हुआ है।”

बदलाव के लिए मतदान: सद्दाम हुसैन नाम के शख्स ने कहा, “हिंदू-मुसलमान यहां कभी कोई मुद्दा नहीं था, इसे केवल 2017 में वोट हासिल करने के लिए बनाया गया था। स्थानीय कांग्रेस और भाजपा दोनों नेताओं ने हिंसा भड़काने के लिए भीड़ का नेतृत्व किया था और पीड़ित छोटे दुकानदार थे।” उन्होंने कहा कि पंजाब के लोग तेज थे AAP पर विश्वास कर लिया। यहां किसी तीसरे पक्ष को शासन करने में अभी भी कुछ और समय लगेगा, तब तक हिमाचल ने हमेशा बदलाव के लिए मतदान किया है।