सुमन केशव सिंह
तकदीर से लड़कर, मां-बाप को मनाकर, रिश्तेदारों से जूझकर और जकड़नों-जंजीरों को तोड़कर छोटे शहर की लड़कियां अपनी लकीर खींच रही हैं। वैसे तो दिल्ली जैसे महानगर में ऐसी हजारों कहानियां बिखरी हुर्इं हैं। इनमें कुछ वाकई प्रेरणा देती हैं। ये उन लड़कियों के लिए भी हौसला हैं जिनके सपने परिवार की मर्जी और सामाजिक सोच के आगे दम तोड़ देते हैं। ऐसी ही एक कहानी है गोरखपुर के छोटे से गांव की पूजा राय की। पूजा अभी 22 साल की हैं। लेकिन उनके सपनों की उड़ान उन्हें दिल्ली ले आई आज वे इतनी छोटी सी उम्र में न केवल हिंदी फिल्मों के जाने माने चेहरों को निर्देशित कर चुकीं हैं बल्कि उन्हें अपने इशारों पर भी नचा रहीं हैं। भोजपुरी फिल्मों के महानायक कहे जाने वाले रवि किशन हों या हेटस्टोरी की ग्लैमरस गर्ल सुरवीन चोपड़ा या प्रीति झिंगियानी। वे इन दिनों मध्यम बजट की फिल्मों के लिए काम कर रही हैं। पेशे से सहायक निर्देशक पूजा कहती हैं कि छोटे शहरों से निकलना और वहां मानसिकता से जूझना बहुत मुश्किल होता है। गांवों में लोगों को अब भी नहीं पता मैं क्या करती हूं। यहां तक कि पापा के दोस्तों और भाई-बहनों को भी मेरा काम बस टाइम-पास लगता है।
पूजा कहतीं हैं कि मैं अपने यहां लोगों को बताती हूं कि मैं किसी फिल्म में सहायक निर्देशक हूं तो उनके चेहरे पर आने वाले भाव ये बता देते हैं कि उन्हें कुछ खास समझ नहीं आया। वे दोबारा पूछते हैं कि मैं क्या करती हूं। पूजा कहती हैं कि आज भी गांवों की स्थिति यह है कि यदि आप डॉक्टर, इंजीनियर और वकील नहीं हैं मतलब आप कुछ नहीं कर रहे। उन्हें पैशन और पेशे का अंतर समझ ही नहीं आता है।
पिता बीएसएफ में हैं। परिवार के लोग चाहते थे कि 12वीं के बाद शादी कर लूं या गांव में ब्यूटी पार्लर की दुकान खोल लूं। लेकिन पूजा को लगा कि परिवार की मर्जी चली तो उनकी जिंदगी खत्म हो जाएगी। इसके लिए पापा को मनाना जरूरी था। पापा को मनाने के लिए मम्मी को समझाना जरूरी था। उन्होंने अपने घर में दिल्ली जाकर पढ़ने और पत्रकारिता करने की इच्छा जताई। लेकिन कोई नहीं माना, अंत में उन्होंने तुरंत शादी की बात कही। तब जाकर परिवार ने दिल्ली जाकर आगे की पढ़ाई करने के लिए राजी हुआ। पूजा ने बताया कि वे बनना तो पत्रकार चाहती थीं लेकिन पेशे में असुरक्षा, अस्थिरता और रचनात्मकता की कम संभावनाओं ने उन्हें फिल्म की तरफ मोड़ दिया।
उन्होंने बताया कि शादी के दबाव तो अब भी है लेकिन वे अपने करिअर को वक्त देना चाहती हैं। वे कहती हैं कि शादी भी करिअर का हिस्सा है लेकिन उन्हें ऐसे किसी की तलाश है जो उनके काम को समझे। स्वभाव से काफी भावुक पूजा कहती हैं कि मैंने पेशा तो भाव और भावनाओं पर आधारित चुना है लेकिन लोग मेरी भावनाओं को ही नहीं समझ पाते हैं। वे कहती हैं इस पेशे में कई बार मुश्किल पल भी आते हैं, आप भावनात्मक रूप से टूटते हैं। उस वक्त आपको परिवार की जरूरत होती है। परिवार आपकी मदद करता है लेकिन वे खुद को इतनी खुशनसीब नहीं मानतीं हैं। वे कहती हैं कि दिल्ली जैसे शहर में जब आप अकेले होते हैं तो टूटने के बाद खुद को समेटना भी पड़ता है।
छोटे शहरों से निकलना और वहां मानसिकता से जूझना बहुत मुश्किल होता है।
– पूजा राय
पहचान की तलाश है : श्रुति
सहारनपुर, उत्तर प्रदेश की श्रुति पेशे से स्वतंत्र फोटोग्राफर हैं। श्रुति को यह शौक सहारनपुर से दिल्ली ले आया। वे कहती हैं कि फोटोग्राफी का शौक बचपन से था लेकिन छोटे शहरों में इसके लिए कोई खास जगह नहीं थी। दृश्यों और पलों को कैद करने के शौक को पेशे में तब्दील करने की ठानकर वे दिल्ली आईं। इसके बाद उन्होंने फोटोग्राफी के लिए पेशेवर कोर्स किए और खुद को निखारा। श्रुति कहतीं हैं यह पेशा पुरुषों के आधिपत्य वाला है। कई बार भीड़भाड़ तो कई बार शहर से दूर के इलाकों में फोटोग्राफी के लिए जाना पड़ता है। धूल, धुआं और कठिन परिस्थितियों में फोटो शूट करना उन्हें पसंद है लेकिन श्रुति के अनुसार उनके हाथ से कई ऐसे काम सिर्फ इसलिए ले लिए गए क्योंकि वे महिला हैं।
कई बार उन्हें रात की फोटो शूट के लिए जाना पड़ता है लेकिन लोग केवल इसलिए उन्हें रात के शूट के लिए असाइन करने से बचते हैं क्योंकि वे महिला हैं। श्रुति कहती हैं कि छोटे से शहर से निकलकर आज जो भी अपनी थोड़ी बहुत पहचान बना सकी हूं, उसके लिए बहुत मेहनत करनी पड़ी है लेकिन अभी ऊंची उड़ान बाकी है। श्रुति खुद को खुशनसीब मानती हैं कि आसमान छूने के सपने को पूरा करने के लिए उन्हें घरेलू स्तर पर बहुत नहीं जूझना पड़ा लेकिन महिलाओं के प्रति सामाजिक सोच से जंग आज भी जारी है।
