पश्चिम बंगाल में एसआईआर के दौरान जिन मतदाताओं की पहचान की जा चुकी है, अब उन्हें भी समन भेजे जा रहे हैं। राज्य के सहायक निर्वाचन पंजीकरण अधिकारियों (एईआरओ) के एक समूह ने पश्चिम बंगाल के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (सीईओ) को पत्र लिखकर इस पर चिंता जताई है। साथ ही पश्चिम बंगाल कल्याण संघ के सहायक कार्यक्रम अधिकारी ने यह भी बताया है कि सीईओ कार्यालय उन्हें निर्देश व्हाट्सएप मैसेज के जरिए दे रहे हैं।

पश्चिम बंगाल कल्याण संघ के सहायक कार्यक्रम अधिकारियों ने 6 जनवरी को सीईओ को पत्र लिखा है। पत्र में लिखा गया, “हाल के घटनाक्रमों से हम बेहद चिंतित हैं, बड़ी संख्या में ऐसे मतदाता शामिल हैं जिनका नाम पहले एसआईआर से जुड़ा हुआ दिखाया गया था, लेकिन अब उन्हें सीईओ पोर्टल में तार्किक विसंगति के मामलों के रूप में दर्ज किया जा रहा है। चुनाव आयोग/सीईओ कार्यालयों से विभिन्न व्हाट्सएप मैसेज, वर्चुअल बैठकों और मौखिक निर्देशों के माध्यम से हमें सूचित किया गया है कि ऐसे मतदाताओं को “मान्यता न होने वाले” मामलों के रूप में माना जाए और उनके लिए नए सिरे से सुनवाई की जाए।”

निर्वाचन आयोग से नहीं मिले व्यापक दिशानिर्देश

पत्र में आगे कहा गया, “शुरू में ही हम निवेदन करते हैं कि भारत निर्वाचन आयोग द्वारा कोई स्पष्ट लिखित आदेश या व्यापक दिशानिर्देश जारी नहीं किया गया है, जिसमें विशेष रूप से उन मतदाताओं के लिए एसआईआर के तहत सुनवाई आयोजित करने की प्रक्रिया निर्धारित की गई हो जो पिछले एसआईआर से संबंध स्थापित करने में असमर्थ हैं… ऐसे में फील्ड अधिकारियों को अनौपचारिक और तदर्थ निर्देशों पर काम करने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है, जिनका कोई आधार नहीं है और इस कारण कार्यान्वयन में भ्रम, अनिश्चितता और प्रक्रियात्मक कठिनाई हो रही है।”

कम टाइम अधिक वर्कलोड की शिकायत

पत्र में एईआरओ पर पत्र में कहा गया, “अधिक वर्कलोड और समय सीमा की शिकायत की गई। प्रत्येक एईआरओ को मौजूदा नो मैपिंग मामलों के अतिरिक्त लगभग 3,000-4,000 तार्किक विसंगति मामले सौंपे गए हैं। जनवरी का पूरा महीना लगभग पूरी तरह से नो मैपिंग सुनवाई में जा रहा है, जिससे 7 फरवरी की अंतिम समय सीमा से पहले हजारों तार्किक विसंगति मामलों की उचित जांच और वेरीफिकेशन करने के लिए लगभग कोई समय नहीं बचा है।”

एईआरओ समूह ने लिखा,“इस तरह की कम समय सीमा मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के नियम 21ए के विपरीत है, नियम के मुताबिक यह अनिवार्य है कि किसी मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे सुनवाई का उचित अवसर दिया जाना चाहिए।”

डाक्यूमेंट को लेकर भी विरोधाभास

पत्र में स्वीकार्य दस्तावेजों पर विरोधाभासी निर्देशों का भी जिक्र किया गया है। एईआरओ ने लिखा, “हमें व्हाट्सएप और मौखिक मैसेज के माध्यम से अनौपचारिक निर्देश मिल रहे हैं कि केवल सरकार द्वारा जारी जन्म प्रमाण पत्र ही स्वीकार किए जाएंगे।” उन्होंने आगे कहा, “हमें व्हाट्सएप मैसेज भी मिले हैं जिनमें स्थानीय अधिकारियों को जारी पारिवारिक रजिस्टरों को स्वीकार न करने का निर्देश दिया गया है, जबकि वे आधिकारिक 13 डाक्यूमेंट्स की लिस्ट में शामिल हैं।”

पत्र में यह बात उजागर की गई, “हमें सांसद के एडमिट कार्ड स्वीकार न करने के लिए कहा गया है, जबकि वे नियम 9 के तहत मान्य हैं। स्कूल प्रमाणपत्र भी स्वीकार न करने के लिए कहा गया है, जो नियम 9 और 20 (पहला मतदाता पंजीकरण नियम 1960 के नियम 9 और 20, जो अन्य आधिकारिक अभिलेखों की जांच, पूछताछ करने और शपथ पत्र दर्ज करने की अनुमति देते हैं) के तहत मान्य हैं। इन विरोधाभासी निर्देशों ने जमीनी स्तर पर भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है।”

ममता बनर्जी पहले लगा चुकी आरोप

दो दिन पहले मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया था कि चुनाव अधिकारियों को निर्देश व्हाट्सएप पर दिए जा रहे हैं। मुख्यमंत्री ने 5 जनवरी को गंगासागर मेले में एक सार्वजनिक कार्यक्रम में कहा, “चुनाव आयोग व्हाट्सएप पर चल रहा है। कौन जाने उन्होंने व्हाट्सएप खरीदा है या नहीं… मुझे यह कहते हुए खेद है कि लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए जा रहे हैं… यदि लोगों के अधिकार छीन लिए गए, तो आप भी गायब हो जाएंगे। इतना ध्यान रखें।”

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