दिल्ली में पहली बार लोक सेवा दिवस मनाने के दौरान मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने अधिकारियों को खूब खरी-खोटी सुनाई। उन्होंने यहां तक कह दिया कि जो अफसर उनकी सरकार के हिसाब से काम करने को तैयार नहीं हैं, वे अपना तबादला करा लें। मुख्यमंत्री ने उन शब्दों का इस्तेमाल किया जिसे कभी भी दिल्ली के अफसर सुनने के आदी नहीं रहे हैं। लगातार 15 साल मुख्यमंत्री रहीं शीला दीक्षित साल के शुरू में अधिकारियों को एक भोज देती थीं और उन्हें शालीन तरीके से संबोधित करती थी। केजरीवाल के भाषण के दो दिन बाद ही हर साल मनाए जाने वाले लोक सेवक दिवस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश भर के आला अफसरों को खूब पुचकारा और खुद लक्ष्य निर्धारित करके काम करने को कहा। अधिकारियों से सामूहिक रूप से बातचीत करने का यही तरीका मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए भी अपनाते थे। वैसे अकेले में अफसरों से कड़ाई से पेश आने वाले मोदी के इस कार्य को दिखावा भी कहा जा सकता है, लेकिन केजरीवाल ने तो जिस तरह की बात कही उसे उनके काम करने के तरीके से जोड़ा जा रहा है। आने वाले समय में पता चलेगा कि किसको अपने स्टाइल का फायदा मिलता है और किसे इसका खमियाजा भुगतना पड़ सकता है।
साजिश की बू
दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी (आप) के नेता हर काम में विपक्षी दलों की साजिश खोजने के लिए अभिशप्त हो गए हैं। सरकार बनने के पहले ही दिन से वे आरोप लग रहे हैं कि केंद्र की भाजपा सरकार कभी खुद, कभी उपराज्यपाल के माध्यम से तो कभी दिल्ली पुलिस से असहयोग करवाकर आप सरकार को काम नहीं करने दे रही है। सम-विषम योजना को फेल कराने के आरोप तो आए दिन भाजपा पर लग रहे हैं। आप की ओर से कहा गया कि योजना फेल करवाने के लिए भाजपा ने अपने आॅटो यूनियन से हड़ताल करवा दी। शायद इसी डर से आनन-फानन में आॅटो यूनियन ने हड़ताल वापस ले ली। फिर कहा गया कि जान-बूझकर जाम लगवाया जा रहा है, कभी निर्माण के नाम पर तो कभी बसों का ब्रेक डाउन करवाकर। अब कहा जा रहा है कि भलस्वा के कूड़ा घर में आग लगवाकर प्रदूषण को बढ़ाया जा रहा है। पता नहीं माजरा क्या है लेकिन दिल्ली के तीनों कूड़ा घर-ओखला, गाजीपुर और भलस्वा में तो कभी भी रासायनिक प्रतिक्रिया होने से आग लग ही जाती है। अभी भी गाजीपुर कूड़ा घर में आग लगी हुई है जो किसी दिन बुझ जाती है और फिर किसी दिन जल उठती है। वैसे कोई भी कारण हो सरकार को जांच तो करानी ही चाहिए।

डिग्री पर पेच
नोएडा के सेक्टर-24 के फुटवियर डिजाइन एंड डेवलपमेंट इंस्टीट्यूट के डिग्री विवाद ने विद्यार्थियों के सामने सही या गलत संस्थान छांटने को लेकर गंभीर सवाल पैदा कर दिए हैं। आइआइटी, आइआइएम की तर्ज पर केंद्र सरकार ने फुटवियर समेत चमड़े से बने उत्पादों की बारीकी सिखाने के उद्देश्य से एफडीडीआइ का गठन किया था। डिप्लोमा कोर्स संचालित करने के दौरान 2012 में संस्थान प्रबंधन ने बगैर दीर्घकालिक निर्णय लिए डिग्री को लेकर एक निजी विश्वविद्यालय से करार कर लिया। करार करते समय यह पुष्टि भी नहीं की गई कि निजी विश्वविद्यालय से ऐसा करार किया जा सकता है या नहीं। नतीजा, यूजीसी ने निजी विश्वविद्यालय की ओर से दी गई डिग्री को अवैध करार दे दिया। इसके चलते तीन साल के दौरान दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की डिग्री पर पेच फंस गया है।

मौका भुनाने की होड़
राजधानी में मौका भुनाने वालों की कमी नहीं। कोई मौके की नजाकत को देखते हुए समाज सेवा का पुण्य लेने लगता है तो कोई इसका इस्तेमाल अपना बिजनेस चमकाने के लिए करता है। इसी तरह के एक मामले से बेदिल का भी सामना हुआ। पिछले दिनों हुए श्री श्री रविशंकर के सम्मेलन में मकान बेचने वाली एक कंपनी ने लोगों को पानी पिलाकर अपना विज्ञापन करने का फैसला किया। पानी की छोटी बोतलों के साथ पंपलेट या विजिटिंंग कार्ड देकर लोगों को मकान खरीदने के लिए मिलने का आग्रह भी परोसा जा रहा था। यही हाल सम-विषम योजना का भी है। कोई मुफ्त सवारी का लालच देकर एअर प्यूरीफायर खरीदने तो कोई कार के अलावा एक दुपहिया भी खरीदने की पेशकश लेकर हाजिर है।
तैयारी और बयानबाजी
दिल्ली की फिजाओं में चुनावी रंग छाने लगा है। मामला भले ही निगम उपचुनाव का हो, लेकिन तैयारियां पूरे जोशो-खरोश के साथ की जा रही हैं। निगम के कामकाज पर बयानबाजी से लेकर रोड़ी-गिट्टी डालने की तैयारी, सभी में इसकी झलक देखी जा रही है। स्वराज अभियान ने इसके लिए उम्मीदवार चयन की प्रक्रिया शुरू की तो पुलिस ने यह कहकर उसकी मुसीबत बढ़ा दी कि उसके पास लोगों को इकट्ठा करने की मंजूरी तक नहीं है।
खोखले पड़े दावे
दावा आम आदमी के हित का और काम खास आदमी के हित का! बीते दिनों सड़कों पर प्रीमियम बस सेवा की घोषणा पर सरकार को लेकर यह चर्चा आम रही। किसी ने ठीक ही कहा कि सड़कों पर सामान्य बसों की कमी है और आप सरकार खास सेवा पर वाहवाही लूटने की जुगत में है। वो भी सिर्फ 10 बसें लाकर। सम-विषम को ही लें तो इस बार 1000 बसों की सड़कों पर कमी है। ऐसे में 10 बसें क्या हालात सुधार पाएंगी! एक समय था जब एक दिन में तीन-तीन सौ नई बसें डीटीसी के बेड़े में शामिल होती थीं। इंडिया गेट के सभी सर्किल नई बसों के गवाह हुआ करते थे। ऐसे में किसी की टिप्पणी लाजवाब थी- जब विकास की बात आती है तो ‘शीला’ ही याद आती हैं।

किस्मत का खेल
राजनीति में कुछ नेताओं की किस्मत अच्छी होती है। समय अपने आप ही कुछ ऐसा बनता है कि उनकी कुर्सी सही-सलामत रहती है। प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सतीश उपाध्याय भी उन्हीं नेताओं में से एक हैं। बीते छह महीने से उन्हें बदले जाने की चर्चा चल रही है। जब भी उन्हें बदलने का मामला तूल पकड़ता है, उसी दौरान दिल्ली का राजनीतिक घटनाक्रम कुछ इस तरह से घूम जाता है कि उनकी कुर्सी बच जाती है। इस बार भी उन्हें बदलने का मामला गरम था कि तभी दिल्ली नगर निगम के 13 वार्डों में चुनावों की घोषणा हो गई और उपाध्याय जी की कुर्सी एक बार फिर से बच गई। शायद इसे ही कहते हैं, किस्मत का धनी।

आॅड-ईवन का असर
पूरी दिल्ली आजकल आॅड-ईवन मय हो गई है, चाहे दिल्ली सरकार की मशीनरी हो या आम जनता। आपदा की स्थिति के लिए काम में लाए जाने वाले सिविल डिफेंस के लोग भी पूरी तरह से आॅड-ईवन से जुड़ गए हैं। यह और बात है कि इसके चक्कर में कौन क्या महसूस कर रहा है, आॅड या ईवन? जो भी हो, जो आॅड महसूस कर रहे हैं वो अपना विकल्प तलाश चुके हैं या तलाश रहे हैं। आॅड फील कर रही जनता जहां दूसरी गाड़ियां खरीदने में लगी है, वहीं तीखी धूप और लू में खड़े सिविल डिफेंस के वालंटियर्स नए दोस्त बनाने में लगे हैं। आॅड-ईवन पर जब वालंटियर्स की प्रतिक्रिया जानने की कोशिश की गई तो उनका कहना था कि और कुछ हो न हो लेकिन उन्हें नए दोस्त जरूर मिले। कई जगहों पर इस दोस्ती को गहरा करने मेंं साथ दिया छतरी ने। कुछ चौराहों पर दो वालंटियर्स पर एक ही छतरी दी गई है, ऐसे में ये वालंटियर्स धूप में छतरी ताने घंटों सुख-दुख साझा करते रहते हैं।
-बेदिल