असम भयंकर बाढ़ की चपेट में हैं। हालांकि, यहां के बाशिंदे बाढ़ के साथ-साथ एनआरसी (नैशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजंस) की डेडडलाइन, दोनों के खौफ में जी रहे हैं। नैशनल डिजास्टर रेस्पॉन्स फोर्स (NDRF) के बचावकर्मी परवेश कुमार बीते दो दिनों से मोरीगांव जिले के तुलसीबाड़ी गांव की रहने वाली रीना बेगम को मनाने की कोशिश कर रहे हैं कि वह बाढ़ में आधा डूब चुके घर को छोड़कर सुरक्षित जगह पर चलें, लेकिन वह राजी नहीं हैं।

बचावकर्मी रीना के पड़ोसियों को उनके डूबते घर से निकालकर सुरक्षित जगह ले जा रहे हैं, लेकिन चार बच्चों की दादी 50 साल की रीना बेगम अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। कमर तक पानी में डूबी रीना कहती हैं, ‘हम अपना घर कैसे छोड़ सकते हैं?’ परवेश कुमार ने बताया कि जान जोखिम में होने के बावजूद घर न छोड़ने को तैयार लोगों में सिर्फ रीना बेगम ही शामिल नहीं हैं।

परवेश ने बताया, ‘बहुत सारे परिवार हैं जो अपने घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। कल हम एक बेहद सुनसान इलाके में गए थे। 20 लोग एक घर में फंसे थे, लेकिन उनमें से 7 लोग ही हमारे साथ वापस आए।’

इसके बावजूद, बचावकर्मियों ने उन लोगों को अपना मोबाइल नंबर देकर कहा कि अगर उनका विचार बदले तो वे संपर्क कर सकते हैं। देर रात जब पानी का स्तर और बढ़ गया तो कुमार को एक फोन कॉल आया। कुमार ने बताया, ‘जब हालात बेहद खराब होने लगते हैं तो लोग अमूमन फैसला बदलकर लौटना चाहते हैं।’

असम के मुस्लिम बहुल इलाकों में घर और जमीन ही किसी की पहचान का बड़ा सबूत है। यहां यह जानना बेहद जरूरी है कि एनआरसी के प्रकाशन की डेडलाइन 31 जुलाई ही है। एक स्थानीय अधिकारी ने आशंका जताई कि शायद इसी बात का खौफ है, जिसकी वजह से जान पर खतरा मंडराने के बावजूद ये लोग घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं।

परवेश कुमार ने बताया कि जिन परिवारों ने बाढ़ प्रभावित इलाकों को छोड़ने के लिए हामी भी भरी, उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि उनके दस्तावेज सुरक्षित हों। उन्होंने बताया कि कई मामले ऐसे हुए जब लोगों को बचाकर लाने के बाद वे वापस लौटने के लिए कहने लगे। ऐसा इसलिए क्योंकि वे अपने दस्तावेज भूल आए थे।

बता दें कि बेगम के परिवार समेत राज्य के करीब 52 लाख लोग ऐसे हैं जो इस बार मानसून के बाद आई बाढ़ की चपेट में हैं। असम के 33 जिलों में से 30 पर बुरा असर पड़ा है। 695 कैंपों में करीब 1,47,304 लोग रह रहे हैं। वर्ल्ड हेरिटेज साइट काजीरंगा भी पानी में डूबा हुआ है। कई लोगों का मानना है कि यहां बीते एक दशक के सबसे खराब हालात हैं।