आया राम गया राम शैली की सियासत को देश में सबसे पहले हरियाणा ने ईजाद किया था। पर इन दिनों गोवा इस शैली की सियासत की प्रयोगशाला बन चुका है। महज चालीस सदस्यों की है इस सूबे की विधानसभा। आसानी से किसी पार्टी को नहीं मिलता यहां बहुमत। छोटे दलों के और निर्दलीय विधायकों की मौज होती है। जमकर सौदेबाजी तो करते ही हैं सरकार को अपनी ऊंगलियों पर भी नचाने की हैसियत पा जाते हैं। याद कीजिए 2014 को जब केंद्र में भाजपा को बंपर बहुमत मिला था। तब गोवा में भाजपा की सरकार थी और मुख्यमंत्री थे मनोहर पर्रिकर। उन्हें उनकी इच्छा के विपरीत गोवा से दिल्ली लाकर केंद्र सरकार में रक्षामंत्री बनाया गया था। अपनी सादगी और ईमानदारी के बूते सियासत में अलग मुकाम रहा पर्रिकर का। लेकिन 2017 में जब गोवा का विधानसभा चुनाव हुआ और किसी को बहुमत नहीं मिला तो भाजपा ने सरकार बनाने की ठानी थी।

सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद कांग्रेस को राज्यपाल ने सरकार बनाने का न्योता नहीं दिया था। न्योता देने की सोचती, उससे पहले ही छोटे दलों और निर्दलियों का जुगाड़ लगा नितिन गडकरी ने भाजपा की तरफ से बहुमत का दावा पेश करा दिया था। मुख्यमंत्री बने मनोहर पर्रिकर और उन्हें निर्दलीय व छोटे दलों को भी सौदेबाजी में मंत्री पद देने पड़े। महाराष्ट्रवादी गोमांतक पार्टी का सूबे में लंबे अरसे से सीमित ही सही पर असर तो रहा ही है। पर्रिकर तो किसी तरह गठबंधन सरकार को खींच ले गए पर उनकी बीमारी के दौरान सहयोगी दलों के विधायकों की महत्वाकांक्षा बढ़ गई। पर्रिकर के निधन के बाद तो लगा कि एमजीपी कहीं कांग्रेस के खेमे में न चली जाए। लेकिन इस बार फिर गडकरी का हुनर काम आया। आधी रात के बाद हुई भाजपाई प्रमोद सांवत की बतौर मुख्यमंत्री शपथ। साथ में दोनों छोटे दलों को उपमुख्यमंत्री पद देना पड़ा। लेकिन एक हफ्ते के भीतर भाजपा ने फिर करामात दिखा दी। एमजीपी के धवलीकर की उपमुख्यमंत्री पद से छुट्टी कर उनकी तीन सदस्यीय पार्टी के दो विधायकों को भाजपा में शामिल करा लिया। आधी रात को ही विधानसभा उपाध्यक्ष माइकल लोबो ने दल विभाजन को मंजूरी भी दे डाली।

जब तीन में से दो सदस्य अलग हों तो दल बदल कानून वैसे भी लागू होता ही नहीं। इस सौदेबाजी में भाजपा का क्या गया? धवलीकर की जगह उन्हीं के साथी मनोहर अजगांवकर को बना दिया उपमुख्यमंत्री और दूसरे विधायक पुष्कर भी पा गए मंत्री पद। एमजीपी के मुखिया दीपक धवलीकर के ही भाई थे उपमुख्यमंत्री पद से बर्खास्त किए गए धवलीकर। भाजपा अब इठला रही है कि दल-बदल से ही सही पर कांग्रेस के बराबर हो गई है उसकी हैसियत। ऊपर से भाजपा के सूबेदार विनय तेंदुलकर ने दलील दे डाली कि पर्रिकर की खाली हुई सीट पर उम्मीदवार उतारने का फैसला कर एमजीपी के धवलीकर बंधुओं ने खुद ही कर लिया अपना और अपनी पार्टी दोनों का बंटाधार।