अनिष्ट का कुहासा

नौकरशाही के भी क्या कहने? अपने ही तौर-तरीकों से करती है कामकाज। राजस्थान में अब चुनावी वर्ष देख नौकरशाह आरामतलबी के मूड में आ गए हैं। भाजपा ने जिस तरह अपना सूबेदार बदला और उसकी वजह से सरकार के मंत्रियों की रस्साकसी दिखी, उस नजारे ने आराम की नौकरशाही की मुद्रा को और अनुकूल बनाया। मुख्यमंत्री भी अब नौकरशाही को आखिरी बार मथने की तैयारी में हैं। फिर तो कुछ महीने बाद चुनाव की तारीखों का ऐलान होते ही अचार संहिता लागू हो जाएगी। मुख्य सचिव एनसी गोयल भी इसी महीने रिटायर हो जाएंगे। मंशा तो इस कुर्सी पर वसुंधरा की ऐसे अफसर को बिठाने की होगी जो चुनाव में कुछ फायदा दिला पाए। पर ज्यादातर अफसर तो ऐसे नाजुक मौके पर ठंडे पदों की जुगत में दिख रहे हैं। रही मुख्य सचिव की बात तो डीबी गुप्ता फिलहाल दौड़ में आगे माने जा रहे हैं। वसुंधरा के पसंदीदा भी ठहरे।

यह बात अलग है कि मुख्यमंत्री के कुछ चहेते अफसर उन्हें पसंद नहीं करते। यही कारण है कि उनके खिलाफ कई शिकायतें मुख्यमंत्री तक पहुंचाई जा चुकी हैं। एक पूर्व नौकरशाह भी इस खेल में गुप्ता के खिलाफ साजिश के सूत्रधार बताए जा रहे हैं। दिक्कत यह है कि गुप्ता अगर मुख्य सचिव बन गए तो पूरे ढाई साल रहेंगे इस कुर्सी पर। हां ऐसा होगा तभी अगर दोबारा भी सरकार भाजपा की ही बनेगी। उधर मौजूदा मुख्य सचिव गोयल का कार्यकाल बढ़वाने की कोशिशें भी चल रही हैं। केंद्र सरकार तक हो रही है उनके पक्ष में लाबिंग। आइएएस और आइपीएस ही नहीं बेचैन राज्य की सिविल सेवा के अफसर भी कम नहीं। चला-चली की बेला देख अब ज्यादातर अफसर मंत्रियों की सिफारिशों को भाव नहीं दे रहे। सरकार जरूर अपने कार्यकर्ताओं को चुनावी मौसम में रेवड़ी खिलाने की नीयत से अफसरों और कर्मचारियों के थोक तबादलों का लालीपाप दे रही है। सत्तारूढ़ पार्टी के कार्यकर्ताओं को खूब रास आता है तबादला उद्योग। कुछ भी हो पर भाजपा और सरकार के बीच की उठापटक ने चुनाव में भाजपा की जीत पर आशंका का कुहासा तो फैला ही दिया है।
चुनावी चोला

राजनीति में अब खरे और खांटी लोगों का टोटा दिखाई पड़ता है। कहने को बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अपनी अलग छवि है। दावा तो उसूलों के पाबंद होने का करते हैं पर हकीकत में तो हालत हाथी के दांत जैसी ठहरी। खाने के अलग और दिखाने के अलग। यकीन न हो तो कसौटी पर परख सकते हैं। दावा वे लोहिया, जयप्रकाश और कर्पूरी ठाकुर के रास्ते पर चलने का करते रहे हैं पर आजकल आचरण एकदम उलट है। किसी देवी-देवता की गुहार लगाने से गुरेज नहीं। अलबत्ता मंदिरों में मत्था टेकने का कोई मौका हाथ से जाने नहीं देते। तभी तो पिछले दिनों जानकी मंदिर में जा पहुंचे। वह भी ठीक उस मौके पर जब वहां उत्सव चल रहा था। उससे पहले भी पूजा अर्चना कई मंदिरों में कर दी। उनके ऐसा भक्तिभाव दिखाने पर किसी को कोई आपत्ति क्यों होगी। लेकिन ऐसा भक्तिभाव उन्हें मुख्यमंत्री के रूप में नहीं एक साधारण व्यक्ति के रूप में ही शोभा दे सकता है। जहां तक लोहिया का सवाल है वे तो राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति के धर्मस्थल में जाने के सख्त विरोधी थे। नीतीश को यह बात ध्यान में न हो, कोई कैसे यकीन करे। हकीकत तो यही है कि वोट का मोह नेता से सब कुछ करा रहा है। चुनाव करीब हो तो हर नेता ज्यादा ही धार्मिक आचरण वाला बन जाता है। नीतीश का ध्यान अगले साल होने वाले लोकसभा चुनाव पर टिका है।