देश के पांच राज्यों में पिछले एक महीने से विधानसभा चुनाव की सरगर्मी है। लेकिन वरुण गांधी का अता-पता नहीं। सुल्तानपुर के भाजपा सांसद वरुण को उनकी पार्टी ने कब से दरकिनार कर रखा है। याद कीजिए, 2009 के लोकसभा चुनाव को। तब वरुण पहली बार चुनावी जंग में कूदे थे। अपनी मां की परंपरागत पीलीभीत सीट से बने थे उम्मीदवार। बेटे के फेर में मां मेनका गांधी को आंवला सीट से चुनाव लड़ना पड़ा था। तभी ऐसी सांप्रदायिक टिप्पणी कर बैठे थे कि मायावती सरकार ने रासुका के तहत जेल में डाल दिया था। लेकिन इस विवाद के कारण उनकी जीत का फासला बढ़ा ही था। राजनाथ सिंह जब पार्टी के अध्यक्ष थे तो उन्होंने नेहरू गांधी परिवार के इस सदस्य को खासी तरजीह दी थी। मकसद राहुल से भिड़ाना रहा होगा। लेकिन 2014 में सुल्तानपुर से चुनाव जीतने के बाद भाजपा में उनकी अनदेखी बढ़ती गई। महत्वाकांक्षा उन्होंने उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बनने की पाल ली थी। केंद्र में तो मां के मंत्री रहते उन्हें मौका मिल नहीं सकता था। उनके पक्ष में 2016 में तो बाकायदा अभियान भी छिड़ गया था। पर पार्टी ने खुड्डे लाइन कर दिया।

बीच में एकाध बार परोक्ष रूप से नेतृत्व की आलोचना भी कर बैठे। बहरहाल, कहां तो जब पार्टी में आए थे तो नेतृत्व ने सिर आंखों पर बिठाया था और कहां अब कोई पूछ ही नहीं रहा। संसद में भी पार्टी की तरफ से बोलने का मौका नहीं मिलता। लिहाजा किसानों की समस्याओं का अध्ययन करने में जुट गए। अब ढाई साल के अज्ञातवास के बाद ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर अपनी मोटी किताब लाए हैं। साफगोई अब भी बरकरार है। तभी तो दो टूक कह दिया कि 2014 (यूपीए सरकार का आखिरी साल) की तुलना में 2015 (भाजपा सरकार का दौर) में किसानों ने तीन गुना आत्महत्याएं की। यह आंकड़ा खुद राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो ने ही जारी किया है। वरुण तो एक और खुलासा भी कर रहे हैं कि जब से ब्यूरो ने यह खुलासा किया तभी से उस पर बंदिश लग गई और उसने आत्महत्याओं का आंकड़ा सार्वजनिक करना ही बंद कर दिया है। वरुण चाहते हैं कि ग्रामीण अर्थव्यवस्था स्वावलंबी हो और किसान सरकार का मुंह कतई न ताकें। विकास के ऐसे माडल का ही सपना महात्मा गांधी ने भी तो देखा था।

राजरंग: उत्तराखंड में भाजपा के भीतर सब कुछ सहज नहीं है। मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत और पार्टी के सूबेदार अजय भट्ट के रिश्तों में अंदरखाने तल्खी की खुसर-फुसर सुनाई पड़ने लगी है। भट्ट खुद भी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। वरिष्ठता में भी त्रिवेंद्र सिंह से इक्कीस ही रहे हैं। ताजा मतभेद सरकार में खाली पड़े दो मंत्री पदों और दर्जा प्राप्त मंत्री पदों को लेकर बताया जा रहा है। अनबन देख आलाकमान ने दोनों को दिल्ली तलब कर लिया। चर्चा है कि जिन मंत्रियों के इलाकों में स्थानीय निकाय चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन खराब रहा, उन पर आलाकमान कड़ाई के मूड में है। मसलन हरिद्वार में मदन कौशिक, कोटद्वार में हरक सिंह रावत व गदरपुर से अरविंद पांडेय तीनों मंत्रियों पर तलवार लटकी है। इनके इलाकों में पार्टी को हार का मुंह देखना पड़ा है। अलबत्ता शिक्षा मंत्री धन सिंह रावत और महिला मंत्री रेखा आर्य की तरक्की के चर्चे हैं।

फिलहाल तो ये दोनों राज्यमंत्री हैं। लेकिन आस कैबिनेट मंत्री पद की लगा रहे हैं। मदन कौशिक की जगह मंत्री पद पाने की हसरत रुड़की के विधायक प्रदीप बत्रा ने पाली है। वैसे भी पंजाबी समुदाय का सूबे की सरकार में कोई मंत्री नहीं। अजय भट्ट पार्टी के सूबेदार हैं तो खाली पदों पर अपने नजरिए से नियुक्तियां चाहेंगे ही। पर अधिकार मुख्यमंत्री के पास है तो वे दूसरे को हस्तक्षेप का मौका क्यों दें। मुख्यमंत्री विरोधी खेमा आलाकमान तक मुख्यमंत्री की अपनी जाति के अफसरों को तरजीह देने की शिकायतें भी पहुंचा चुका है। ताजा विवाद पीसीएस से आइएएस बने विवादास्पद अफसर राजीव रौतेला को मिल रही तरजीह के चलते उभरा है।

रौतेला यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ के करीबी रहे हैं। गोरखपुर के कलक्टर रहते इलाज के अभाव में उन्हीं के कार्यकाल में दर्जनों बच्चों की मौत हुई थी। वे यूपी छोड़ना नहीं चाहते थे। पर अदालत के दबाव में उन्हें अपने कैडर उत्तराखंड आना पड़ा। यहां सीधी भर्ती वाले आइएएस अफसर हैरान हैं कि तरक्की पाकर आइएएस बने और अतीत में विवादों से घिरे रहे रौतेला में ऐसी कौन सी खूबी है कि त्रिवेंद्र रावत ने कुमाऊं का कमिश्नर रखते हुए उन्हें अपना सचिव भी बना दिया। कमिश्नर का मुख्यालय नैनीताल है तो मुख्यमंत्री का देहरादून। कौतुहल की बात तो है भी कि एक साथ दोनों शहरों में कैसे बैठेंगे रौतेला।