लड्डू दोनों हाथ

सियासी सूरमा कहो या चतुर सुजान। नीतीश कुमार के लिए कोई भी उपमा दी जा सकती है। बिहार के मुख्यमंत्री दांव-पेच में इतने पारंगत हैं कि उन्हें आसानी से कोई चक्रव्यूह में फंसा ही नहीं सकता। ऐसी चाल चलते हैं कि चित भी उनकी और पट भी उन्हीं की होती है। नोटबंदी के मुद्दे से इसे समझ सकते हैं। पहले उन्होंने ने इसका खुलकर समर्थन किया। तब लगा होगा कि आम आदमी इसका विरोध नहीं कर रहा है। उलटे प्रधानमंत्री की इसके लिए सराहना करता ही दिख रहा है। ऐसे में उन्हें भी आम आदमी के स्वर में स्वर मिलाना चाहिए। पर उनके इस कदम ने भाजपा और नरेंद्र मोदी खेमे में खुशी का संचार कर दिया। उधर बाकी तमाम विरोधी दलों ने नोटबंदी के तौर तरीकों और इससे लोगों को हो रही तकलीफ के बहाने सरकार पर हमला बोला। ऐसा मुखर मुद्दा बना दिया कि संसद का शीतकालीन सत्र ही नोटबंदी की भेंट चढ़ गया। ऐसे में विपक्ष की उम्मीदों के केंद्र नीतीश अपनी अलग राह चले तो सबको अखरा। दबी जुबान से नीतीश की आलोचना भी हुई। मौका ताड़ नीतीश ने अपना बयान संशोधित कर दिया। एक तरफ तो नोटबंदी को अच्छा भी बता दिया पर दूसरी तरफ यह भी जोड़ दिया कि केवल इसी एक कदम से कालाधन खत्म हो पाएगा न भ्रष्टाचार। कुछ और करना पडेग़ा। क्या? इस पर अपने पत्ते नहीं खोले। यानि दोनों हाथों में लड्डू थाम लिए हैं। नोटबंदी का अंजाम सकारात्मक रहा तो कह देंगे कि उनकी रणनीति गलत नहीं थी। पर नोटबंदी का मकसद अधूरा रहा तो सुर बदल लेंगे कि पहले ही चेता दिया था कि महज इतने भर से भ्रष्टाचार नहीं मिटेगा। मतलब यह हुआ कि उस सूरत में भी वे भाजपा विरोध के अगुवा ही बनकर सामने आएंगे। ऐसे कि बाकी विरोधी दलों के नेता पीछे छूट जाएंगे।
जुगाड़ू सीएम

रघुबर दास सयाने निकले। झारखंड के मुख्यमंत्री ने ताड़ लिया कि नोटबंदी के चलते पड़ोसी राज्य पश्चिम बंगाल के लोगों की दिक्कतें कम होती नहीं दिख रहीं। होती भी कैसे? बैंकों में पर्याप्त रकम जो नहीं पहुंच रही थी। लोगों को कहां से देते बैंक वाले। कभी एक हजार के हिसाब से तो कभी दो हजार के हिसाब से बांट दिए। रघुबर दास ने झारखंड में ऐसी किल्लत नहीं होने दी। शुरू में जरूर लोगों को जरूरत के मुताबिक रकम नहीं मिल रही थी। पर बाद में स्थिति तेजी से सुधरी। हालांकि विरोधी तो फिर भी कटाक्ष करने से बाज नहीं आए। चुटकी ले रहे हैं कि केंद्र की सत्तारूढ़ पार्टी की सरकार ठहरी। वह क्यों होने देगी नोट की कमी। दूसरे राज्यों ने भी विरोध में वक्त खपा दिया। चाहते तो दिलचस्पी लेकर वे भी तो झारखंड के मुख्यमंत्री जैसी कारगर व्यवस्था कर सकते थे।