राजनीति भी शह और मात का खेल है आजकल। कौन किसे कब मात देगा, इसी पर चलती है सारी चकल्लस। उत्तराखंड कहने को छोटा सा सूबा ठहरा। लोकसभा की महज पांच सीटें हैं इस सूबे में। पर सियासी उठापटक यहां बारहों महीने बदस्तूर चलती है और इससे न भाजपा बची है और न कांग्रेस अछूती है। त्रिवेंद्र सिंह रावत के मुख्यमंत्री बनने के बाद से हालांकि भाजपा की गुटबाजी और अंतरकलह पहले की तरह सतह पर नजर कम आती है। जबकि कांग्रेस के कुनबे का बिखराव और ज्यादा विस्तार ले रहा है। गुटबाजी शिखर पर है।
राष्ट्रीय स्तर पर ही पार्टी का हाल बेहाल हो तो उत्तराखंड जैसे सूबे की चिंता कौन करे? हरीश रावत को आलाकमान ने पार्टी का राष्ट्रीय महासचिव यह सोचकर बनाया था कि वे सूबे में पार्टी की अंदरूनी गुटबाजी से ऊपर उठेंगे। लेकिन ऐसा हो नहीं पाया। रावत का दिल दिल्ली और गुवाहाटी से ज्यादा देहरादून में ही रमता है। आखिर जमीन से जुड़े नेता ठहरे। यह बात अलग है कि पार्टी के मौजूदा सूबेदार प्रीतम सिंह और विधायक दल की नेता इंदिरा हृदेश उन्हें ज्यादा भाव नहीं दे रहे। दोनों गुट एक-दूसरे पर भारी पड़ने के अवसर की ताक में ज्यादा दिमाग खपाते हैं।
पार्टी को एकजुट कर सत्तारूढ़ भाजपा के खिलाफ अभी तक तो कोई प्रभावी आंदोलन चलाया नहीं। उलटे पिछले दिनों पूर्व सूबेदार किशोर उपाध्याय ने यह हवा जरूर बनाई थी कि आलाकमान जल्द ही सूबे में कांग्रेस का कायाकल्प करेगा। सूबेदार और विधायक दल के नेता दोनों बदले जाएंगे। लेकिन चौदह दिसंबर को दिल्ली में हुई पार्टी की रैली से लौटने के बाद प्रीतम सिंह और इंदिरा हृदेश ज्यादा आत्मविश्वास में दिखे। चर्चा है कि सोनिया गांधी से हरीश रावत और उपाध्याय की शिकायत की। फायदा भी हुआ और सोनिया की इजाजत मिलते ही प्रीतम सिंह ने किशोर उपाध्याय के जमाने से चली आ रही प्रदेश कांग्रेस कमेटी को भंग कर दिया। रावत और उपाध्याय गुट को इससे झटका लगा है। नतीजतन पार्टी में भी अचानक उथल-पुथल मच गई है।
