स्वामी चिन्मयानंद इस बार विरोधियों के जाल में बुरी तरह फंस गए हैं। हरिद्वार और शाहजहांपुर में भव्य आश्रमों और लाखों-करोड़ों श्रद्धालु अनुयायियों की परंपरा के उत्तराधिकारी इस संन्यासी का सियासी जलवा भी गजब का था। तभी तो अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में गृह राज्य मंत्री की कुर्सी तक पहुंच गए थे। विश्व हिंदू परिषद और राम मंदिर आंदोलन की नाव पर सवार होकर कूदे थे सियासी सागर में। राजपूत होने का प्रचार तक करना पड़ा चुनाव जीतने के चक्कर में। जबकि सयानों ने कहा है कि साधू की कोई जात नहीं होती।
राजपूत होने के बावजूद राजनाथ सिंह से कभी पटरी नहीं बैठी। लिहाजा उमा भारती की पार्टी में क्या गए, भाजपा में दोबारा सम्मान पूर्वक दाखिल नहीं हो पाए। गनीमत है कि योगी आदित्यनाथ की लॉटरी खुल गई और वे देश के सबसे बड़े सूबे के मुख्यमंत्री बन गए। चिन्मयानंद को फिलहाल तो योगी से निकटता ने ही बचा रखा है। अन्यथा अपने आश्रम के कालेज की कानून की छात्रा द्वारा किए गए यौन शोषण के आरोप में कब के चिदंबरम की गति को प्राप्त हो गए होते। बहरहाल मामला देश की सबसे बड़ी अदालत तक जा चुका है।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर एक आइजी की अगुआई में विशेष जांच दल ने भी जांच शुरू कर दी है। आपत्तिजनक वीडियो क्लिप सामने आ जाने के बाद कुछ भी कहने की हालत में नहीं बचे हैं स्वामी जी। पैरवी में नामचीन वकीलों की खोज जरूर जुटी है। कुछ साल पहले भी उनकी एक महिला शिष्य ने उन पर ऐसे ही गंभीर आरोप लगाए थे। स्वामी चिन्मयानंद स्वामी धर्मानंद सरस्वती के चेले हैं। उनके हरिद्वार के परमार्थ आश्रम की बड़ी साख रही है लेकिन फिलहाल तो इसी आश्रम में क्यों शाहजहांपुर और बद्रीनाथ के आश्रमों में भी सन्नाटा है। रही परनिंदा रस का सुख लेने की बात तो उनके बहाने हरिद्वार के दूसरे अखाड़ों, आश्रमों और मठों के कई साधु संन्यासियों के निजी जीवन से जुड़े किस्सों को भी चटखारे लेकर सुन और सुना रहे हैं लोग।
(प्रस्तुति : अनिल बंसल)

