लगता है कि अब वसुंधरा राजे अपने पार्टी आलाकमान को मनमाफिक नहीं हांक पाएंगी। पार्टी का सूबेदार कौन हो, इस पर वे लगातार अपनी हठधर्मिता दिखाती रही हैं। पार्टी अध्यक्ष के प्रस्तावित सूबेदार को वे चुनावी साल में स्वीकार करने को तैयार नहीं। नतीजतन आलाकमान भी उनसे रूठा हुआ है। नहीं होता तो मुख्य सचिव एनसी गोयल को सेवा विस्तार देने की उनकी सिफारिश को न ठुकराता। 30 अप्रैल को रिटायर हो गए आखिर गोयल पर केंद्र सरकार से हरी झंडी नहीं आई। मजबूरी में उनकी जगह डीबी गुप्ता को सौंपनी पड़ी सूबे की नौकरशाही की सबसे अहम कुर्सी। लगे हाथ पंद्रह जिलों के कलक्टर भी बदल दिए। यह तो खैर उनके अधिकार क्षेत्र में ठहरा। दिक्कत यह है कि अमित शाह केंद्रीय मंत्री गजेंद्र सिंह शेखावत को पार्टी की कमान सौंपने का मन बना चुके हैं।
लेकिन वसुंधरा इसके लिए राजी नहीं। वे विरोध में लांबिंग भी कर रही हैं। आलाकमान की दुविधा यह है कि वह चुनावी साल में वसुंधरा की बगावत की राह नहीं खोलना चाहता। पर उन्हें राह पर लाने के लिए उनकी अनदेखी तो शुरू कर ही दी है। मुख्य सचिव के सेवा विस्तार की सिफारिश को नामंजूर करके ही नहीं बल्कि कर्नाटक चुनाव के स्टार प्रचारक की सूची में उन्हें शामिल नहीं करके भी संकेत तो साफ दे दिए हैं। जबकि कर्नाटक में राजस्थान के मारवाड़ी मतदाताओं की बहुतायत है। अब आलाकमान ने वसुंधरा के वफादारों को तोड़ने की अघोषित रणनीति भी बनाई है। तभी तो सूबे के पार्टी प्रभारी वी सतीश इस मुहिम में जुट गए हैं कि वसुंधरा की हैसियत का अंदाज लग जाए। करीबियों से कहा है कि कई नेता तो साफ कह रहे हैं कि वे वसुंधरा के बजाए पार्टी का साथ देंगे। उधर, चर्चा है कि राजस्थान के पार्टी सूबेदार का फैसला आलाकमान ने कर्नाटक चुनाव तक टालने में भलाई समझी है। जाहिर है कि इस बार आलाकमान वसुंधरा के आगे समर्पण के मूड में नहीं लगता। उपचुनाव की हार ने यों भी वसुंधरा का रुतबा घटाया है।
गिला अपनों से
हेमवती नंदन बहुगुणा उत्तराखंड के थे। उनके बेटे विजय बहुगुणा सूबे के मुख्यमंत्री भी रहे। देश की सियासत में दशकों तक बहुगुणा का जलवा रहा। उनकी बेटी रीता बहुगुणा इस समय यूपी में मंत्री हैं तो बेटे विजय बहुगुणा उत्तराखंड में कब के भाजपाई बने हैं। बहुगुणा के बारे में उत्तराखंड़ी गर्व से कहते थे- हिमालय का चंदन, हेमवती नंदन। पर उत्तराखंड की ही त्रिवेंद्र सिंह रावत सरकार पहाड़ के इस कद्दावर नेता की जन्मशती के वर्ष में अनदेखी पर उतारू है। जबकि केंद्र और उत्तर प्रदेश में उलट है। दिल्ली में प्रधानमंत्री निवास पर तो समारोह कर उनकी याद में डाक टिकट भी जारी हो गया और उत्तर प्रदेश की योगी सरकार ने भी उनके जन्मदिन पर आयोजनों की झड़ी लगा दी। पर उत्तराखंड सरकार का रवैया किसी को समझ नहीं आ रहा। जबकि बहुगुणा के बेटे विजय बहुगुणा ने कांग्रेस से बगावत कर भाजपा का साथ न दिया होता तो कोई नहीं जानता कि उत्तराखंड में भाजपा सत्ता में आ भी पाती या नहीं।

