तीन स्तरीय पंचायत चुनाव का मतदान तो पश्चिम बंगाल में महज अब रस्म अदायगी सरीखा ही होगा। एक तिहाई से ज्यादा सीटों पर तो पहले ही नतीजे आ चुके हैं। जिसकी लाठी उसकी भैंस की तर्ज पर। ज्यादातर विजेता उम्मीदवार तृणमूल कांग्रेस के ही हैं जो सूबे की सत्ता पर काबिज हैं। पंचायत की 58692 सीटों में से 20076 सीटों पर तो उम्मीदवार निर्विरोध ही चुने जा चुके हैं। इस बार का पंचायत चुनाव लगातार सुर्खियां बटोर रहा है। नामांकन के दौरान ही न केवल व्यापक हिंसा की घटनाएं हुर्इं बल्कि कानूनी जंग भी सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच गई। इस मामले में तीनों विपक्षी दल भाजपा, कांग्रेस और वाममोर्चा एक ही रोना रो रहे हैं कि तृणमूल कांग्रेस ने आतंक फैला कर उनके उम्मीदवारों को नामांकन ही नहीं करने दिए। वाममोर्चे ने तो पिछले महीने विरोध में छह घंटे का बंगाल बंद भी कर दिया था।

राज्य चुनाव आयोग ने खुद आंकड़े जारी कर 34 फीसद उम्मीदवारों के निर्विरोध चुने जाने की पुष्टि कर दी है। यों निर्विरोध चुना जाना दूसरी पार्टियों के राज में भी जारी था। पर 2013 में जब से ममता बनर्जी सत्ता में आई हैं, निर्विरोध जीतने वालों का आंकड़ा बढ़ गया है। सूबे में पंचायत व्यवस्था 1978 लागू हुई थी। तब से जितने भी चुनाव हुए हैं, उनमें निर्विरोध चुने गए उम्मीदवारों की संख्या को जोड़ें तो 23 फीसद बैठती है। इस बार सारे रिकार्ड टूट गए और आंकड़ा 34 फीसद के पार निकल गया। इसके बावजूद तृणमूल कांग्रेस विपक्ष के आतंक पैदा करने के आरोप को स्वीकार करने को तैयार नहीं। खुद ममता बनर्जी ने दलील दी है कि आरोप सही होता तो विपक्षी दलों के हजारों उम्मीदवार अपने नामांकन कैसे कर पाते? ममता तो उल्टा चोर कोतवाल को डांटे के अंदाज में विपक्ष पर ही पंचायत चुनाव में बाधा पहुंचाने का आरोप जड़ रही हैं।