प्रभात झा

जिस तरह इतिहास घटता है, रचा नहीं जाता; उसी तरह राजनेता प्रकृति प्रदत्त प्रसाद होता है, वह बनाया नहीं जाता, बल्कि पैदा होता है। प्रकृति की ऐसी ही एक रचना का नाम है अटल बिहारी वाजपेयी। वे प्रधानमंत्री बनें, यह सिर्फ भाजपा की नहीं, पूरे देश की इच्छा थी। वर्षों तक विपक्ष के नेता रहते हुए उन्होंने भारत का अनेक बार भ्रमण किया।

भ्रमण के दौरान जहां अपनी वाणी से प्रत्येक भारतीय को जोड़ा और भारत को समझा, वहीं सदन के भीतर सत्ता में बैठे लोगों पर मां भारती के प्रहरी बन कर सदैव उनकी गलतियों को देश के सामने रखते रहे। विपक्ष में रहते हुए जितने लोकप्रिय और सर्वप्रिय अटलजी रहे, प्रधानमंत्री रहते हुए भी जवाहरलाल नेहरू उतने लोकप्रिय नहीं हुए।

अटलजी के आचरण और वचन में लयबद्धता और एकरूपता थी। वे जब तक सदन में विपक्ष या सत्ता में रहे तब तक सदन के ‘राजनीतिक हीरो’ रहे। अटलजी थे तो जनसंघ और आगे चल कर भाजपा के, पर उन्हें सभी दलों के लोग अपना मानते थे। उनकी ग्राह्यता और स्वीकार्यता तो इसी से पता लग जाती है कि उन्हें भारत के पूर्व प्रधानमंत्री कांग्रेस के नेता पीवी नरसिंहराव ने सन 1994 में जब प्रतिपक्ष का नेता रहते हुए जेनेवा में संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार आयोग में भारत के प्रतिनिधि मंडल के नेता के रूप में भेजा था। जबकि ऐसी बैठकों में भारत का प्रधानमंत्री या अन्य ज्येष्ठ मंत्री ही नेता के रूप में जाते हैं, इस घटना से सारा विश्व चकित था। वहीं इंदिराजी रही हों या चंद्रशेखर, सभी उन्हें संसद की गरिमा और प्रेरणा मानते हुए सम्मान करते थे।

भारत के राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अटलजी अगर दस वर्ष पहले भारत के प्रधानमंत्री बन गए होते, तो भारत का भविष्य कुछ और होता। आजादी के दूसरे दिन जो प्राथमिकताएं तय होनी थीं, वे अटलजी के प्रधानमंत्री बनने तक तय नहीं हुई थीं। अटलजी ने अपने कार्यकाल में जो ऐतिहासिक और कठोर निर्णय लिए, उसे भारत के राजनीतिक जीवन दर्शन में सदा याद रखा जाएगा।

सन 1977 में आपातकाल हटने के बाद जब जनता पार्टी की सरकार बनी, तब तत्कालीन प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उन्हें विदेश मंत्री बनाया था। उस दौरान की एक घटना आज भी लोगों के जेहन में ताजा है। संयुक्त राष्ट्र में जब विदेश मंत्री के नाते अटलजी पहुंचे और हिंदी में संबोधन किया, तो पूरा भारत झूम उठा था। वे जब जहां और जैसे भी रहे सदा भारत की मर्यादा और भारत को वैभवशाली बनाने का कार्य किया।

उनका मानना था कि हमें हमारी सुरक्षा का पूरा अधिकार है। इसी के तहत मई 1998 में भारत ने पोखरण में परमाणु परीक्षण किया था। वह 1974 के बाद भारत का पहला परमाणु परीक्षण था। यह हिंदुस्तान के शौर्य की धमक और परमाणु पराक्रम की गूंज थी। इस परीक्षण से भारत एक मजबूत और ताकतवर देश के रूप में दुनिया के सामने उभरा।

दुनिया की प्रतिक्रियाएं स्वाभाविक थीं, लेकिन अब भारत के परमाणु महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त हो चुका था और वह दिन लदने जा रहे थे जब परमाणु क्लब में बैठे पांच देश अपनी आंखों के इशारे से दुनिया की तकदीर बदलते थे।

13 दिसंबर, 2001 को आतंकवादियों द्वारा भारतीय संसद पर हमला किया गया। इस हमले में कई सुरक्षाकर्मी शहीद हो गए। आतंरिक सुरक्षा के लिए सख्त कानून बनाने की मांग हुई और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में सरकार ने पोटा कानून बनाया, अत्यंत सख्त आतंकवाद निरोधी कानून था, जिसे 1995 के टाडा कानून के मुकाबले बेहद कड़ा माना गया था। महज दो साल के अंदर इस कानून के तहत आठ सौ लोगों को गिरफ्तार किया गया। और करीब चार हजार लोगों पर मुकदमे दर्ज किए गए। उस दौरान वाजपेयी सरकार ने बत्तीस संगठनों पर पोटा के तहत पाबंदी लगाई। 2004 में यूपीए सरकार ने यह कानून निरस्त कर दिया।

अटलजी हमेशा पाकिस्तान से बेहतर रिश्ते की बात करते थे। उन्होंने पहल करते हुए दोनों देशों के बीच रिश्ते सुधारने की दिशा में काम किया। उनके ही कार्यकाल में फरवरी, 1999 में दिल्ली-लाहौर बस सेवा की शुरुआत हुई थी। पहली बस सेवा से वे खुद लाहौर गए और पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के साथ मिल कर लाहौर दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए। इस लाहौर यात्रा के दौरान वे मीनार-ए-पाकिस्तान भी गए। तब तक भारत का कोई भी प्रधानमंत्री वहां जाने का साहस नहीं जुटा पाया था। मीनार-ए-पाकिस्तान वह जगह है, जहां पाकिस्तान को बनाने का प्रस्ताव 23 मार्च, 1940 को पास किया गया था।

1999 में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के बनने से पहले एचडी देवेगौड़ा सरकार ने जाति आधारित जनगणना कराने को मंजूरी दे दी थी, जिसके चलते 2001 में जातिगत जनगणना होनी थी। मंडल कमीशन के प्रावधानों को लागू करने के बाद देश में पहली बार जनगणना 2001 में होनी थी, कमीशन के प्रावधानों को ठीक ढंग से लागू किया जा रहा है या नहीं इसे देखने के लिए जातिगत जनगणना कराए जाने की मांग जोर पकड़ रही थी। न्यायिक प्रणाली की ओर से बार-बार तथ्यात्मक आंकड़े जुटाने की बात कही जा रही थी, ताकि कोई ठोस कार्य प्रणाली बनाई जा सके। मगर वाजपेयी सरकार ने इस फैसले को पलट दिया, जिसके चलते जातिवार जनगणना नहीं हो पाई।

प्रधानमंत्री के रूप में अटल बिहारी वाजपेयी ने देश को एक सूत्र में पिरोने के लिए सड़कों का जाल बिछाने का अहम फैसला लिया था, जिसे स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना नाम दिया गया। उन्होंने चेन्नई, कोलकाता, दिल्ली और मुबंई को जोड़ने के लिए स्वर्णिम चतुर्भुज सड़क परियोजना लागू की। आज उन्हीं सड़कों के कारण आम आदमी का एक राज्य से दूसरे राज्य जाना आसान हुआ है।

देश में दूरसंचार क्रांति लाने और उसे गांव-गांव तक पहुंचाने का श्रेय भी अटल बिहारी वाजपेयी को जाता है। वाजपेयी सरकार ने 1999 में बीएसएनएल के एकाधिकार को खत्म कर नई दूरसंचार नीति लागू की। नई नीति के जरिए लोगों को सस्ती कॉल दरें मिलीं और मोबाइल का चलन बढ़ा। इस फैसले के बाद ही टेलीकॉम आपरेटर्स ने मोबाइल सेवा शुरू की।

अटलजी की सबसे बड़ी उपलब्धि आर्थिक मोर्चे पर रही। उन्होंने 1991 में नरसिंहराव सरकार के दौरान शुरू किए गए आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाया। उनके समय में जीडीपी वृद्धि दर आठ प्रतिशत से अधिक और मंहगाई दर चार प्रतिशत से कम थी। विदेशी मुद्रा भंडार रिकॉर्ड स्तर पर भरा था।

छह से चौदह साल उम्र के बच्चों को मुफ्त शिक्षा देने का अभियान ‘सर्व शिक्षा अभियान’ अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में ही शुरू हुआ था। इस क्रांतिकारी अभियान से साक्षरता और शिक्षा दर में अभूतपूर्व बढ़ोतरी हुई। वाजपेयी सरकार के इस अभियान ने व्यापक सामाजिक परिवर्तन का मार्ग प्रशस्त किया।

नेहरूजी के जमाने से जनसंघ और वर्तमान की भाजपा, कांग्रेस सहित सभी विपक्षी दलों ने सांप्रदायिकता का आरोप लगाया। अटलजी ने प्रख्यात वैज्ञानिक अब्दुल कलाम को भारत का राष्ट्रपति बना कर सांप्रदायिकता का आरोप लगाने वालों को करारा जवाब दिया। अटलजी ने कभी ‘भारतमाता’ को अपनी आंखों से ओझल नहीं किया। वे जीए, तो भारत मां के लिए और मरे भी तो भारत मां के लिए।  (लेखक पूर्व राज्यसभा सांसद हैं)