देश में खेती-बागवानी में महिलाओं की भूमिका अहम है। फसलों की बुआई से लेकर कटाई तक और मौसम की आहट को समझने का महिलाओं का अनुभव, ये सब मिलकर भारतीय कृषि को आगे बढ़ाता है। मगर विडंबना यह है कि जब खेती के ज्ञान-विज्ञान और नीति की बात आती है, तब महिला की मौजूदगी कमजोर पड़ जाती है। खेत में सबसे अधिक श्रम देने वाली महिला, कृषि-विज्ञान और निर्णय प्रक्रिया में हाशिये पर चली जाती है। यही भारतीय कृषि की सबसे गहरी और अनदेखी असमानता है।

देश में कृषि कार्यबल का बड़ा हिस्सा महिलाओं का है। ग्रामीण भारत में अधिकांश महिलाएं किसी न किसी रूप में खेती से जुड़ी हैं। वे फसल बोती हैं, उनकी देखरेख करती है, फसल काटती हैं, पशु संभालती हैं, बीज सहेजती हैं, अनाज सुखाती हैं और खाद्य प्रसंस्करण करती हैं। इसके बावजूद उनका योगदान सिर्फ श्रम के खाते में दर्ज होता है, ज्ञान के खाते में नहीं। कृषि ऋण, बीमा, तकनीक और बाजार तक भी महिलाओं की पहुंच सीमित रहती है। कृषि से जुड़े फैसले अब भी पुरुष प्रधान ढांचों में लिए जाते हैं। यही कारण है कि कृषि-विज्ञान, शोध और नवाचार के क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षा से बहुत कम दिखाई देती है।

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कृषि विश्वविद्यालयों में नामांकन के आंकड़े पहली नजर में आश्वस्त करते हैं। स्नातक और स्नातकोत्तर स्तर पर छात्राओं की संख्या लगभग बराबरी पर पहुंच चुकी है। मगर यह समानता सतही है। डिग्री हासिल करने के बाद शोध संस्थानों, विस्तार सेवाओं, कृषि प्रौद्योगिकी कंपनियों और नीति निर्माण से जुड़े मंचों पर महिलाओं की उपस्थिति तेजी से घट जाती है। कई बार पारिवारिक जिम्मेदारियां, आर्थिक दबाव और सामाजिक अपेक्षाएं उनके रास्ते रोक लेती हैं। नतीजा यह होता है कि खेत में काम करने वाली महिलाओं की वास्तविक जरूरतें शोध का हिस्सा नहीं बन पातीं।

उनके शरीर के अनुकूल औजार, उनके समय को समझने वाली तकनीक और उनके स्वास्थ्य को ध्यान में रखने वाले नवाचार विकसित नहीं हो पाते। इतना ही नहीं, ग्रामीण महिला किसान का जीवन केवल खेत तक सीमित नहीं रहता। पानी भरना, ईंधन जुटाना, भोजन पकाना, बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल, पशुओं की जिम्मेदारी इन सबका भार उनकी दिनचर्या में जुड़ा रहता है। यह दोहरा बोझ उनके सीखने और आगे बढ़ने के अवसरों को सीमित कर देता है।

लगातार झुकी हुई मुद्रा में काम करने से होने वाले स्वास्थ्य प्रभाव, थकान और समय की कमी को कृषि नीति तथा विज्ञान की बहसों में अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। ऐसे में जब विज्ञान जीवन से कट जाता है, तब उसका लाभ भी सीमित रह जाता है। ग्रामीण महिलाओं के पास पारंपरिक कृषि ज्ञान की अपार संपदा है। मौसम के संकेत, मिट्टी की प्रकृति, बीजों की गुणवत्ता, फसलों की विविधता यह सब अनुभव से अर्जित विज्ञान है।

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यदि इस ज्ञान को औपचारिक शिक्षा और आधुनिक शोध से जोड़ा जाए, तो कृषि नवाचार अधिक व्यावहारिक, मानवीय और टिकाऊ बन सकता है। इसलिए कृषि-विज्ञान में महिलाओं की भागीदारी किसी सामाजिक संवेदना का प्रश्न नहीं, बल्कि कृषि की गुणवत्ता और भविष्य से जुड़ा रणनीतिक मुद्दा है। कर्नाटक के कोलार की एक युवती इसका सशक्त उदाहरण है। छोटे किसान परिवार से ताल्लुक रखने वाली इस युवती ने फसल की कटाई के बाद होने वाले नुकसान को खेत में खड़े होकर महसूस किया। वही अनुभव उनके शोध की दिशा बना।

अब वह आम उत्पादकों के लिए ऐसी तकनीक पर काम कर रही हैं, जिससे फसल नुकसान कम हो और आय बढ़े। यह शोध प्रयोगशाला की कल्पना नहीं, बल्कि खेत की वास्तविक जरूरत से निकला समाधान है। ऐसे ही देश भर में और भी कई युवतियां शोध तथा खेत के बीच की दूरी कम करने के लिए प्रयासरत हैं।

स्नातक और स्नातकोत्तर की पढ़ाई करने के बाद कई युवतियां कृषि में शोध और नवाचार के कार्यों से जुड़ना चाहती हैं, लेकिन आर्थिक और सामाजिक बाधाएं उनका रास्ता रोक देती हैं। सीमित आय के कारण उच्च शिक्षा उनके लिए दूर का सपना बन जाती है। प्रवेश शुल्क, छात्रावास और पाठ्यक्रम से जुड़ी लागत उनके सामने बड़ी बाधा बन जाती है।

फसल विविधता और सतत खेती के माध्यम से ग्रामीण जीवन को अधिक सुरक्षित एवं टिकाऊ बनाने के लिए खेती में महिलाओं के अनुभव को शोध एवं नवाचार से जोड़े जाना बेहद जरूरी है। कोर्टेवा एग्रीसाइंस, दक्षिण एशिया के अध्यक्ष सुब्रत गीड के अनुसार, भारत में किसान परिवारों की अनेक बेटियों को उच्च शिक्षा इसलिए छोड़नी पड़ती है, क्योंकि शुल्क, छात्रावास और पुस्तकों का खर्च उनकी आर्थिक क्षमता से बाहर होते हैं।

ऐसे में मेधा-आधारित छात्रवृत्तियों का विस्तार, महिला विद्यार्थियों के लिए अवसर बढ़ाना और समुदाय-आधारित प्रशिक्षण को शिक्षा से जोड़ना इस प्रतिभा-शृंखला को बनाए रखने में मदद करता है। जब कृषि में काम करने वाली महिलाओं को ज्ञान, कौशल और अवसर मिलते हैं, तब उसका लाभ कुछ लोगों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि पूरा कृषि समुदाय मजबूत होता है। यानी सही समय पर मिला सहयोग प्रतिभा को टूटने से बचा सकता है।

इसी संदर्भ में कृषि क्षेत्र में महिलाओं के लिए चलाए जा रहे छात्रवृत्ति कार्यक्रमों का महत्त्व समझा जाना चाहिए। इनका उद्देश्य केवल शुल्क भरना नहीं, बल्कि छात्राओं को अवसर देना, शोध और नवाचार में उनकी निरंतर उपस्थिति सुनिश्चित करना तथा कृषि-विज्ञान में उनका नेतृत्व विकसित करना है।

ऐसी पहल यह संदेश देती हैं कि ग्रामीण पृष्ठभूमि की बेटियां भी प्रयोगशालाओं, शोध संस्थानों और नीति मंचों तक पहुंच सकती हैं। संयुक्त राष्ट्र की ओर से वर्ष 2026 को ‘अंतरराष्ट्रीय महिला किसान वर्ष’ घोषित किया जाना इसी दिशा में वैश्विक स्वीकारोक्ति है। इस घोषणा से पता चलता है कि महिलाएं केवल कृषि की लाभार्थी नहीं हैं, बल्कि खाद्य सुरक्षा, ग्रामीण समृद्धि और जलवायु अनुकूलन की वाहक भी हैं।

भारत में पुरुषों के शहरों की ओर बढ़ते पलायन से खेती की जिम्मेदारी तेजी से महिलाओं पर आ रही है, पर इस जिम्मेदारी के साथ उन्हें अधिकार और संसाधन नहीं मिल पाए हैं। यही असंतुलन भविष्य के लिए चुनौती बनता जा रहा है। हालांकि, सरकारी स्तर पर कई तरह की पहल शुरू की गई हैं, जिनमें महिला किसान सशक्तीकरण परियोजना, कृषि मशीनीकरण से जुड़ी योजनाएं, स्वयं सहायता समूहों को बढ़ावा और ग्रामीण महिला उद्यमिता कार्यक्रम शामिल हैं।

ये कार्यक्रम दिशा तो दिखाते हैं, पर इनका असर तभी होगा, जब शिक्षा और नेतृत्व को केंद्र में रखा जाएगा। जलवायु परिवर्तन ने कृषि की चुनौतियों को और भी गंभीर बना दिया है। सूखा, बाढ़ और अनिश्चित मौसम का सबसे गहरा असर महिला किसानों पर पड़ता है। इसलिए जलवायु-अनुकूल खेती, फसल विविधता और बाजार से सीधा जुड़ाव उनके लिए विकल्प नहीं, आवश्यकता बन चुके हैं।

किसान दिवस जैसे अवसर केवल औपचारिक आयोजन तक सीमित नहीं रहने चाहिए। कृषि में महिलाओं की शिक्षा पर किया गया निवेश पूरे ग्रामीण समाज में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। जब खेत की मिट्टी से निकली बेटी प्रयोगशाला में खड़ी होती है, तब विज्ञान को असल जमीन मिलती है। यही जमीन देश की कृषि को अधिक संवेदनशील, टिकाऊ और सुरक्षित भविष्य की ओर ले जा सकती है।