‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ यानी SIR एक संवैधानिक प्रक्रिया है जिसे देश का चुनाव आयोग अपने तत्वावधान में करवा रहा है। यह प्रक्रिया उत्तर प्रदेश में भी जारी है और खूब चर्चा में है। चर्चा में इसलिए क्योंकि सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव इस प्रक्रिया पर अपनी सुविधा के मुताबिक बयान देते हैं। शनिवार को उन्होंने इसी मुद्दे पर एक प्रेस कांफ्रेंस की और एक बार फिर सुविधाजनक बातें ही कीं।
अखिलेश ने प्रेस कांफ्रेंस में कई ऐसी बातें कहीं जो विरोधाभासी हैं। जैसे उन्होंने कहा कि सुनने में आ रहा है कि SIR में लगे सभी इंस्टिट्यूशन बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। अगर अखिलेश की यह बात सही मान भी ली जाए तो फिर इसी प्रेस कांफ्रेंस में उन्होंने कहा कि दो करोड़ वोट जिनकी मैपिंग हो गई थी, अब उन्हें अनमैप किया जा रहा है! तो अब अखिलेश के इस दावे पर सवाल यह है कि अगर सभी इंस्टिट्यूशन बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं तो फिर उनसे इतनी बड़ी गलती कैसे हो गई? क्योंकि अखिलेश के दावे के ही मुताबिक ये सभी इंस्टिट्यूशन शुरुआत से ही सत्ताधारी बीजेपी के लिए काम कर रहे हैं। तो क्या सारे ‘षड्यंत्रकारी’ इंस्टिट्यूशन ये समझ ही नहीं पाए कि इतनी बड़ी गलती हो रही है?
एक और विरोधाभास
हाल ही में जब यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चार करोड़ वोट गायब होने की बात कही थी तब अखिलेश ने कहा था कि ये बीजेपी के ही वोट थे। अखिलेश का यह बयान भी विरोधाभासी है। वह यह बता ही नहीं पा रहे कि SIR के दौरान PDA के वोट कट रहे हैं या फिर भाजपा के वोटर्स के।
उनका दावा था कि उनकी पार्टी के सजग एजेंट्स की वजह से वोट नहीं कट पाया। अब ये कैसे संभव है कि ‘षड्यंत्रकारी इंस्टिट्यूशन्स’ सपा के एजेंट्स की सजगता को समझ नहीं पाए? क्योंकि अखिलेश का ही दावा है कि ये ‘इंस्टिस्ट्यूशन्स’ कुछ बहुत शक्तिशाली हैं और कुछ भी कर सकते हैं। तो फिर ये सपा के ‘सजग प्रहरियों’ से पार नहीं पा पाए?
अखिलेश की इन सभी बातों से केवल भ्रम की स्थिति पैदा होती है और कुछ नहीं। सवाल यही है कि अगर SIR की पूरी प्रक्रिया एक साजिश है और ये बीजेपी के इशारे पर अंजाम दी जा रही है तो फिर वोट तो सपा के कटने चाहिए थे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। अखिलेश कहते हैं कि SIR वास्तव में विपक्षी पार्टियों को परेशान करनी की साजिश है लेकिन यूपी में बीजेपी को यह दांव उल्टा पड़ गया। वो कहते हैं कि सपा के सजग प्रहरियों की वजह से उनके समर्थक वोट नहीं काटे जा सके। लेकिन यही अखिलेश यह भी दावा करते रहे हैं कि एसआईआर के तहत पीडीए के वोट काटे जा रहे हैं। नवंबर महीने में अखिलेश ने ही दावा किया था कि लोकसभा चुनाव के दौरान जिन सीटों पर सपा और कांग्रेस के प्रत्याशी जीते थे, वहां पर पचास हजार वोट काटने की साजिश है।
आधुनिक तकनीक और पुराना वोटिंग सिस्टम?
आधार कार्ड की को वोटर आईडी से जोड़ने की बात भी विरोधाभासी है। अखिलेश ने प्रेस कांफ्रेंस में कहा- ‘सुनने में आया है कि बूथ स्तर पर भारतीय जनता पार्टी के पास आधार बनाने की मशीनें हैं। जब भी चुनाव होता है तब भाजपा ऐसी मशीनें लाती है जिससे आधार कार्ड बना लिए जाते हैं। जैसे बड़े बड़े बैंक के मेटल कार्ड होते हैं। सबसे प्रीमियम कार्ड मेटल के होते हैं। उत्तर प्रदेश में जैसी जैसी साजिश हो रही है, उसे देखते हुए आधार को वोटर लिस्ट से जोड़ा जाना चाहिए।’
अब यहां भी अखिलेश यादव दुविधा में दिखते हैं और दूसरों को दुविधा में डालने का प्रयास कर रहे हैं। वोटर आईडी को आधार कार्ड से जोड़ने की मांग करने वाले अखिलेश यादव वही नेता हैं, जो लगातार मांग करते हैं कि अब बैलट पेपर से वोटिंग हो। यानी एक ही चुनावी प्रक्रिया के दौरान वो आधुनिक तकनीक के इस्तेमाल की भी मांग कर रहे हैं और दूसरी तरफ पुरानी बैलट प्रक्रिया की भी वापसी चाहते हैं।
अपनी सुविधा के हिसाब से बयान देते हैं अखिलेश
असल में अखिलेश यादव सभी मुद्दों पर अपनी सुविधा के अनुसार बयान देते हैं। SIR समेत कई ऐसे मुद्दे हैं जिन पर वह या तो खुद भ्रम में हैं या फिर जानबूझकर भ्रम की स्थिति पैदा करने की कोशिश करते हैं। उन्हें यह समझना चाहिए कि वह राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री हैं और एक पार्टी के मुखिया हैं। लोकतांत्रिक और संवैधानिक प्रक्रियाओं पर केवल राजनीतिक लाभ के लिए बयान देने से उन्हें बचना चाहिए।
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(लेखक पेशे से वकील और समाजसेवी हैं। यह उनके निजी विचार हैं)
