डॉ. विनम्र सेन सिंह
उत्तर प्रदेश में प्रतियोगी परीक्षाएं लाखों युवाओं के लिए सरकारी नौकरी का द्वार हैं। 2017 के पहले इन परीक्षाओं की विश्वसनीयता पर सवाल उठते रहे थे, लेकिन योगी आदित्यनाथ सरकार के आने के बाद स्थिति में क्रांतिकारी बदलाव आया है। सरकार ने भ्रष्टाचार मुक्त, पारदर्शी और मेरिट आधारित भर्ती प्रक्रिया को प्राथमिकता दी है। आज उत्तर प्रदेश में बिना किसी सिफारिश या खर्ची-पर्ची के योग्य अभ्यर्थी नौकरी पा रहे हैं। यह बदलाव न केवल युवाओं के सपनों को साकार कर रहा है, बल्कि राज्य की प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत बना रहा है।
पूर्ववर्ती सरकारों में पेपर लीक और घोटालों का दौर
2012 से 2017 तक की अवधि उत्तर प्रदेश में भर्ती घोटालों और पेपर लीक की काली यादों से भरी रही। इस दौरान कई प्रमुख परीक्षाओं में अनियमितताएं सामने आईं, जैसे 2014 में उत्तर प्रदेश संयुक्त प्री-मेडिकल टेस्ट (UP-CPMT) का पेपर लीक होना, जहां प्रश्नपत्रों की सीलबंद बॉक्सेस से छेड़छाड़ पाई गई, जिसके कारण परीक्षा रद्द करनी पड़ी और लाखों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता में डाल दिया गया। इसी तरह 2015 में प्रांतीय सिविल सेवा प्रारंभिक परीक्षा (UPPCS) का पेपर व्हाट्सएप पर लीक हो गया, जिसके कारण अखिलेश यादव सरकार को परीक्षा रद्द करनी पड़ी और छात्रों ने लखनऊ, इलाहाबाद व कानपुर में प्रदर्शन कर आक्रोश जताया। पुलिस कांस्टेबल भर्ती, शिक्षक भर्ती और अन्य चयनों में भी व्यापक धांधली, मेरिट में हेरफेर और पक्षपात के आरोप लगे, जिससे अदालती हस्तक्षेप हुए और भर्तियां वर्षों लटकी रहीं। इन घटनाओं ने युवाओं का विश्वास तोड़ा और राज्य में बेरोजगारी भत्ते जैसी योजनाओं में भी फर्जीवाड़ा सामने आया।
भ्रष्टाचार और अनियमितताओं पर कड़ा प्रहार
योगी सरकार ने सत्ता संभालते ही प्रतियोगी परीक्षाओं में व्याप्त अनियमितताओं पर कड़ा प्रहार किया। पहले की सरकारों में पेपर लीक, नकल और सॉल्वर गैंग जैसी समस्याएं आम थीं, जो युवाओं के भविष्य से खिलवाड़ करती थीं। लेकिन 2017 के बाद सरकार ने जीरो टॉलरेंस की नीति अपनाई। पेपर लीक करने वालों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाने के निर्देश दिए गए। एजेंसियों को ब्लैकलिस्ट करने और दोषियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप, भर्ती प्रक्रियाएं भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद से मुक्त हुईं।
तकनीकी सुधार और कानूनी मजबूती
सरकार ने तकनीकी सुधारों पर भी जोर दिया। डिजिटल मॉनिटरिंग, सीसीटीवी निगरानी और ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया को मजबूत बनाया गया। 2024 में उत्तर प्रदेश पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) अध्यादेश लाया गया, जिसमें पेपर लीक करने वालों को आजीवन कारावास और एक करोड़ रुपये तक जुर्माने का प्रावधान है। इससे न केवल अपराधियों में डर पैदा हुआ, बल्कि परीक्षा प्रक्रिया की पवित्रता बनी रही। पिछले आठ वर्षों में 8.50 लाख से अधिक सरकारी नौकरियां पारदर्शी तरीके से दी गईं, जिसमें पुलिस, शिक्षा, स्वास्थ्य और अन्य विभाग शामिल हैं। यह आंकड़ा खुद बताता है कि सरकार युवाओं के हित में कितनी प्रतिबद्ध है।
पुलिस भर्ती में अभ्यर्थियों को बड़ी राहत, तीन वर्ष की आयु सीमा छूट
हाल ही में योगी सरकार ने पुलिस भर्ती में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। 32,679 पदों की भर्ती के लिए सभी श्रेणियों के अभ्यर्थियों को एक बारगी तीन वर्ष की आयु सीमा में छूट दी गई है। इससे उन लाखों युवाओं को लाभ मिलेगा, जो पिछले वर्षों में देरी के कारण आयु सीमा पार कर चुके थे। यह निर्णय न केवल अभ्यर्थियों की लंबे समय से चली आ रही मांग को पूरा करता है, बल्कि सरकार की संवेदनशीलता को भी दर्शाता है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर जारी इस आदेश से पुलिस बल में योग्य और उत्साही युवाओं की भागीदारी बढ़ेगी, जिससे कानून-व्यवस्था और मजबूत होगी। यह कदम युवाओं के प्रति सरकार के सकारात्मक दृष्टिकोण का जीता-जागता प्रमाण है।
युवा हित में अतिरिक्त पहलें
योगी सरकार की इन पहलों से स्पष्ट है कि प्रतियोगी परीक्षाएं अब केवल योग्यता की परीक्षा हैं। पहले जहां भर्तियां वर्षों लटकी रहती थीं, वहीं अब समयबद्ध और निष्पक्ष प्रक्रिया अपनाई जा रही है। योगी सरकार ने न केवल पेपर लीक पर अंकुश लगाया, बल्कि अभ्यर्थियों की सुविधा के लिए कई योजनाएं शुरू कीं, जैसे मुख्यमंत्री अभ्युदय योजना, जिसमें मुफ्त कोचिंग और मार्गदर्शन दिया जाता है।
योगी सरकार ने प्रतियोगी परीक्षाओं को एक नया आयाम दिया है। पारदर्शिता, मेरिट और युवा हित को सर्वोपरि रखते हुए उठाए गए कदम उत्तर प्रदेश को अन्य राज्यों के लिए मॉडल बना रहे हैं। इन प्रयासों से युवा वर्ग में विश्वास जागा है कि मेहनत का फल जरूर मिलेगा। सरकार की यह प्रतिबद्धता राज्य के विकास और युवा सशक्तिकरण की मजबूत नींव है। आने वाले समय में और अधिक सुधारों की उम्मीद है, जो उत्तर प्रदेश को समृद्ध और न्यायपूर्ण बनाएंगे।
(डॉ. विनम्र सेन सिंह, इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। यह उनके निजी विचार हैं)
