घर बैठे भोजन और अन्य सामान पहुंचाने वाले कर्मियों की पिछले वर्ष के आखिरी दिन यानी 31 दिसंबर को घोषित हड़ताल से संबंधित कंपनियों को आशंका थी कि उनके कारोबार को बड़ा नुकसान हो सकता है। काम का दबाव, असुरक्षा और घटती कमाई के बीच इन श्रमिकों का हड़ताल का मकसद अपनी समस्याओं को देश के सामने लाना था। हालांकि रोजाना का पारिश्रमिक खोने के डर से ज्यादातर श्रमिक इस हड़ताल से दूर रहे। इसमें किसकी जीत हुई और किसकी हार, इससे इतर यह बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण है कि अगर इन कर्मियों के हित की अनदेखी की गई, तो आने वाले समय में शहरों-महानगरों में आनलाइन मांग पर सामान पहुंचने की व्यवस्था पर आश्रित समाज की तकलीफें भी बढ़ेंगी।

इस घटनाक्रम में एक बड़ा बदलाव तब आया, जब इन कर्मियों की सुरक्षा को प्राथमिकता देते हुए केंद्र सरकार ने त्वरित सेवा देने वाली कंपनियों को दस मिनट में सामान पहुंचाने के दावे पर रोक लगा दी। सरकार के निर्देशों के बाद संबंधित कंपनियों ने अपने मंच से यह दावा हटा दिया। सरकार ने यह फैसला सीधे तौर पर सामान पहुंचाने वाले कर्मियों पर पड़ने वाले अत्यधिक दबाव और तेज रफ्तार से होने वाले हादसों को रोकने के उद्देश्य से किया है। बेशक, हड़ताल में ये कर्मी पूरी ताकत से हिस्सा नहीं ले सके, लेकिन जो संदेश वे देना चाहते थे, उसमें वे सफल रहे।

क्या वास्तव में इस क्षेत्र में कर्मियों को काम की आजादी है?

हड़ताल की मांग सामान पहुंचाने वाले कर्मियों के तेलंगाना प्रदेश संगठन की अगुआई में उठी थी, जो पिछले वर्ष 25 दिसंबर को इसी मुद्दे पर सड़कों पर उतरा था। ये घटना देश में हाल के दशकों में पैदा हुई आनलाइन बाजार अर्थव्यवस्था के गहरे संकट का संकेत है- एक ऐसी अर्थव्यवस्था जो देश को भले ही डिजिटल क्रांति की ऊंचाइयों पर ले जा रही है, लेकिन उसके आधार स्तंभों को कमजोर कर रही है। पिछले कुछ अरसे से आनलाइन बाजार अर्थव्यवस्था की हिमायत यह कहकर की जा रही है कि यह वास्तव में ‘स्वतंत्रता का बाजार’ है। इसमें हर कोई अपने मन के मुताबिक काम करने को आजाद है? वे अपने काम के घंटे तय कर सकते हैं। पर सवाल यह है कि क्या वास्तव में इन कर्मियों को काम की आजादी है?

नीति आयोग की वर्ष 2022 की एक रपट के अनुसार, वर्ष 2020 में देश में आनलाइन मांग पर सामान घर पहुंचाने वाले कर्मियों की संख्या करीब 77 लाख थी। यह आंकड़ा वर्ष 2030 तक 2.35 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। इस अर्थव्यवस्था में किशोरों और युवाओं (16-23 वर्ष के) की भागीदारी वर्ष 2019 से 2022 के बीच आठ गुना बढ़ चुकी है। कर्मियों की संख्या बढ़ना यह दर्शाता है कि आनलाइन बाजार बढ़ रहा है, लेकिन इस अर्थव्यवस्था में उपजे संकट की अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए। इस अर्थव्यवस्था को समझने के लिए हमें औद्योगीकरण के बाद विकसित रोजगार शैलियों में झांकना होगा। पारंपरिक रूप से नौकरियां स्थायी (पक्की) या संविदा-आधारित (ठेके) रही हैं, जबकि स्वतंत्र रूप से किए जाने वाले कामकाज में विकल्प खुले रहते हैं। इसके बाद आई आनलाइन मांग आधारित अर्थव्यवस्था, जो एक मुक्त बाजार प्रणाली है, जहां नियोक्ता श्रमिकों को अल्पकालिक कार्य के लिए अनुबंधित करते हैं। ये श्रमिक पारंपरिक नियोक्ता-कर्मचारी संबंधों से बाहर काम करते हैं।

कोविड महामारी के दौरान रफ्तार मिली

आनलाइन बाजार अर्थव्यवस्था को कोविड महामारी के दौरान रफ्तार मिली। जब दुनिया पूर्णबंदी में ठहरी हुई थी, तब घर-घर सामान पहुंचाने वाले श्रमिकों ने इंटरनेट की बदौलत इस अर्थव्यवस्था को जिंदा रखा। स्मार्टफोन के बढ़ते चलन और सस्ते इंटरनेट डेटा ने आनलाइन मंचों तक पहुंच को सुलभ बनाया। आर्थिक उदारीकरण ने प्रतिस्पर्धा बढ़ाई और आनलाइन बाजार में लाखों रोजगार पैदा हुए। ऊपरी तौर पर युवाओं को यह विकल्प आकर्षक लगता है। इसमें काम और जिंदगी का संतुलन, अतिरिक्त आय और लचीलेपन जैसे आकर्षण शामिल हैं। देश के सरकारी ई-श्रम पोर्टल पर वर्ष 2023 में 28.62 करोड़ लोगों ने पंजीकरण कराया था, जो घर पर सामान पहुंचाने वाले श्रमिकों की संख्या में बढ़ोतरी को दर्शाता है।

मगर आइएफएटी और यूनिवर्सिटी आफ पेंसिल्वेनिया के सहयोग से किए गए एक सर्वेक्षण के मुताबिक, घर पर सामान पहुंचाने वाले 43 फीसद श्रमिक दिन में पांच सौ रुपए से कम कमाते हैं। इनमें से करीब 41 फीसद को साप्ताहिक छुट्टी भी नहीं मिलती; 72 फीसद अपना मासिक खर्च नहीं चला पाते और उनकी 30-40 फीसद आमदनी संबंधित मंच का शुल्क चुकाने में जाती है। अगर ये सामान पहुंचाने में देरी कर दें, तो ग्राहक की शिकायत पर नुकसान भी इन्हें उठाना पड़ता है।

जल्दी सामान पहुंचाने के दबाव में हमेशा सड़क दुर्घटना की आशंका बनी रहती है। ऐसे में इन्हें बीमा-सुरक्षा की जरूरत है, लेकिन कम ही कंपनियां ये सुविधा इन्हें दे पाती हैं। सख्त जाड़े, भीषण गर्मी और तेज बरसात में ग्राहक के दरवाजे पर जल्दी पहुंचाने की बाध्यता से कुछ छूट जरूर मिलती है, लेकिन कड़ी मेहनत और तमाम खतरे उठाने के बाद वे आठ से दस घंटे में बमुश्किल चार सौ से सात सौ रुपए की कमाई कर पाते हैं।

पेंशन जैसी सुविधाएं नगण्य

बेशक, कुछ आनलाइन कंपनियां में कर्मियों को अब स्वास्थ्य एवं दुर्घटना बीमा की व्यवस्था है, लेकिन पेंशन जैसी सुविधाएं नगण्य हैं। जिन लोगों के पास मोबाइल इंटरनेट नहीं, वे इस अर्थव्यवस्था से बाहर हैं। यानी उन्हें यहां काम नहीं मिलता। सवाल है कि जब ब्रिटेन की सर्वोच्च अदालत आनलाइन वाहन बुक करने से संबंधित कंपनी के चालकों को न्यूनतम वेतन और छुट्टियों का हक दे सकती है, तो भारत में यह क्यों नहीं किया जा सकता? हालांकि सरकारें इस दिशा में कदम उठाने का प्रयास कर रही है, लेकिन इसकी रफ्तार बहुत धीमी है। जुलाई 2023 में जी-20 की एक बैठक में प्रधानमंत्री ने आनलाइन बाजार में युवाओं के लिए ‘अपार क्षमताएं’ होने की बात कही थी।

राजस्थान ने 22 जुलाई 2023 को आनलाइन बाजार से जुड़े कर्मियों के लिए विधयेक पेश किया था, जिसमें पंजीकरण, कल्याण बोर्ड एवं शुल्क (प्रति लेनदेन), और जुर्माने का प्रावधान था। इसके बाद कर्नाटक ने दो से चार लाख रुपए का मुफ्त बीमा घोषित किया था। मगर पूरे देश में एक समान लागू होने वाले कानूनों का आज भी अभाव है।

सरकार त्रिआयामी नजरिया अपना सकती हैं

सरकार चाहे तो इस मामले में त्रिआयामी नजरिया अपना सकती हैं- पहला, इन कर्मचारियों के लिए सरकारी कोष में कंपनियों का योगदान लिया जाए। दूसरा, बीमा के लिए अनौपचारिक योजनाओं का विस्तार किया जाए, जिसमें कर्मचारी खुद आंशिक योगदान करें। तीसरा, संबंधित कंपनियों से इन योजनाओं के लिए व्यापक समर्थन हासिल किया जाए। हालांकि इस मामले में भी स्व-रोजगार और कंपनियों पर निर्भर होने वाले रोजगार के बीच का धुंधलका साफ नहीं होता है।

एक अहम पहलू यह भी है कि पूरी दुनिया में पारंपरिक नौकरियां घट रही हैं। कृत्रिम बुद्धिमता से इन पर बेइंतहा दबाव है। अनुमान है कि वर्ष 2035 तक ज्यादातर नौकरियां अस्थायी किस्म की होंगी। हालांकि मोटे तौर पर युवाओं को आनलाइन बाजार में नौकरियां पसंद हैं, लेकिन सामाजिक सुरक्षा, अत्यधिक दबाव और काम के घंटों की अनिश्चितता के माहौल से उनकी परेशानियां बढ़ जाती हैं। ऐसे में सरकार और कंपनियों दोनों को मिलकर कोशिश करनी होगी कि इन कर्मियों के भविष्य को सुरक्षित किया जाए। पढ़िए किन मुश्किलों से गुजर रहे Zomato, Blinkit और Swiggy में काम करने वाले डिलीवरी ब्वॉय

(लेखक: अभिषेक कुमार सिंह)