न्याय केवल एक शब्द नहीं, बल्कि वह चुभन है, जो मनुष्य के आत्मसम्मान को भीतर तक घायल कर देती है। कई बार अन्याय इतनी खामोशी से होता है कि पीड़ित को भी देर से एहसास होता है कि उसके साथ गलत हुआ है। कई दफा यह इतना गहरा और स्पष्ट होता है कि व्यक्ति का मन क्रोध, दुख और घुटन से भर जाता है।
किसी भी समाज का स्वास्थ्य केवल अस्पतालों और सड़कें बनाने से नहीं मापा जाता, बल्कि इस बात से आंका जाता है कि वहां रहने वाले लोग कितनी बराबरी, सम्मान और सुरक्षा का अनुभव करते हैं। जब किसी व्यक्ति को उसके हक से वंचित किया जाता है, उसकी आवाज दबा दी जाती है, या उसे उसकी क्षमता के अनुसार मौके नहीं दिए जाते, तो यह न केवल उस व्यक्ति के लिए अन्याय है, बल्कि पूरे समाज के लिए चेतावनी है। क्योंकि, अन्याय कभी अकेला नहीं आता; वह असमानता, क्रोध, हिंसा और टूटे हुए विश्वास को जन्म देता है।
अन्याय का सबसे खतरनाक रूप वह है, जो सामान्य माना जाने लगता है। जैसे- लड़कियों को कुछ सपने देखने से रोका जाना, गरीब को हर मोड़ पर तिरस्कार झेलना, किसी कर्मचारी की मेहनत का श्रेय किसी और को मिल जाना, या किसी छात्र की प्रतिभा को जाति, भाषा या पृष्ठभूमि के आधार पर कम आंकना। ये बातें बाहर से मामूली दिखाई दे सकती हैं, लेकिन वास्तव में यही वे छोटी-छोटी ईटें हैं, जिनसे बड़े और कठोर अन्याय की दीवार खड़ी होती है।
समाज को बदलने के लिए सबसे पहले इस तरह के ह्यछोटे अन्यायह्ण को पहचानना जरूरी है, जो असल में उतने छोटे होते ही नहीं। समाज में आज भी यह अवधारणा मौजूद है कि बेटे की पढ़ाई पर पैसा खर्च करना ‘निवेश्’ माना जाता है, जबकि बेटी की पढ़ाई पर वही राशि खर्च करना अनावश्यक खर्च। कई बार घर में निर्णय लेने का अधिकार सिर्फ पुरुषों के पास होता है, जबकि महिलाएं योग्य होने के बावजूद केवल सुनने तक सीमित रहती हैं। यह सब इतने सामान्य तरीके से होता है कि लोग इसे अन्याय मानना ही छोड़ देते हैं।
कार्यस्थलों पर भी स्थिति अलग नहीं
कार्यस्थलों पर भी स्थिति अलग नहीं है। कई दफा ऐसे कर्मचारी होते हैं, जो पूरी टीम का काम संभालते हैं, समय पर सब कुछ पूरा करते हैं, फिर भी उन्हें पदोन्नति नहीं मिलती। किसी नए कर्मचारी की छोटी गलती पर जोर दिया जाता है, लेकिन पुराने और प्रभावशाली कर्मचारियों की बड़ी गलतियों को नजरअंदाज कर दिया जाता है। नौकरी के मामले में कई लोगों को साक्षात्कार में सिर्फ इसलिए नकार दिया जाता है, क्योंकि उसके पास कोई सिफारिश नहीं होती।
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दूसरी ओर, कम योग्यता या कम प्रतिभा होने के बावजूद अधिक प्रभावशाली व्यक्ति को आसानी से नौकरी मिल जाती है। ये उदाहरण दर्शाते हैं कि कौशल और मेहनत के बावजूद भी अवसर हमेशा बराबर नहीं होते। समाज में भी हम कई तरह के अन्याय रोज देखते हैं। अस्पतालों में आम मरीज घंटों कतार में खड़े रहते हैं, जबकि सिफारिश वाले लोगों को तुरंत उपचार मिल जाता है। पुलिस थाने में शिकायत लेकर जाने वाला आम आदमी कई बार चक्कर लगाता है, जबकि प्रभावशाली लोगों की बात तुरंत सुनी जाती है। सड़क पर अगर किसी गरीब रिक्शेवाले से गलती हो जाए, तो लोग उसे डांटकर भगा देते हैं, लेकिन किसी महंगी कार वाले से कोई कुछ नहीं कहता।
अन्याय का एक सबसे गहरा रूप रिश्तों में दिखता है। कई बार एक साथी रिश्ते में कदम-कदम पर समझौता करता रहता है और दूसरा हमेशा सही माना जाता है। एक दोस्त हमेशा रिश्ते को निभाने के लिए तत्पर रहता है, जबकि दूसरा सिर्फ काम पड़ने पर ही याद करता है। महिलाओं के साथ होने वाला अन्याय तो समाज में इतना गहरा है कि उसे ‘सामान्य’ मान लिया जाता है। लड़की का जन्म होने पर कुछ चेहरे उतर जाते हैं। कार्यस्थल पर महिलाओं को अक्सर कमजोर माना जाता है।
समाज में कब बदलाव आएगा?
समाज में तभी बदलाव आ सकता है, जब लोग इन छोटे-छोटे अन्याय को पहचानना शुरू करें, उनका विरोध करें, और बराबरी की सोच को सामान्य बनाएं। अन्याय तब कम होगा, जब हम सिर्फ कानूनी नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी न्याय को महत्त्व देंगे। जब हम उन लोगों के लिए आवाज उठाएंगे, जो बोल नहीं पाते, जब किसी दुर्बल को उसका हक दिलाने में मदद करेंगे और किसी गलत के सामने चुप रहने के बजाय सही के साथ खड़े होंगे।
यह बात भी उतनी ही सच है कि कोई भी समाज उस दिन कमजोर हो जाता है, जब उसके ईमानदार लोग चुप रहने लगते हैं। चुप्पी कभी-कभी शांति लग सकती है, पर यह भीतर ही भीतर अन्याय को शक्ति देती है। अन्याय को मिटाने के लिए केवल कानून काफी नहीं; उसके लिए संवेदना, साहस और समझ भी जरूरी है। कानून व्यवस्था समाज की रीढ़ है, पर यदि इंसान के भीतर न्याय के प्रति सम्मान नहीं है, तो अन्याय समाप्त नहीं होगा। न्याय केवल अदालतों में ही नहीं मिलता; जब हम अपने व्यवहार में ईमानदारी रखते हैं, किसी कमजोर के पक्ष में खड़े होते हैं, किसी को व्यक्ति को उसके व्यक्तित्व और गुणों के आधार पर तवज्जो देते हैं, तो वह भी न्याय कहलाता है।
क्या दूसरों के लिए आवाज उठाना समय की बर्बादी?
कई लोग सोचते हैं कि दूसरों के लिए आवाज उठाना समय की बर्बादी है। लेकिन सच यह है कि अगर आज हम किसी और के लिए खड़े नहीं होंगे, तो कल हमारे लिए भी कोई खड़ा नहीं होगा। समाज आपस में जुड़े धागों की तरह है- कहीं एक धागा कमजोर पड़ा तो पूरी बुनावट टूटने लगती है। इसी तरह, न्याय के धागे को मजबूत रखने के लिए हम सब की भागीदारी जरूरी है। न्याय तभी संभव है, जब हर व्यक्ति यह समझे कि उसका एक कदम, एक शब्द या एक निर्णय किसी और के जीवन को बदल सकता है। क्योंकि, जब समाज न्यायपूर्ण होता है, तभी वह वास्तव में मजबूत और श्रेष्ठ होता है।
(लेखक: महिमा सामंंत)
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