सूचना के इस असीमित एवं अनियंत्रित प्रवाह के दौर में हम सब सार्वजनिक प्रदर्शन को आतुर हैं। अनावश्यक रूप से हम दुनिया को बताना चाहते हैं कि हम कहां घूम रहे हैं, क्या खा रहे हैं, क्या पहन रहे हैं, हमारी जीवनशैली कितनी चमक-दमक से भरी है। मसलन, कुछ विषय, जिन्हें दो दशक पहले तक निजी माना जाता था, हम अब सोशल मीडिया पर उन्हें भी सरेआम प्रदर्शित कर रहे हैं। सोशल मीडिया के शुरुआती दिनों में यह ठीक लगा, पर समय के साथ ऐसा महसूस होने लगा है कि हम कहीं तो चूक रहे हैं! डिजिटल विकास मानव सभ्यता की एक बड़ी उपलब्धि माना जाता है, पर इसी विकास ने एक ऐसी चुनौती भी सामने रख दी है, जिसकी गंभीरता को हम अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं। निजता की निरंतर कमी अभी के समय की सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभर रही है।

बीते वर्षों में तकनीक ने हमारी दुनिया को भले ही छोटा और सुविधाजनक बनाया हो, पर इसके साथ उसने मनुष्य को इतना सार्वजनिक भी कर दिया है कि उसके निजी जीवन की सीमाएं लगभग धूमिल हो चली हैं। सरल शब्दों में कहें तो आज के समय में हमने अपने शयन-कक्ष में सीसीटीवी कैमरा लगा रखा है और इसकी पहुंच पूरी दुनिया को दे रखी है। असली समस्या यह है कि अपनी इस प्रवृत्ति से हम खुश हैं!

यह विडंबना ही है कि जिस दौर में सूचना सबसे सुलभ है, उसी दौर में मनुष्य अपने बारे में उपलब्ध सूचनाओं पर सबसे कम नियंत्रण रख पा रहा है। यह भी स्पष्ट होता जा रहा है कि आने वाले वर्षों में निजता वही लोग सुरक्षित रख पाएंगे, जिनके पास तकनीकी अनुशासन, जागरूकता और संसाधन होंगे। आज का नागरिक अपने जीवन के अनेक हिस्सों, तस्वीरों, यात्राओं, निजी क्षणों, संबंध, विचार और भावनाओं को जाने-अनजाने में सार्वजनिक कर रहा है और इसे हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मान रहे हैं।

सोशल मीडिया मंच यह भ्रम पैदा करते हैं कि वे इंसान को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता देते हैं, पर वास्तविकता यह है कि वे मनुष्य को निरंतर एक ऐसे सार्वजनिक मंच पर ले आते हैं, जहां वह अपनी निजता खुद क्षीण करता चलता है। निजी और सार्वजनिक के बीच की रेखा लगभग समाप्त हो चुकी है। घर की दीवारें अब सुरक्षा का आश्वासन नहीं देतीं। हम अपने ही हाथों अपनी गतिविधियों को दर्ज करते जाते हैं, और एक बार दर्ज हुई जानकारी हमारी इच्छानुसार मिट नहीं पाती।

क्या हमने सुविधा की तलाश में अपनी सुरक्षा गिरवी रख दी है? एक समय था जब बाजार वस्तुओं पर चलता था। अब बाजार डेटा पर चलता है। यह डेटा हम स्वयं उपलब्ध कराते हैं, और यही डेटा हमारी पहचान, पसंद, आदतों और हमारे व्यवहार का मानचित्र तैयार करता है। इस मानचित्र से कंपनियां अनुमान लगाती हैं कि हम क्या सोचते हैं, क्या खरीदते हैं, किसे पसंद करते हैं और किस बात से प्रभावित होते हैं। यह अनुमान कभी-कभी इतना सटीक होता है कि मनुष्य के खुद को पढ़ने से पहले उसे मशीन पढ़ लेती है। सोशल मीडिया मंच हमें मुफ्त लगते हैं, पर इस मुफ्त के पीछे हमारी निजता का गंभीर मूल्य छिपा है।

आने वाले कुछ ही समय में निजता समाज में वर्ग-भेद का आधार बन जाएगी। भविष्य में समाज का एक छोटा वर्ग वह होगा, जिसकी सार्वजनिक उपस्थिति न्यूनतम होगी। उसके बारे में इंटरनेट पर बहुत कम जानकारी उपलब्ध होगी। यह वर्ग न केवल अधिक सुरक्षित होगा, बल्कि एक प्रकार के ‘एलीट’ समूह के रूप में देखा जाएगा, क्योंकि उसके पास निजता नाम की दुर्लभ निधि होगी। इसके उलट समाज का एक बड़ा हिस्सा वह होगा, जिसकी डिजिटल उपस्थिति अत्यधिक होगी, जिसका जीवन खुली किताब की तरह इंटरनेट पर दर्ज होगा और समाज का यह हिस्सा पिछड़ा हुआ माना जाएगा। निजता ही आने वाले समय का नया ‘स्टेटस सिंबल’ या हैसियत का प्रतीक बन सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता या एआइ, चेहरे से पहचान करने वाली मशीन यानी फेस-रिकग्निशन, डीपफेक जैसे उपकरण जिस गति से विकसित हो रहे हैं, उससे स्पष्ट है कि भविष्य में निजता की समस्या और जटिल होगी। अब किसी व्यक्ति की आवाज, तस्वीर या वीडियो का दुरुपयोग करना पहले से कहीं अधिक आसान हो चुका है। ऐसे माहौल में जो व्यक्ति अपनी जानकारी कम साझा करेगा, वही अधिक सुरक्षित रहेगा। सुरक्षा अब दीवारों या तिजोरियों से नहीं, बल्कि सूचनात्मक संयम से आएगी।

निजता का महत्त्व केवल किसी बात को छिपाने में नहीं है। यह मनुष्य के निर्णयों, उसके मनोविज्ञान और उसकी स्वतंत्रता की रक्षा का मूल सूत्र है। जब किसी व्यक्ति के बारे में कम जानकारी उपलब्ध होती है, तभी उसके पास अपनी पहचान पर नियंत्रण होता है। निजता उसे वह स्थान देती है, जहां वह बिना दबाव, बिना भय और बिना निगरानी के सोच सकता है।

निजता की सुरक्षा की दिशा में हम अभी से कुछ बुनियादी कदम उठा सकते हैं जैसे सोशल मीडिया पर कम व्यक्तिगत जानकारी साझा करना, अपनी जगह को साझा करने को सीमित रखना, अलग-अलग एप को दी गई अनुमतियों की समीक्षा करना, पासवर्ड सुरक्षा मजबूत करना, अनावश्यक डिजिटल गतिविधियों से दूरी बनाना। निजता की रक्षा एक दिन का काम नहीं, बल्कि एक निरंतर प्रक्रिया है।

सूचना-युग में मनुष्य जितना अधिक सार्वजनिक हुआ है, उतना ही अधिक असुरक्षित भी। भविष्य का समाज वही व्यक्ति मजबूत और स्वतंत्र मानेगा, जिसकी व्यक्तिगत जानकारी उसके ही नियंत्रण में होगी। निजता अब केवल एक निजी विषय न रहकर सामाजिक, नैतिक और लोकतांत्रिक प्रश्न बनती जा रही है। इसलिए जरूरी है कि हम आज से ही अपनी निजता को संचित करना शुरू करें, क्योंकि जो बातें हम सहजता से साझा करते हैं, वही भविष्य में सबसे बड़ी कमजोरी भी बन सकती हैं।