Women Empowerment in India: हाल के दिनों में वर्ष भर की चर्चित राष्ट्रीय घटनाओं, दुर्घटनाओं की यादों की पुनरावृत्ति के क्रम में एक पति की हत्या करके ड्रम में डाल देने और हनीमून मनाने के क्रम में हत्या की बहुप्रचारित दो घटनाओं की खूब चर्चा की गई। ये भी कहा गया कि इन दोनों मामलों ने समाज में वैवाहिक रिश्तों की सुरक्षा, भरोसे और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए। निश्चित रूप से ये दोनों घटनाएं भयावह थीं।

इस अपराध में शामिल महिलाओं ने न सिर्फ दो निर्दोष लोगों की हत्या की, उनके माता-पिता और परिवार को जीवन भर का दर्द दिया, बल्कि सामाजिक और पारिवारिक मान्यताओं को भी तार-तार किया। महत्त्वपूर्ण यह भी है कि जब उन्हें उक्त वैवाहिक बंधनों को निभाना नहीं था, तो विवाह नहीं करना चाहिए था।

हालांकि जीवन और परिस्थितियों के अपने-अपने संदर्भ होते हैं और घटनाएं भी उसी मुताबिक संचालित होती रहती हैं। उसमें दूसरों की राय के लिए बहुत जगह नहीं होती। मगर इन बातों को आज के बिगड़ती सामाजिक बनावट, खराब माहौल, स्वतंत्रता की परिभाषा, मोबाइल और सोशल मीडिया के भयानक तरीके से जीवन में घुसपैठ, सांस्कृतिक क्षरण आदि के रूप में देखा जा सकता है। इस विषय पर बहुत सारी बातें हुई हैं।

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टीवी चैनलों ने बहस और चर्चा भी परोसी। महीनों तक हर तरफ घरों, मोहल्लों, चौक-चौराहों यही मुद्दा छाया रहा। पूरी महिला बिरादरी इसके लपेटे में आई और गाहे-बगाहे उन्हें तीखी टिप्पणियों का सामना करना पड़ा। जो हुआ, वह निश्चित तौर पर बुरा था और पूरे समाज ने इसके विरोध में जिस तरीके से एकजुटता दिखाई, वह गौरतलब थी।

इसके समांतर कुछ महत्त्वपूर्ण सवाल, जो इन शोरगुल के बीच दबे रह गए या किसी ने उठाया भी तो लोगों को गौरतलब ही नहीं लगा, वह यह है कि क्या ये दोनों मामले ‘वैवाहिक हत्याओं’ के संदर्भ में इकलौते हैं? क्या कभी लड़कियों की दहेज, अवैध संबंध, झूठे सम्मान के नाम पर हत्या अन्य मुद्दों को लेकर ऐसी ही या इससे भी विद्रूप नृशंस हत्याएं नहीं की गई हैं?

सामूहिक बलात्कार, तेजाबी हमले से मारी जाती, अपंग होती लड़कियों के मामलों पर कभी इतना शोर क्यों नहीं हुआ? कम या ज्यादा उम्र में बलात्कार का दंश भोगती, प्रताड़ित होती, मौत की ओर धकेली जाती अनगिनत महिलाओं के सच को जानकर भी समाज ने अब तक क्या किया है?
हमारे इर्द-गिर्द हर रोज होती ऐसी घटनाएं और साल दर साल महिला उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़ों का सच आखिर क्या है? प्रश्न यह भी कि चंद अपवादों की बात छोड दें, तो क्या दूसरा पक्ष भी परंपराओं, कट्टरता और आपराधिक प्रवृत्ति के त्रास तले उतना ही दंड भोग रहा है?

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ऐसे तमाम आपराधिक कृत्य हर रोज, हर तरफ होते हैं, तो फिर कुछ घटनाओं की तरह सामाजिक एकजुटता इन पर क्यों नहीं दिखाई जाती? संभव है, वैसी ही एकजुटता महिला उत्पीड़न के बढ़ते आंकड़ों की दर को कुछ कम कर देती। यहां आशय लैंगिक आधार पर अपराधों को कम या ज्यादा करके आंकना कतई नहीं है, क्योंकि अपराधी चाहे महिला हो या पुरुष, उसकी प्रवृत्ति सिर्फ अपराध करने की होती है। पीड़ित भी सिर्फ पीड़ित होता है। वर्ग या रसूख के आधार पर अन्याय तथा अनाचार का बंटवारा करना और न्याय का पलड़ा उसके अनुसार मोड़ना अपने आप में एक बड़ी खामी है।

आज के कथित आधुनिक समाज में भी स्त्री को पल प्रति पल अनगिनत मानसिक और शारीरिक अपराधों का सामना करना पड़ता है। यह स्थिति बाहर के साथ-साथ अक्सर घर में भी होती है। कभी मिथ्या सामाजिकता और संस्कृति बचाए रखने, कभी पारिवारिकता को बनाए रखने, कभी प्रचलित फिजूल की परंपराओं के सम्मान में, तो कभी सुरक्षा के नाम पर स्त्री को असंख्य आपराधिक कृत्यों का सामना करना पड़ता है।

शादी के बाद परिवार के भीतर और खासतौर पर पत्नी के प्रति पति के निजी व्यवहार तो हमारे समाज में कभी बहस का विषय रहे ही नहीं हैं। ऐसे उत्पीड़न को आमतौर पर प्यार का नाम देकर बड़ी आसानी से छुटकारा पा लिया जाता है। ज्यादातर महिलाओं ने इसे सच्चाई मानकर स्वीकार कर लिया है।

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अधिकांश परिवार आज भी उसी पुरातन सोच पर कायम है कि बेटियां जिस घर में ब्याही जाती हैं, विपरीत से विपरीत परिस्थिति में भी वही उनका अपना घर होता है। यही सोच लड़कियों को सब कुछ सहकर ससुराल में रहने के लिए विवश करता है। परिवार भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उन्हें ऐसा करने को मजबूर करता है। इसमें सबसे बड़ी भूमिका सोचने-समझने के ढांचे और मानस में घुली सोच की होती है, जिससे छुटकारा पाना केवल साहस और दखल के बूते संभव है, लेकिन इसमें बेटियों की संपत्ति में हिस्सेदारी का डर एक बड़ी भूमिका निभाता है।

चूंकि तमाम कानूनों के बावजूद अभी भी पिता की संपत्ति पर व्यवहार में सिर्फ बेटों का ही अधिकार होता है और ससुराल की संपत्ति तो बेटियों की होती ही नहीं है, तो ऐसे में आर्थिक रूप से पराश्रित लड़कियां मृत्युपर्यंत सब कुछ सहने को अभिशप्त होती हैं। अगर वे आवाज उठाती भी हैं तो ‘घर तोड़ने वाली’ महिला जैसी संज्ञा से नवाजी जाती हैं। इस तरह की सारी परिस्थितियां स्त्रियों की चुप्पी का कारण बनती हैं।

हमारा समाज भी स्त्रियों के अनुपयोगी होने की अपनी धारणा के अनुसार उनके साथ होने वाले तमाम अत्याचारों, यहां तक की मृत्यु पर भी मौन की खाल ओढ़े रहता है। कुछ खास और चर्चित घटनाओं में हत्याओं पर होने वाला शोर और शेष पर मौन उसी का हिस्सा है।

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