डॉ. संत प्रकाश तिवारी
‘जब भी कोई व्यक्ति सत्ता की ओर ललचाई नजरों से देखता है, उसके चरित्र में गिरावट शुरू हो जाती है।’
यह चर्चित कथन अमेरिका के तीसरे राष्ट्रपति थॉमस जैफरसन का है। इस कथन के माध्यम से जैफरसन ने राजनीति में जनसेवा की भावना को महत्वपूर्ण बताते हुए, सत्ता के प्रति अत्यधिक लोलुपता के गंभीर परिणामों की तरफ इशारा किया था। जैफरसन का ये कथन वर्तमान में उत्तर प्रदेश की राजनीति पर बिल्कुल सटीक तरीके से लागू होता है। देश में सबसे ज्यादा लोकसभा सीटों वाले प्रदेश में राजनीति इस वक्त नई करवट ले रही है। परंपरागत रूप से MY ‘मुस्लिम+यादव’ समीकरण पर आधारित समाजवादी पार्टी की राजनीति में एक नया मोड़ आता दिख रहा है। यह मोड़ बेहद दिलचस्प है। पिछले कुछ समय से समाजवादी पार्टी अपनी ‘सेकुलर छवि’ से बाहर आने को आतुर दिख रही है।
कभी जिन मुद्दों को अनफिट पाते थे, अब उन पर अभियान चला रहे अखिलेश
सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव लगातार उन मुद्दों पर भाजपा को घेरने की कोशिश कर रहे हैं, जिन्हें पहले वो राजनीति के लिए ‘अनफिट’ पाते थे। अखिलेश ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक पर बयानबाजी की…ब्राह्मण वोटर्स को लुभाने की कोशिश की। स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद के मुद्दे पर वह लगातार भाजपा सरकार को घेर रहे हैं। जबकि जब अखिलेश खुद मुख्यमंत्री थे तब वाराणसी में अविमुक्तेश्वरानंद पर लाठियां बरसाई गई थीं। क्या मुख्यमंत्री रहते उन्हें तब पता नहीं था कि वाराणसी में क्या हो रहा है? बाद में मांगी गई माफी की चर्चा कम हुई। अब हो रही है। लेकिन उस वक्त तो संदेश ‘अपने वोटबैंक’ को देना था, जो दे दिया गया।
कारसेवकों पर गोली चलवाने वाली छवि से सॉफ्ट हिंदुत्व की तरफ यूटर्न
फिर अब क्या हुआ है जो सपा का रुख बदला-बदला सा नजर आ रहा है। कारसेवकों पर गोली चलवाने की बात सीना तानकर बताने वाली पार्टी कैसे सॉफ्ट हिंदुत्व की राह पर है…ब्राह्मणवाद की राह पर है! क्या अखिलेश का भरोसा अपने वोटबैंक पर से खत्म हो गया? क्या उन्हें 2027 को लेकर एक अनचाहा भय सता रहा है? क्या वह भय AIMIM से भी जुड़ा हुआ है?
शायद ये सभी मुद्दे सपा को परेशान कर रहे हैं। अखिलेश यादव लगातार दो विधानसभा चुनाव में बुरी तरह चुनावी हार झेल चुके हैं। 2027 का चुनाव उनके और उनकी पार्टी के लिए अस्तित्व का सवाल है। दोनों ही चुनाव में उन्हें उनके परंपरागत वोटबैंक ने वोट किया लेकिन चुनावी हार नहीं टाली जा सकी। शायद अखिलेश को लगने लगा है कि उन्हें विधानसभा चुनाव में सॉफ्ट हिंदुत्व की जरूरत पड़ेगी। अविमुक्तेश्वरानंद मामले पर उनका सपोर्ट इसी सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड का नतीजा है।
ब्राह्मण समुदाय के प्रति नया प्रेम
ब्राह्णण समुदाय के प्रति प्रेम का भी स्टैंड भी चुनावी हार के भय से निकला दिखता है। जातीय व्यवस्था की चर्चा होने पर सपा नेताओं के बयान ब्राह्मण समुदाय और ब्राह्मणवाद पर बेहद तीखे रहे हैं। इटावा में कुछ ही समय पहले हुए एक विवाद में कैसे पूरी ट्रोल आर्मी लगातार समुदाय पर निशाना साधा गया था…यह कोई छुपी बात नहीं है।
AIMIM का खौफ
एक बड़ा कारण AIMIM का खौफ भी है। अपने वोटबैंक में बंटवारे और उस पर भरोसा न होने की वजह से सपा ने AIMIM के साथ किसी भी गठबंधन से दूरी बना ली है। सपा नेता शिवपाल यादव ने साफ किया है कि AIMIM के साथ 2027 में कोई गठबंधन नहीं किया जाएगा। इस बयान पर AIMIM सपा को घेर रहे हैं। उनका आरोप है कि सपा केवल अल्पसंख्यकों को वोटबैंक समझती है लेकिन कभी उन्हें मुख्यमंत्री पद नहीं ऑफर करती। जबकि उनकी जनसंख्या 20 फीसदी है।
सपा के नए रुख पर भरोसा करेगी पब्लिक?
कह सकते हैं कि हाल-फिलहाल में सपा के बदलते स्टैंड के पीछे कई कारण हैं। ऐसा लगता है कि अल्पसंख्यक वोटों से उठता भरोसा भी एक अहम वजह है। पार्टी को अब यह लगने लगा है कि केवल एक वोटबैंक के जरिए चुनावी जीत संभव नहीं है। इसीलिए सॉफ्ट हिंदुत्व कार्ड. ब्राह्मण समर्थक कार्ड चलाए जा रहे हैं। वृहद स्तर पर एक चुनावी वोटबैंक बनाने की तैयारी है, जिसके जरिए 2027 की जीत सुनिश्चित की जा सके। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सपा की इस कवायद पर राज्य की जनता भरोसा करती है या नहीं।
(लेखक इलाहाबाद विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं। अखबारों और पत्र-पत्रिकाओं में राजनीतिक-सामाजिक मुद्दों पर लेखन करते हैं।)
