हम जब किसी रिश्ते में प्रवेश करते हैं, तो अक्सर यह सोचकर नहीं आते कि हम क्या महसूस करते हैं, बल्कि यह सोचकर आते हैं कि हमें कैसा व्यवहार करना चाहिए। धीरे-धीरे रिश्ते भावनाओं का नहीं, अपेक्षाओं का मंच बन जाते हैं। हम यह मान लेते हैं कि अच्छे रिश्ते वही हैं, जहां कोई शिकायत न हो, कोई असहमति न हो और कोई थकान दिखाई न दे। यहीं से शुरू होती है ‘परिपूर्ण बनने’ या संपूर्णता की मांग की अदृश्य दौड़। हम हर भूमिका में खुद को ढालने लगते है- बेटी, पत्नी, मां, मित्र, सहकर्मी। और इस ढलने की प्रक्रिया में हम यह भूल जाते हैं कि हम भी एक इंसान हैं, जिसकी अपनी सीमाएं, अपनी जरूरतें और अपनी भावनाएं हैं।

संपूर्ण बनने की यह मानसिकता अचानक विकसित नहीं होती। इसका बीज बचपन में ही बो दिया जाता है, जब हमें सिखाया जाता है कि अच्छे बच्चे कैसे होते हैं। जो बच्चे ज्यादा सवाल न करें, जो बड़ों की हर बात मान लें और जो अपनी भावनाओं को नियंत्रित रखना सीख लें।

लड़कियों के लिए यह सीख और भी सख्त होती है। उन्हें बताया जाता है कि ज्यादा बोलना अच्छा नहीं, अपनी बात मन में रखना ही समझदारी है और रिश्ते निभाने के लिए खुद को पीछे रखना पड़ता है। यही बातें आगे चलकर उनके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाती हैं।

“हम समझते हैं” कह देना आसान है, लेकिन क्या कोई सच में किसी का दुख समझ पाता है?

हर रिश्ता थोड़ा-बहुत समझौता मांगता है, इसमें कोई संदेह नहीं, लेकिन समस्या तब शुरू होती है, जब समझौता आदत बन जाए और अपनी बात रखना स्वार्थ समझा जाने लगे। कई लोग अपनी नाराजगी, थकान और असंतोष को भीतर ही दबाए रखते हैं, ताकि सामने वाला असहज न हो। धीरे-धीरे यह चुप्पी रिश्ते की भाषा बन जाती है। बाहर से सब ठीक दिखता है, लेकिन भीतर एक खालीपन जन्म लेने लगता है। व्यक्ति महसूस करता है कि वह हर रिश्ते में मौजूद है, लेकिन अपनी ही जिंदगी में अनुपस्थित है।

आज के समय में सोशल मीडिया ने परिपूर्णता या संपूर्णता की कसौटी वाले रिश्तों की एक झूठी तस्वीर हमारे सामने रख दी है। हर तरफ मुस्कुराते चेहरे, आदर्श जोड़े और खुशहाल परिवार दिखाई देते हैं। इन तस्वीरों के पीछे की थकान, मतभेद और चुप्पी कभी दिखाई नहीं देतीं। इन सबको देखकर हम अपने वास्तविक रिश्तों से असंतुष्ट होने लगते हैं। हमें लगता है कि कहीं हम ही कम पड़ रहे हैं, हमारा रिश्ता ही अधूरा है। इसी भावना के कारण हम खुद को और ज्यादा बदलने की कोशिश करने लगते हैं।

महिलाओं के जीवन में संपूर्णता की यह अपेक्षा कई गुना अधिक होती है। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे हर परिस्थिति में संतुलन बनाए रखें, सबकी भावनाओं का खयाल रखें और अपनी तकलीफ को कभी प्राथमिकता न दें। जब वे थकती हैं, तो कहा जाता है कि यही उनकी शक्ति है। जब वे चुप रहती हैं, तो उसे सहनशीलता कहा जाता है, लेकिन कोई यह नहीं पूछता कि इस चुप्पी की कीमत क्या है।

कई महिलाएं भीतर ही भीतर टूटती रहती हैं, पर बाहर से मजबूत दिखाई देती हैं। संपूर्ण बनने की यह कोशिश शुरुआत में रिश्तों को सहज बनाए रखती है, लेकिन समय के साथ यह उन्हें खोखला कर देती है। जब भावनाएं व्यक्त नहीं होतीं, तो वे दबकर गुस्से और निराशा का रूप ले लेती हैं। जब संवाद नहीं होता, तो दूरी अपने-आप पैदा हो जाती है।

खामोश अन्याय और टूटता हुआ सामाजिक विवेक

एक समय ऐसा आता है जब व्यक्ति महसूस करता है कि उसने रिश्तों को बचाने के लिए खुद को खो दिया है। तब यह प्रश्न उठता है कि क्या कोई रिश्ता इतना मूल्यवान हो सकता है कि उसके लिए खुद को मिटा दिया जाए? सच यह है कि रिश्तों को परिपूर्ण या संपूर्ण इंसानों की नहीं, बल्कि सच्चे और ईमानदार इंसानों की जरूरत होती है।

रिश्ते तब गहरे होते हैं, जब उनमें असहमति की जगह होती है, सवाल पूछने की आजादी होती है और भावनाओं को साझा करने का साहस होता है। वहां सब कुछ ठीक-ठाक दिखाने की मजबूरी न हो। सबसे पहला और सबसे महत्त्वपूर्ण रिश्ता खुद के साथ होता है। अगर उसी रिश्ते में हम झूठे हो जाएं, तो बाकी रिश्तों में सच्चाई निभाना कठिन हो जाता है।

कुछ बातें भूल जाइए, कुछ लोगों को माफ कर दीजिए, मन भी हल्का होगा, जिंदगी भी

अपनी सीमाओं को पहचानना, अपनी जरूरतों को महत्त्व देना और अपनी भावनाओं को सुनना रिश्तों को स्वस्थ बनाता है। जब हम खुद से ईमानदार होते हैं, तभी हम दूसरों के साथ भी ईमानदारी निभा पाते हैं। वरना रिश्ते केवल निभाने की जिम्मेदारी बनकर रह जाते हैं।

हर दिन अच्छा होना जरूरी नहीं। हर बार समझदार बनना भी जरूरी नहीं। रिश्तों में कभी-कभी अपनी बात रखना, असहमत होना और खुद के लिए खड़ा होना भी उतना ही आवश्यक है। हर कसौटी पर संपूर्ण होने की कोशिश में अगर हम अपनी सच्ची भावनाओं को दबा दें, तो रिश्ते केवल दिखावे का ढांचा बनकर रह जाते हैं।

जबकि रिश्तों की खूबसूरती उनकी अपूर्णता में ही छिपी होती है। शायद अब यह समझने का समय आ गया है कि रिश्ते निभाने के लिए खुद को तोड़ना नहीं पड़ता। उन्हें बचाने के लिए खुद को खोना नहीं होता। रिश्ते तभी टिकते हैं, जब उनमें इंसान होने की पूरी गुंजाइश बची रहे। ‘परिपूर्ण’ या संपूर्णता नहीं, बस सच्चा रहा जाए—यही रिश्तों की सबसे मजबूत नींव है।