जल प्रदूषण आज मनुष्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है। यह प्रबंधन में लापरवाही बरतने का भी नतीजा है। जल के संरक्षण और उसकी स्वच्छता को लेकर योजना बनाने तथा उसे क्रियान्वित करने में गंभीरता एवं कुशलता का अभाव रहता है। घर-घर जल पहुंचाने की योजना जरूर अच्छी है। मगर इसी के साथ नदियों की सफाई और जल आपूर्ति करने करने वाली पाइपलाइनों की समय-समय पर जांच की जाती, तो समस्या गंभीर नहीं होती। इंदौर में दूषित पेयजल के सेवन से हुई लोगों की मौत ने एक बार फिर यह उजागर कर दिया है कि भारत का जल संकट केवल मात्रा का नहीं, बल्कि गुणवत्ता, निगरानी और शासन की गंभीर विफलताओं का परिणाम है। यह घटना किसी एक शहर या राज्य तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उस अदृश्य संकट का प्रतीक है, जो देश के लगभग हर शहरी और अर्ध-शहरी क्षेत्र में अलग-अलग रूपों में मौजूद है। जल, जिसे जीवन का आधार माना जाता है, जब वही जीवन के लिए ही घातक बन जाए, तब यह प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि संस्थागत असफलता का संकेत है।
संयुक्त राष्ट्र की विश्व जल रपट 2024 के अनुसार, विश्व की लगभग 2.2 अरब आबादी को आज भी सुरक्षित पेयजल उपलब्ध नहीं है। भारत, जहां विश्व की अठारह फीसद जनसंख्या निवास करती है और जहां मीठे जल संसाधनों का मात्र चार फीसद हिस्सा उपलब्ध है, वह इस वैश्विक जल संकट के केंद्र में है। मगर इंदौर की घटना स्पष्ट करती है कि चुनौती केवल जल की उपलब्धता तक सीमित नहीं, बल्कि यह सवाल भी उतना ही अहम है कि जो जल उपलब्ध कराया जा रहा है, वह कितना सुरक्षित और उपयोग के योग्य है। घरों तक पहुंचाए जा रहे जल की गुणवत्ता की निरंतर निगरानी का अभाव अब भी बना हुआ है, जिसे दुरुस्त करने की जरूरत है।
नीति आयोग की जल प्रबंधन रपट 2023 में यह चेतावनी है कि भारत के इक्कीस से अधिक बड़े शहर अगले दशक में पानी खत्म होने की भयावह स्थिति का सामना कर सकते हैं। मगर इंदौर का अनुभव बताता है कि संकट भविष्य की आशंका नहीं, बल्कि वर्तमान की भयावह वास्तविकता है। जल आपूर्ति अवसंरचना की जर्जर स्थिति, पेयजल और सीवेज लाइनों का आपसी संपर्क तथा जल गुणवत्ता परीक्षण की कमजोर व्यवस्था ने शहरी और ग्रामीण जीवन के स्वास्थ्य को जोखिम में डाल दिया है। ‘नेशनल इंस्टीट्यूट आफ अर्बन अफेयर्स’ के अनुसार भारत के शहरी जल तंत्र में 35 से 40 फीसद जल पाइपलाइन में रिसाव के कारण बर्बाद हो जाता है। यह केवल संसाधनों की हानि नहीं, बल्कि एक संरचनात्मक खतरा भी है, क्योंकि इन्हीं रिसाव बिंदुओं से दूषित तत्त्व पेयजल में जाते हैं।
इंदौर जैसे शहर, जो स्वच्छता और शहरी प्रबंधन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सराहे जाते रहे हैं, वहां ऐसी घटना यह दर्शाती है कि दृश्य उपलब्धियों के पीछे एक गहरी तकनीकी और निगरानी संबंधी कमी छिपी हुई है। यह समस्या केवल इंदौर तक सीमित नहीं है। देश के विभिन्न बड़े शहरों में समय-समय पर दूषित जल से फैलने वाली बीमारियों के मामले सामने आते रहते हैं। अंतर केवल इतना है कि हर बार परिणाम इतने गंभीर रूप में दर्ज नहीं हो पाते या सरकारी फाइलों में दब जाते हैं। इस उपेक्षा की कीमत नागरिकों को जान देकर चुकानी पड़ती है।
निराशाजनक बात यह है कि औद्योगिक और शहरी प्रदूषण इस संकट को और गहराता है। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण की वर्ष 2023 की एक रपट के अनुसार देश की साठ फीसद से अधिक औद्योगिक इकाइयां अपने अपशिष्ट जल का समुचित उपचार नहीं करतीं। अनुमान है कि भारत का लगभग सत्तर फीसद औद्योगिक अपशिष्ट जल बिना उपचार के नदियों और जल स्रोतों में प्रवाहित होता है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) के आंकड़े बताते हैं कि गंगा और यमुना जैसी नदियों में जैव-रासायनिक आक्सीजन मांग (बीओडी) स्तर मानकों से कहीं अधिक है। यही जल जब शोधन की अपर्याप्त प्रक्रिया से गुजर कर नागरिकों तक पहुंचता है, तो स्वास्थ्य संकट अवश्यंभावी हो जाता है।
स्वाभाविक है कि अब इसके उपाय सोचने होंगे। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और अधिक जटिल बना दिया है। ऐसे में दोराय नहीं कि जल संकट आने वाले समय में और भी गहराएगा। भारतीय मौसम विज्ञान विभाग के अनुसार, बीते पांच दशकों में देश में औसत वर्षा में गिरावट और चरम वर्षा घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। इससे जल स्रोतों की स्वाभाविक पुनर्भरण और शुद्धीकरण क्षमता प्रभावित हुई है। अचानक होने वाली भारी वर्षा के दौरान यदि वर्षा जल का वैज्ञानिक ढंग से संचय न किया जाए, तो वह प्रदूषकों को अपने साथ बहा कर जलाशयों और नदियों में पहुंचा देता है, जिससे जल की गुणवत्ता और अधिक खराब हो जाती है।
इन परिस्थितियों में स्पष्ट है कि जल प्रबंधन को केवल राज्य या राष्ट्रीय स्तर की योजनाओं तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि सूक्ष्म स्तरीय जल प्रबंधन को नीति के केंद्र में लाया जाए। प्रत्येक वार्ड, मोहल्ले और प्रत्येक जल आपूर्ति मंडल के स्तर पर जल गुणवत्ता की नियमित निगरानी, पाइपलाइन नेटवर्क का पृथक्कीकरण और वास्तविक समय के आंकड़ों पर आधारित चेतावनी प्रणाली विकसित की जानी चाहिए। जल सुरक्षा को अब ‘एक समान नीति’ के बजाय ‘स्थान-विशिष्ट समाधान’ के रूप में देखा जाना चाहिए। भारत का जल संकट सर्वव्यापी समस्या है, जिसे सामान्य नीतियों से नहीं, बल्कि स्थानीय और सूक्ष्म स्तर पर लक्षित हस्तक्षेप से ही सुलझाया जा सकता है।
इसके साथ ही, ‘हर घर नल’ जैसी योजनाओं को ‘हर नल सुरक्षित’ की अवधारणा से जोड़ना भी अनिवार्य है। जल आपूर्ति की सफलता केवल ‘कनेक्शन की संख्या’ से नहीं, बल्कि जल की गुणवत्ता, निरंतरता और पारदर्शिता से मापी जानी चाहिए। स्थानीय निकायों को तकनीकी क्षमता, वित्तीय संसाधन और उत्तरदायित्व, तीनों स्तरों पर सशक्त किए बिना यह लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता। इस दिशा में समन्वित प्रयास करने होंगे।
नागरिकों की भूमिका इस संकट में गौण नहीं है। जल उपयोग, संरक्षण और निगरानी को सामुदायिक उत्तरदायित्व के रूप में विकसित करना होगा। स्थानीय स्तर पर जल परीक्षण, शिकायत निवारण और सामाजिक परीक्षण जैसी प्रक्रियाएं इस दिशा में प्रभावी साधन बन सकती हैं। जल केवल सरकार द्वारा प्रदत्त सेवा नहीं, बल्कि समाज की साझी संपदा है और उसकी सुरक्षा भी सामूहिक प्रयास से संभव है।
इंदौर की त्रासदी एक चेतावनी है, लेकिन साथ ही यह अवसर भी है उस सोच को बदलने का, जिसमें जल संकट को केवल भविष्य की समस्या माना जाता रहा है। यदि आज भी जल की गुणवत्ता, अवसंरचना और स्थानीय निगरानी को प्राथमिकता नहीं दी गई, तो ऐसी घटनाएं अपवाद नहीं, बल्कि सामान्य होती जाएंगी। जल संकट अब केवल पर्यावरणीय या तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि सार्वजनिक स्वास्थ्य, सामाजिक न्याय और शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा बन चुका है। भारत के लिए यह समय आत्ममंथन का है। जल प्रबंधन को आंकड़ों और घोषणाओं से आगे बढ़ा कर जमीन पर, गली-मोहल्ले के स्तर पर उतारने की आवश्यकता है। अन्यथा, हर शहर संभावित इंदौर बन सकता है और तब चेतावनियों का मूल्य केवल आंकड़ों में नहीं, बल्कि जनहानि के रूप में चुकाना पड़ेगा।
