हाल ही में प्रधानमंत्री ने शोध एवं विकास में निजी क्षेत्र के निवेश को बढ़ावा देने के लिए एक लाख करोड़ रुपए के कोष की शुरुआत की है। साथ ही उन्होंने यह घोषणा भी की है कि भारत अब उच्च जोखिम एवं उच्च प्रभाव वाली परियोजनाओं को संचालित करते हुए विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में वैश्विक पटल पर एक महाशक्ति के रूप में उभरने के लिए पूरी क्षमता के साथ प्रयास करेगा।
अनुसंधान को गति देने के लिए उठाया गया यह कदम सराहनीय है, क्योंकि अगर यह अपने मूल उद्देश्य के मुताबिक ही अमल में आया, तो इसके अनेक दूरगामी परिणाम दिख सकते हैं। सर्वविदित है कि आज के वैश्विक परिदृश्य का स्वरूप और परिस्थितियां उथल-पुथल और प्रतिस्पर्धा से परिपूर्ण हैं। द्रुत गति से नए रूप धारण करती हुई तकनीक के इस दौर में वही राष्ट्र प्रगति के आयामों को स्पर्श कर सकता है जो अनुसंधान एवं विकास के पैमाने पर ऊंचाई हासिल करता हो।
भारत का बहुत बड़ा घरेलू बाजार उसकी आंतरिक ताकत, निजी निवेश में बढ़ोतरी न होना आर्थिक तरक्की में बाधक
यह महज कोरा तर्क नहीं है, बल्कि प्रमाणित एवं सिद्ध तथ्य है। विज्ञान, प्रौद्योगिकी और नवाचार किसी भी देश की आर्थिक प्रगति के सबसे अहम स्तंभ हैं। जिन देशों ने अनुसंधान एवं विकास में निवेश को प्राथमिकता दी है, आज वैश्विक अर्थव्यवस्था और तकनीकी प्रतिस्पर्धा में अग्रणी हैं। भारत जैसे विशाल जनसंख्या वाले विकासशील राष्ट्र के लिए भी यह आवश्यक हो गया है कि वह शोध और विकास के क्षेत्र में आत्मनिर्भर हो।
भारत में शोध एवं विकास का नेतृत्व मुख्यत: सरकारी संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों ने किया है। आधुनिक युग में वैश्विक प्रतिस्पर्धा तीव्र हो चुकी है। नवाचार और तकनीकी उत्कृष्टता के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की भूमिका अत्यंत निर्णायक बन गई है।
निजी कंपनियों के निवेश न केवल तकनीकी उन्नयन में सहायक हैं, बल्कि रोजगार सृजन, औद्योगिक उत्पादकता और आर्थिक स्वावलंबन में भी उनकी बड़ी भूमिका होती है। वर्तमान युग में किसी देश की आर्थिक शक्ति और क्षमता का निर्धारण केवल प्राकृतिक संसाधनों अथवा जनसंख्या के आधार पर नहीं किया जा सकता, बल्कि वहां के शैक्षिक संसाधन और अनुसंधान व नवाचार की स्थिति भी इस संबंध में अहम भूमिका का निर्वहन करते हैं।
यही कारण है कि विश्व के अग्रणी देश, जैसे अमेरिका, जापान, जर्मनी, दक्षिण कोरिया, चीन आदि अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का एक बड़ा हिस्सा अनुसंधान और विकास में निवेश करते हैं।
शोध एवं विकास के वर्तमान भारतीय परिदृश्य पर गौर करें, तो निश्चित रूप से यह संतोषजनक नहीं है। यहां मौजूदा समय में कुल सकल घरेलू उत्पाद का 0.65 फीसद हिस्सा ही अनुसंधान एवं विकास के लिए खर्च किया जाता है। यह वैश्विक औसत से काफी कम है।
इस निवेश में भी यदि सरकारी तथा निजी क्षेत्र की अलग-अलग हिस्सेदारी की बात की जाए, तो सरकारी क्षेत्र की हिस्सेदारी 65 से 70 फीसद तथा निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी लगभग 30 से 35 फीसद है। वहीं अगर चीन, अमेरिका एवं दक्षिण कोरिया जैसे विकसित देशों के आंकड़ों को देखें, तो पाएंगे कि वहां पर निजी क्षेत्र द्वारा अनुसंधान एवं विकास पर व्यय में किया जाने वाला योगदान लगभग 75 फीसद है। जाहिर है कि हम इस मामले में विकसित देशों से काफी पीछे हैं।
नवाचार एवं शोध का एक उन्नत पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि सरकार के साथ-साथ निजी क्षेत्र भी इस पर ध्यान देते हुए योजनाबद्ध ढंग से अच्छा-खासा निवेश करने का प्रयास करे। निस्संदेह भारत आज सतत रूप से विकास की सीढ़ियां चढ़ रहा है, लेकिन ऐसे कई क्षेत्र हैं जिनमें हम कहीं न कहीं आज भी दूसरे देशों पर निर्भर हैं। शोध एवं नवाचार के माध्यम से हमें निर्भरता की इन्हीं बंदिशों को खत्म करने का प्रयास करना है।
हालांकि पिछले एक दशक में अनेक क्षेत्रों में निजी क्षेत्र की भागीदारी में वृद्धि देखी गई है, विशेषकर सूचना प्रौद्योगिकी, औषधि, जैव-प्रौद्योगिकी, नवीकरणीय ऊर्जा और आटोमोबाइल उद्योग में। मगर निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी का यह अनुपात अभी भी विकसित देशों की तुलना में काफी कम है।
एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2023-24 में शोध एवं विकास में कुल निवेश का लगभग 44 फीसद निजी क्षेत्र द्वारा किया गया। पूरा विश्व आज भारत को निवेश के एक बेहतर विकल्प के रूप में देख रहा है। इस दृष्टि से भी निजी क्षेत्र की भूमिका बढ़ जाती है। यदि अनुसंधान एवं विकास की नींव में निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित हो जाए, तो इन मामलों में हम बहुत जल्द अग्रिम पंक्ति में खड़े नजर आएंगे।
अनुसंधान एवं विकास में निजी क्षेत्र का निवेश निश्चित रूप से संभावनाओं के नए द्वार खोलेगा। निजी क्षेत्र की भागीदारी उत्पादकता सुनिश्चित करेगी। इसके साथ ही तकनीक के इस्तेमाल से उत्पादन की लागत घटेगी। इसका परिणाम यह होगा कि हम धीरे-धीरे आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेंगे।
निजी निवेश का एक परिणाम यह निकलेगा कि इससे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन होगा। कई क्षेत्रों में विभिन्न स्तर के रोजगार पैदा होने से बड़ी संख्या में बेरोजगारों को समायोजित करने में मदद मिलेगी। इससे बेरोजगारी दूर करने की दिशा में प्रयास सफल हो सकेगा। निजी क्षेत्र विदेशी मुद्रा एवं संसाधनों के लिए एक आकर्षण की भूमिका अदा करता है। शोध में निजी क्षेत्र के योगदान से विदेशी कंपनियों और विदेशी पूंजी का प्रवाह भारत की तरफ होगा, जिसका नतीजा यह होगा कि हम कहीं न कहीं अधिक उन्नत तकनीक से अवगत हो सकेंगे। तकनीकी हस्तांतरण प्रगति की रफ्तार को बढ़ाएगा।
निजी क्षेत्र समाज के जीवन स्तर को उठाते हुए समावेशी विकास को सुनिश्चित करेगा। भारत जैसे विकासशील देश के लिए शोध एवं विकास के क्षेत्र में सरकार की जिम्मेदारी और भूमिका सबसे अहम है। मगर निवेश की राह भी इतनी आसान नहीं है। इसके जमीनी स्तर पर सफल क्रियान्वयन में कई चुनौतियां भी आड़े आएंगी। दरअसल, शोध एवं विकास एक अनिश्चित परिणाम वाली दीर्घकालिक प्रक्रिया है। अनेक बार ऐसा होता है कि एक बड़ी अपेक्षा के साथ किया गया प्रयोग असफल भी हो जाता है।
दूसरे शब्दों में कहें, तो शोध एवं विकास की प्रक्रिया जोखिम से परिपूर्ण है। इस जोखिम को उठाने की क्षमता निजी क्षेत्र की प्रत्येक इकाई के पास नहीं है। इसके अलावा, एक अन्य अहम बिंदु यह भी है कि शोध के परिणाम एक लंबी अवधि की प्रक्रिया के संपन्न होने के बाद ही प्राप्त होते हैं।
ऐसी नीतियां और माहौल तैयार हो, तो निजी क्षेत्र शोध एवं विकास के क्षेत्र में निवेश करने के लिए स्वत: उत्साहित होंगे। अगर निजी क्षेत्र निवेश के लिए आगे आता है, तो उसे दीर्घकालिक प्रतिफल के लिए धीरज रखने की जरूरत होगी और सरकार को भी इस मसले पर स्पष्टता बनानी होगी कि यह निजी क्षेत्र के लिए केवल लाभ का मसला नहीं है।
आज तेजी से बदलती हुई परिस्थितियों की मांग यह है कि शोध एवं विकास की ओर गंभीरतापूर्वक ध्यान देते हुए इसे राष्ट्र की प्राथमिकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। ऐसा करके ही हम राष्ट्र की समग्र प्रगति एवं विकास को सुनिश्चित कर सकेंगे।
