भारत की गिनती विश्व की सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में की जाती है। विकास की यह यात्रा सड़कों, इमारतों, डिजिटल सुविधाओं, वैश्विक निवेश और सकल घरेलू उत्पाद जैसे मानकों के आंकड़ों से मापी जाती है। मगर इस चमकदार तस्वीर के पीछे एक ऐसा प्रश्न लगातार अनुत्तरित है, जिसे अनदेखा करना अब संभव नहीं। यह सवाल है—क्या देश की महिलाएं इस विकास यात्रा में समान रूप से सहभागी हैं? यदि नहीं, तो क्यों? यह मसला केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और राष्ट्रीय प्रगति की नींव से जुड़ा है।
यह सच है कि हाल के वर्षों में महिलाओं की शिक्षा में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। विद्यालयों और महाविद्यालयों में छात्राओं की संख्या कई स्थानों पर छात्रों से अधिक है। परीक्षा परिणामों में भी वे अव्वल रहती हैं। यह एक सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है, जो दशकों के प्रयासों का नतीजा है। इसके बावजूद जब शिक्षा से रोजगार की ओर बढ़ने का समय आता है, तो कार्यबल में महिलाओं की उपस्थिति बहुत कम नजर आती है। यह विरोधाभास भारतीय समाज की गहरी संरचनात्मक समस्याओं को उजागर करता है।
घर से लेकर दफ्तर तक… कौन लेता है फैसला? महिला सशक्तिकरण सिर्फ शब्द नहीं, जमीनी बदलाव की दरकार
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण 2024-25 के अनुसार, भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी दर लगभग तैंतीस फीसद के आसपास है, जबकि पुरुषों की भागीदारी दर पचपन फीसद से अधिक है। यह अंतर केवल आंकड़ों का नहीं, बल्कि सामाजिक संरचना और अवसरों की असमानता का द्योतक है।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य में स्थिति और चिंताजनक हो जाती है। अनेक विकासशील देशों में महिलाओं की श्रम भागीदारी भारत से कहीं अधिक है। ग्रामीण भारत में महिलाओं की श्रम भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक दिखाई देती है, पर उसका स्वरूप चिंताजनक है। अधिकांश महिलाएं कृषि, घरेलू उत्पादन या पारिवारिक श्रम में संलग्न हैं, जहां उन्हें न तो नियमित वेतन मिलता है और न ही सामाजिक सुरक्षा।
उनका श्रम आधिकारिक आंकड़ों में दर्ज तो हो जाता है, मगर आर्थिक रूप से आत्मनिर्भरता और सामाजिक सम्मान उन्हें प्राप्त नहीं होता। शहरी क्षेत्रों में महिलाएं शिक्षित और कुशल हैं, मगर सुरक्षित, सम्मानजनक और स्थिर रोजगार तक उनकी पहुंच सीमित है। इसके परिणामस्वरूप वे या तो अल्प वेतन पर काम करती हैं या फिर कार्यबल से पूरी तरह बाहर हो जाती हैं।
महिला सशक्तीकरण के बिना राष्ट्र की समृद्धि संभव नहीं
महिलाओं की कार्यबल से दूरी सामाजिक अपेक्षाओं, पारिवारिक जिम्मेदारियों और मानसिक दबाव से भी गहराई से जुड़ी है। आज भी अधिकांश परिवारों में यह अपेक्षा बनी हुई है कि घर, बच्चे और बुजुर्गों की देखभाल का दायित्व मुख्यत: महिलाओं का ही है। जब काम और घर के बीच संतुलन बनाने की बात आती है, तो सबसे पहले महिला को ही करिअर का त्याग करना पड़ता है।
यह त्याग स्वैच्छिक कम और परिस्थितिजन्य अधिक होता है। समाज में गहराई से बैठी यह धारणा कि महिलाओं की प्राथमिकता घर है और कार्य केवल एक विकल्प, उनकी आर्थिक स्वतंत्रता में सबसे बड़ी बाधा है।
एक अन्य गंभीर समस्या है ‘वेतन असमानता’। विभिन्न अध्ययनों से पता चलता है कि भारत में समान कार्य के लिए महिलाओं को पुरुषों की तुलना में औसतन बीस-पच्चीस फीसद कम वेतन प्राप्त होता है। यह अंतर महिलाओं के आत्मविश्वास, कार्य-संतोष और दीर्घकालिक आर्थिक सुरक्षा को गहराई से प्रभावित करता है। यह राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था के लिए भी नुकसानदेह है, क्योंकि इससे महिलाओं की क्रय शक्ति और उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति कमजोर होती है।
सरकार की ओर से महिला केंद्रित अनेक कानून और योजनाएं बनाई गई हैं। इनमें कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से संरक्षण, मातृत्व लाभ, समान वेतन का अधिकार और महिला-केंद्रित कौशल विकास कार्यक्रम भी शामिल है। मगर समस्या कानूनों की अनुपस्थिति की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है।
अनेक महिलाएं आज भी अपने अधिकारों से अनभिज्ञ हैं, और जो जागरूक हैं, वे सामाजिक दबाव या नौकरी छूटने के भय से आवाज उठाने से परहेज करती हैं। कार्यस्थलों पर शिकायत निवारण तंत्र या तो मौजूद नहीं होते या फिर इतने कमजोर होते हैं कि महिलाएं उन पर भरोसा नहीं कर पातीं।
पिछले वर्ष प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, भारत में कार्यरत महिलाओं का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक क्षेत्र में है, जहां न तो कार्य समय निश्चित है और न ही भविष्य की कोई सुरक्षा। स्थिति तब और गंभीर हो जाती है, जब महिलाएं गर्भावस्था, प्रसव या पारिवारिक कारणों से कार्य से विराम लेती हैं। पुन: कार्यबल में लौटना उनके लिए कठिन हो जाता है, क्योंकि नियोक्ता अनुभव में आए इस अंतर को नकारात्मक रूप से देखते हैं।
हालांकि कुछ सकारात्मक उदाहरण भी सामने आए हैं। कुछ राज्यों में महिलाओं के लिए विशेष रोजगार योजनाएं, स्वयं सहायता समूह और कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रम शुरू किए गए हैं। वर्ष 2025 में तमिलनाडु समेत कुछ राज्यों में महिलाओं को गुणवत्तापूर्ण रोजगार से जोड़ने की दिशा में प्रयास किए गए हैं।
केरल और महाराष्ट्र में भी महिला उद्यमिता को बढ़ावा देने के लिए विशेष वित्तीय सहायता एवं मार्गदर्शन कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। यह दर्शाता है कि यदि नीति, इच्छाशक्ति और सामाजिक सहयोग एक साथ आएं, तो परिवर्तन संभव है। हालांकि इन प्रयासों का प्रभाव तब तक सीमित रहेगा, जब तक समाज की सोच में परिवर्तन नहीं होगा। महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी केवल महिला सशक्तीकरण का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र की आर्थिक प्रगति में बराबर की हिस्सेदारी से जुड़ा मसला भी है।
विभिन्न अध्ययनों में यह बात उभर कर सामने आई है कि यदि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों के समान स्तर तक पहुंच जाए, तो देश की अर्थव्यवस्था में उल्लेखनीय वृद्धि हो सकती है। विश्व बैंक और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के आकलन के अनुसार, भारत अपनी जीडीपी में बीस-तीस फीसद तक की वृद्धि दर्ज कर सकता है, यदि लैंगिक अंतर को समाप्त कर दिया जाए।
आज के दौर में यह जरूरी है कि कार्यस्थलों को अधिक समावेशी बनाया जाए, जहां लचीले कार्य समय, सुरक्षित परिवहन, बाल देखभाल सुविधाएं और समान वेतन सुनिश्चित हों। साथ ही परिवार और समाज को भी यह स्वीकार करना होगा कि महिला का कार्य करना कोई विकल्प नहीं, बल्कि उसका अधिकार है। पुरुषों को भी घरेलू जिम्मेदारियों में समान भागीदारी निभानी होगी। जब तक यह समझ विकसित नहीं होगी, तब तक कानून कागजों में और अवसर आंकड़ों में ही सिमटे रहेंगे।
कंपनियों को केवल विविधता के आंकड़े प्रस्तुत करने से आगे बढ़कर वास्तविक समावेशन की संस्कृति विकसित करनी होगी। महिलाओं के लिए कौशल कार्यक्रम, नेतृत्व विकास प्रशिक्षण और करिअर पुन: प्रवेश कार्यक्रम आवश्यक हैं। साथ ही कार्यस्थल पर सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करने के लिए सख्त नीतियां और उनका पालन अनिवार्य है।
सवाल यही है कि क्या हम महिलाओं को केवल योजनाओं का लाभार्थी मानते रहेंगे, या उन्हें विकास का सक्रिय सहभागी बनाएंगे? जब तक महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी सम्मान, सुरक्षा और समानता के साथ सुनिश्चित नहीं होती, तब तक यह कहना कठिन है कि भारत का विकास वास्तव में समावेशी है। कानून मौजूद हैं, वादे और घोषणाएं भी हैं, पर अब समय की मांग है कि अवसर भी उतने ही स्पष्ट, सुलभ और समान हों। यह परिवर्तन केवल सरकारी नीतियों से नहीं, बल्कि सामाजिक मानसिकता में आमूलचूल बदलाव से ही संभव है।
