वैश्विक चुनौतियों, अनिश्चितताओं और अमेरिकी शुल्क के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत दिखाई दे रही है। पिछले कुछ दिनों से भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय रपटों में यह बात उभरकर सामने आई है। इस समय देश पर अमेरिका के पचास फीसद शुल्क की वजह से निर्यात कारोबार प्रभावित हो रहा है, इसके बावजूद वर्ष 2026 में भी देश के विकास की रफ्तार बने रहने की संभावनाएं जताई जा रही हैं। खासतौर से देश में ब्याज दर में कटौती, कच्चे तेल की कीमतों में कमी और महंगाई घटने की जो प्रबल संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, उनसे आम आदमी, बाजार और अर्थव्यवस्था बेहतर होने की उम्मीद है।

आइआइएफएल कैपिटल की हाल की एक रपट के मुताबिक, आरबीआइ वर्ष 2026 में ब्याज दरों में 0.50 फीसद की और कटौती कर सकता है। साथ ही कच्चे तेल की कीमतें भी कम हो सकती है। इसी तरह एसबीआइ रिसर्च की हालिया रपट में कच्चे तेल की कीमतों के जून 2026 तक पचास डालर प्रति बैरल के स्तर पर पहुंचने का अनुमान है। ऐसे में सस्ते तेल से महंगाई 3.5 फीसद से नीचे आ सकती है और विकास दर भी 7.45 फीसद तक पहुंच सकती है।

वैश्विक रेटिंग एजंसी मूडीज ने अपनी ताजा रपट में कहा कि चालू वित्त वर्ष 2025-26 में भारत की विकास दर 7.3 फीसद रहेगी। इससे पहले 14 जनवरी को प्रकाशित विश्व बैंक की ‘ग्लोबल इकोनामिक प्रास्पेक्ट्स’ रपट में कहा गया कि वैश्विक चुनौतियों के बीच भी भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्था बना रहेगा। विश्व बैंक ने चालू वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर के पूर्व अनुमान 6.3 फीसद को बढ़ाकर 7.2 फीसद कर दिया है।

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आइएमएफ) की रपट में कहा गया है कि भारतीय अर्थव्यवस्था मजबूती के साथ आगे बढ़ रही है और भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए विकास का एक प्रमुख इंजन बना हुआ है। इसी तरह संयुक्त राष्ट्र ने हाल में वैश्विक अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित रपट में अमेरिकी शुल्क की चुनौती के बीच भारत की मजबूत घरेलू मांग के आधार पर देश की अर्थव्यवस्था के बढ़ने का अनुमान जताया है। इन सबके बीच वर्ष 2028 तक अमेरिका और चीन के बाद भारत के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने की उम्मीद की जा रही है।

वैश्विक परामर्श कंपनी बीसीजी की ‘ग्लोबल कंज्यूमर रडार’ रपट के अनुसार, भारतीय उपभोक्ता मौजूदा आर्थिक मंदी और भू-राजनीतिक संघर्षों से अप्रभावित हैं और भारत 2026 में दुनिया का सबसे आशावादी उपभोक्ता बाजार दिखाई देगा। ऐसे में भारतीय उपभोक्ताओं को महंगाई घटने और ब्याज दरों में कमी से खरीदारी के लिए नई शक्ति मिल सकती है।

पिछले माह, यानी दिसंबर, 2025 में आरबीआइ की ओर से मौद्रिक नीति समीक्षा बैठक में रेपो दर में की गई कटौती के बाद रेपो दर अब 5.25 फीसद हो गई है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि खाद्यान्न के रेकार्ड उत्पादन और अच्छे मानसून के बाद कृषि तथा औद्योगिक क्षेत्रों को मिली अनुकूलता से आगामी महीनों में महंगाई में और कमी आने की उम्मीद है। वर्ष 2024-25 में देश में 35.77 करोड़ टन खाद्यान्न का उत्पादन हुआ है। इससे लोगों की क्रय शक्ति बढ़ेगी और ग्रामीण बाजार को मजबूती मिलेगी।

मार्च 2025 से भारत और अमेरिका के बीच प्रस्तावित व्यापार समझौते को लेकर सातवें दौर की वार्ता हुई है, लेकिन अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत के लिए बार-बार वार्ता के लक्ष्य बदले हैं। शुरुआत में ट्रंप ने कहा कि भारत को अमेरिका से अधिक खरीद कर व्यापार घाटे को कम करना चाहिए। साथ ही भारत के डेयरी और कृषि क्षेत्र को अमेरिका के लिए खोलने की मांग भी उठाई।

उसके बाद वे रूसी तेल पर केंद्रित हो गए और पिछले दिनों यह कहकर दबाव बनाने की कोशिश की गई कि भारत की नीतियों से अमेरिका संतुष्ट नहीं है। ऐसे में अमेरिका के बाजार में प्रभावित होने वाले निर्यात की भरपाई के लिए भारत को तेजी से नई वैकल्पिक व्यवस्था स्थापित करनी होगी। हालांकि वैश्विक व्यापार की चुनौतियों के बीच भारत से निर्यात बढ़ाना कोई सरल काम नहीं है।

एक ओर भारत को द्विपक्षीय एवं मुक्त व्यापार समझौतों के तहत निर्यात बढ़ाने होंगे, वहीं नए निर्यात बाजार भी तलाशने होंगे। इसमें दोराय नहीं कि भारत की ओर से ब्रिटेन, ओमान और न्यूजीलैंड के साथ किए गए मुक्त व्यापार समझौतों का वित्त वर्ष 2026 में कार्यान्वयन अहम होगा। साथ ही इस वर्ष पेरू, चिली, आसियान, मैक्सिको, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका और इजराइल सहित अन्य प्रमुख देशों के साथ भी इसी तरह के समझौते आकार ले सकते हैं।

हाल में जर्मनी के चांसलर की दो दिवसीय भारत यात्रा ने यूरोपीय संघ के साथ भारत के मुक्त व्यापार समझौते के जल्द सिरे चढ़ने की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। यह भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत की ओर से विभिन्न देशों के साथ किए गए समझौतों से भारतीय पेशेवरों के लिए वैश्विक अवसर खुलेंगे।

इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि निर्यात को गति देने के लिए संरचनात्मक सुधार भी जरूरी हैं। निर्यातकों की दिक्कतें केवल शुल्क वृद्धि तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एंटी-डंपिंग शुल्क से भी जुड़ी हैं। चालू वित्त वर्ष 2025-26 में ऋण स्थगन की सुविधा का कम प्रयोग किए जाने के बाद इसे वर्ष 2026-27 में बढ़ाया जाना लाभप्रद होगा।

निर्यात बढ़ाने के लिए सभी राज्यों में मान्यता प्राप्त आधुनिक प्रयोगशालाएं भी जरूरी हैं। अब निर्यात बढ़ाने के लिए बाजार तक पहुंच के साथ-साथ गुणवत्तापूर्ण उत्पादन, कम ऊर्जा लागत, अधोसंरचना और गंतव्य निर्यात बाजारों के साथ नियामकीय समन्वय स्थापित किया जाना भी आवश्यक है। भारतीय रिजर्व बैंक की ओर से भी अमेरिकी शुल्क से प्रभावित निर्यातकों के लिए राहत के नए कदम उठाने का प्रयास करना होगा।

निश्चित रूप से वर्ष 2026 में भारत के लिए बेहतर आर्थिक संभावनाएं हैं, लेकिन मजबूत आर्थिक गति को बनाए रखने के लिए वैश्विक अनिश्चितता के बीच घरेलू खपत बढ़ाने, रोजगार सृजन और राजकोषीय घाटे पर नियंत्रण के साथ आर्थिक सुधारों की डगर पर आगे बढ़ना होगा। इन सुधारों में नई पीढ़ी-अगली पीढ़ी के सुधार, जीवन में आसानी, कारोबार सुगमता, बुनियादी ढांचा सुधार, प्रशासन को सशक्त बनाने और अर्थव्यवस्था को मजबूती देने संबंधी सुधार शामिल हैं।

साथ ही कृषि, बैंकिंग, परिवहन एवं दूरसंचार, बिजली, परमाणु ऊर्जा, अंतरिक्ष, रक्षा, पेट्रोलियम, कोयला और अन्य खनिज क्षेत्र में सुधारों पर भी काम करना होगा। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार वर्ष 2026 में विश्व बैंक की वित्तीय क्षेत्र आकलन समिति की उस रपट को अवश्य ध्यान में रखेगी, जिसमें कहा गया है कि भारत में उद्योग-कारोबार के मजबूत विकास के लिए आर्थिक-वित्तीय क्षेत्र में तेज सुधारों के साथ निजी पूंजी जुटाने को बढ़ावा देने की जरूरत होगी।

माना जा रहा है कि देश में आने वाले दिनों में महंगाई कम रहेगी, निर्माण और विनिर्माण गतिविधियां मजबूत होंगी, निजी क्षेत्र की आर्थिक स्थिति दमदार रहेगी, डालर के मुकाबले रुपया मजबूत होगा और कर सुधार एवं ब्याज दर में कटौती से विकास दर को रफ्तार मिलेगी।