Economy

राजनीति: गांव ही बनाएंगे आत्मनिर्भर

आर्थिक पतन के इस दौर में भी कृषि क्षेत्र ने उत्थान की दिशा दिखाई है, जहां 3.4 फीसद की वृद्धि दर सामने आई है। यानी रोशनी की किरण गांवों से आ रही है। फिर इन गांवों को ही विकास का अगुआ क्यों न मान लिया जाए।

राजकाज: अर्थशाप

जिस कोरोना को वुहान की देन समझ हम चीन को कोस रहे थे, वित्त मंत्री ने उसे भगवान की देन बता दिया। उस भगवान को जो खुद ही देशबंदी के कारण भक्तों से दूर सरकारी संरक्षण में चले गए थे। अब भी सभी भगवान पूरी तरह मुक्त नहीं हो पाए हैं। कहीं भक्तों की सीमित संख्या का प्रबंध है तो कहीं सिर्फ ऑनलाइन दर्शन।

कोरोना, लॉकडाउन से भारत को एक और झटका? 2020-21 में अर्थव्यवस्था में 10.5% हो सकती है गिरावट- Fitch का अनुमान

चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) में भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 23.9 प्रतिशत की गिरावट आई है। यह दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में गिरावट के सबसे ऊंचे आंकड़ों में से है।

राजनीति: कृषि क्षेत्र पर टिकी उम्मीदें

कृषि निर्यात ऐसा महत्त्वपूर्ण उपाय है, जिसके जरिए रोजगार और राष्ट्रीय आय में बढ़ोतरी की जा सकती है। इसलिए कृषि निर्यात बढ़ाने के लिए कई और जरूरतों पर भी ध्यान देना होगा। कृषि निर्यात मानकों में बदलाव करने होंगे, जिससे कृषि निर्यातकों को कार्यशील पूंजी आसानी से मिल सके।

COVID-19, इकनॉमी, GST और चीन पर संसद में मोदी सरकार के खिलाफ संयुक्त मोर्चा खोलने की तैयारी में विपक्ष

कांग्रेस रणनीति समूह एक बार बैठक कर चुका है और इस दौरान सत्र में उठाए जाने वाले मुद्दों पर चर्चा की गयी। कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं को संप्रग के सहयोगियों और समान सोच वाले दलों से संपर्क करने को कहा गया है ताकि संसद के बाहर और भीतर सरकार के खिलाफ एकजुटता दिखायी जाए।

वक्त की नब्ज: राम भरोसे माली हालत

मोदी के राज में विदेशी पैसा काफी आया है, लेकिन ज्यादातर गया है शेयर बाजार में; नए कारखानों में नहीं, नई परियोजनाओं में नहीं। कारण सिर्फ एक है : कारोबार करना भारत में आज भी आसान नहीं है।

दूसरी नजर: सबसे बुरे दौर में अर्थव्यवस्था

सीएमआइई (सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनोमी) के आकलन के मुताबिक आर्थिक मंदी और महामारी के बीच बारह करोड़ दस लाख नौकरियां खत्म हो गईं। इनमें नियमित वेतन वाली नौकरियां, दिहाड़ी और स्वरोजगार से आमदनी वाले काम भी शामिल हैं। अगर आप इसकी हकीकत की पड़ताल करना चाहते हैं तो बस अपने आसपास नजर दौड़ाएं या फिर अपनी गली या पड़ोस के घरों में इससे संबंधित सवाल पूछें।

संपादकीय: चिंता के आंकड़े

पर्यटन और इससे जुड़े दूसरे क्षेत्रों के कारोबारों की हालत चौपट हो चुकी है। इससे भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि देश के सरकारी खजाने की हालत बिगड़ती जा रही है। बढ़ता सरकारी खर्च और राजकोषीय घाटा बड़े संकट की ओर इशारा कर रहे हैं।

चौपाल: मुश्किल में अर्थ

जब किसी अर्थव्यवस्था में लगातार गिरावट, उपभोग में कमी, औद्योगिक उत्पादन में गिरावट, बेरोजगारी का बढ़ना, कर्जों की मांग में कमी, शेयर बाजार में कमी, बाजार में तरलता में कमी जैसे संकेत देखने को मिलते हैं, तब यह बात आसानी से समझी जा सकती है कि अर्थव्यवस्था मंदी की चपेट में है।

GDP पहली तिमाही में रेकार्ड 23.9% गिरी, कृषि को छोड़ सारे क्षेत्रों का बुराहाल; #ResignNirmala टि्वटर पर ट्रेंड

पूर्व Congress चीफ राहुल गांधी ने ट्वीट कर कहा, “GDP 24% तक गिरी। स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे बड़ी गिरावट। सरकार का हर चेतावनी को नज़रअंदाज़ करते रहना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है।”

RBI ने चेताया: फेस्टिव सीजन में भी नहीं बढ़ सकेगी उपभोक्ता मांग, गरीब और हो सकता है गरीब; इकॉनमी को अभी और लगेगा झटका

रिजर्व बैंक ने अपनी सालाना रिपोर्ट में हमेशा की तरह आर्थिक वृद्धि का अनुमान नहीं दिया है। हालांकि उसने अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष (आईएमएफ) के 2020-21 में 3.7 प्रतिशत और ओईसीडी (आर्थिक सहयोग और विकास संगठन) के 7.3 प्रतिशत गिरावट के अनुमान का जिक्र किया है।

राजनीति: घटती क्रय शक्ति का संकट

घरेलू बचत के कारण ही देश में करोड़ों लोग आर्थिक आघात को काफी हद तक झेल गए हैं, लेकिन अब उनके लिए घरेलू बचत का सहारा भी धीरे-धीरे कम होता जा रहा है। एक मोटे अनुमान के मुताबिक इस साल जून तक देश के शहरों में रहने वाले करीब 13.9 करोड़ लोगों की बचत समाप्त होने को है।

दूसरी नजर: अर्थव्यवस्था के लिए मनमोहन नुस्खा

सरकार ने जिस तरीके से मुक्त व्यापार को खत्म कर डाला है, उससे दुनिया भर में एक गहरा संदेह पैदा हो गया है। भारत खुल कर विश्व व्यापार संगठन (डब्ल्यूटीओ) के नियमों को तोड़ने की बात कहता रहा है और बहुपक्षीय व द्विपक्षीय व्यापार समझौतों के खिलाफ मोर्चा तान दिया है। आयात किए जाने वाले सामान का यहां निर्माण करना खुशहाली का नया (पुराना?) रास्ता है। मात्रात्मक प्रतिबंध, उच्च शुल्क और गैर शुल्क बाधाओं की वापसी हो रही है। मैं इसे ट्रंप का असर कहता हूं, सरकार इसे आत्मनिर्भर कहती है, जो 1960 से 1990 के बीच अपनाई गई तानाशाही नीतियों से कहीं अलग नहीं है।

संपादकीय: चिंता के आंकड़े

महामारी को फैलने से रोकने के लिए पूर्णबंदी का जो कदम अपरिहार्य उठाया गया, उससे अधिकांश उद्योग-धंधे, कल-कारखाने बंद हो गए। लाखों छोटे उद्योग इस हालत में पहुंच गए कि दोबारा शुरू करने में उन्हें अब भारी मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में बुनियादी क्षेत्र कैसे बचा रह सकता था! छोटे-मझौले उद्योगों और कारोबार और बुनियादी क्षेत्र के उद्योग एक दूसरे के पूरक हैं। बिना बिजली के क्या काम-धंधे चलने की कल्पना की जा सकती है? लेकिन जब देश के अधिकतर उद्योग बंद पड़े हों, तो बिजली की मांग में कमी तो आएगी ही।

राजनीति: बचाना होगा कुटीर उद्योगों को

वास्तव में तो मांग बढ़ने से ही हमारी समस्या हल होगी। किंतु मांग सहज ही नहीं बढ़ती है। यह हमारी क्रय शक्ति पर निर्भर करती है। अत: शासन को देश की क्रय शक्ति बढ़ाने का भी प्रयास करना होगा। इसके लिए जरूरी है कि सबसे पहले देश के अंतिम व्यक्ति को कुटीर उद्योगों से जोड़ा जाए। आम व्यक्ति जो भी उत्पादन करता है, उसे कच्चे माल के रूप में या फिर उत्पाद के रूप में शासन को खपाने का प्रयास करना होगा।

संपादकीय: बैंकों का संकट

कोरोना महामारी ने सिर्फ भारत ही नहीं पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था का भट्ठा बैठा दिया। तीन महीने की पूर्णबंदी से लाखों उद्योग-धंधे बंद हो गए। अर्थव्यवस्था की जान माने जाने वाले होटल, विमानन, रीयल एस्टेट और विनिर्माण जैसे क्षेत्रों को भारी धक्का लगा है। निजी क्षेत्र में लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं और वेतन कटौती जैसे कदम ने भी लोगों के पसीने छुड़ा दिए।

राजनीति: विदेशी निवेश – दशा और दिशा

कई आर्थिक मापदंडों पर भारत अभी भी चीन से आगे है। भारत दवा निर्माण, रसायन निर्माण और जैव तकनीकी के क्षेत्रों में सबसे तेज उभरता हुआ देश भी है। भारत की श्रम शक्ति और लागत का एक सकारात्मक पक्ष यह है कि भारत में श्रम लागत चीन की तुलना में सस्ती है। भारत के पास तकनीकी और पेशेवर प्रतिभाओं की भी कमी नहीं है।

राजनीति: कर्ज का बढ़ता मर्ज

भारत में आर्थिक समस्या से पार पाने के लिए वर्तमान परिस्थितियों से हट कर पिछले दो वर्ष से चली आ रही आर्थिक सुस्ती को आधार बनाया जाना चाहिए। इस बात पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए कि देश में वर्तमान समय के आर्थिक संकट से पहले ही एक बड़ी मांग-आधारित आर्थिक सुस्ती आ चुकी थी और देश अब आपूर्ति-आधारित आर्थिक सुस्ती का भी सामना कर रहा है।

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