खत ऐसा लिखा है कि नगीने से जड़े हैं
वो हाथ कि जिस ने कोई जेवर नहीं देखा

-बशीर बद्र

हिंदी के साहित्यकारों की बात करें तो उनकी हालत कुछ ऐसी ही है। लेखकों के शब्दों में ऐसे नगीने हैं जो प्रकाशकों को मालामाल तो करते हैं, लेकिन रायल्टी के नाम पर उनके हाथ में कुछ नहीं आता। हिंदी के लेखक इस कमतर भावना के शिकार हो गए हैं कि मुनाफे लायक पाठक वर्ग तो जोड़ना मुश्किल है। इसके साथ ही सरकारी खरीद का सिद्धांत आ जाता है। इस बार विश्व पुस्तक मेले में ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ की विशालकाय मौजूदगी तो थी, पर सेल्फी लेने के लिए। तीस लाख की रायल्टी के अनुभव के बाद भी पुस्तक मेले में रायल्टी पर कोई चर्चा नहीं हुई। विमोचनों और लोकार्पण के दावों के बाद एक ही शब्द का अस्तित्व रहता है-‘सरकारी खरीद’। हिंदी साहित्य में रायल्टी के नाम पर लेखकों की खाली खिड़की पर बेबाक बोल

प्रकाशक लेखकों को लूटते हैं, किताब बिकती है, लेकिन रायल्टी नहीं मिलती।’ ये बात कहा करते थे हिंदी में महाप्राण का दर्जा पाए सूर्यकांत त्रिपाठी निराला। हिंदी में शायद ही कोई ऐसा साहित्यकार होगा, जिसने निराला की रचनाएं नहीं पढ़ीं, या उनका उद्धरण नहीं दिया हो। इतने बहुपठित लेखक का जीवन अपनी गुरबत से संघर्ष में बीता था। निराला की किताबें बिकती रहीं, लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति कभी नहीं सुधरी। हिंदी की भावी पीढ़ी के लिए जिनकी रचनाएं विद्रोह, संघर्ष और सृजन को सिखाने का संस्थान सरीखा थी, उनके आर्थिक अभाव के किस्से भी साहित्य स्मृति का हिस्सा है।
पिछले दिनों संपन्न हुए विश्व पुस्तक मेले में सबसे चर्चित रही ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’।

दिल्ली के पुस्तक मेले में यह दीवार और खिड़की कोई किताब नहीं, एक सेल्फी केंद्र थी। विश्व पुस्तक मेले से जुड़ी तस्वीरें अब तक आपकी सोशल मीडिया की दीवारों पर दिख रही होंगी। सबसे ज्यादा तस्वीरें दीवार में बनी खिड़की पर ही ली गई। विनोद कुमार शुक्ल की कल्पना का वह हाथी यथार्थ बन कर ‘सेल्फी केंद्र’ के रूप में खड़ा कर दिया गया था। लेखकों व पाठकों ने सोशल मीडिया पर संदेश दिया कि इस दीवार की खिड़की में से झांक कर तस्वीर नहीं ली तो जीवन बेकार।

मेला खत्म हुआ, और प्रकाशकों के मुनाफे की घोषणा आने लगी। लाखों और करोड़ों में मुनाफे की बात हो रही थी, लेकिन एक भी लेखक ने दीवार की खिड़की खोल कर प्रकाशकों से यह नहीं पूछा कि मेरी कितनी किताब बिकी, आपको किनकी किताबों से सबसे ज्यादा मुनाफा हुआ। हिंदी किताबों के प्रकाशकों को भी अंदाजा हो चुका है कि अब लेखकों में ‘महाप्राण’ वाला कोई जज्बा नहीं है। वैसे, हिंदी के ज्यादातर बड़े प्रकाशन संस्थान छापेखाने के साथ लेखकों के लिए दिशानिर्देश कक्षा भी चलाते हैं। इस कक्षा का संक्षिप्त सा पाठ्यक्रम है-लेखक अपने अधिकारों से पलायन कैसे करें। श्रीकृष्ण ने कर्म किए जाओ और फल की चिंता मत करो का संदेश एक खास संदर्भ में दिया था। लेकिन प्रकाशक लेखकों के लिए यह ध्येय वाक्य बना देते हैं, लिखने का कर्म करते जाइए, रायल्टी की चिंता मत कीजिए।

2025 में विनोद कुमार शुक्ल की किताब ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ को 30 लाख की रायल्टी मिलने की खबर ने हिंदी साहित्य में भूचाल ला दिया था। यह संयोग की बात है कि आजादी के बाद विनोद कुमार शुक्ल उन चुनिंदा लेखकों में से थे, जिन्होंने पर्याप्त रायल्टी नहीं मिलने का मुद्दा उठाया। शुक्ल के उठाए इस विवाद को कुछ बड़े प्रकाशकों ने अशोभनीय बताया। मानो रायल्टी के सवाल वैसे संवाद हों जिन्हें फिल्म प्रमाणन बोर्ड सिर्फ वयस्कों के लिए बता कर काट-छांट दिया करता है। इतने बड़े मसले पर चंद साहित्यकारों ने ही रायल्टी की हकीकत पर बोला था। बाकी को यही लगा था कि अगर कुछ बोले तो गनीमत के तौर पर अभी जो किताब छप रही है, आगे से उसका रास्ता भी बंद हो जाएगा।

विनोद कुमार शुक्ल को 30 लाख की रायल्टी मिलने और उनके निधन के बाद दिल्ली में विश्व पुस्तक मेले के रूप में सबसे बड़ा साहित्यिक मंच सजने के बीच ज्यादा बड़ा अंतराल नहीं था।लेकिन इस मंच पर विनोद कुमार शुक्ल के संघर्ष को एक सेल्फी केंद्र के रूप में समेट दिया गया। एक बड़े से पोस्टर पर दीवार और, उसके बीच छपे हाथी में से खुलती खिड़की। प्रकाशकों को अंदाजा रहा होगा कि उन्होंने वैसे भी लेखकों के संसार को सेल्फी तक ही समेट कर रख दिया है। लेखक लिखेंगे, प्रकाशक छापेंगे और फिर छपी किताब के साथ सेल्फियों का दौर। एक लेखक की योग्यता अब इस बात से भी तय होती है कि उसकी किताब के साथ सोशल मीडिया पर कितनी सेल्फी डाली गई।

चित्र की दुनिया में सेल्फी का शाब्दिक अर्थ है, आत्मनिर्भर होना। यानी तस्वीर लेने के लिए आपको किसी की मदद की जरूरत नहीं है। हिंदी साहित्य की दुनिया में यह ‘सेल्फी’ शब्द काफी विस्तारित हो चुका है। यानी लेखकों को अपनी किताब का प्रचार माध्यम भी खुद होना होगा।

हम पूछना चाहते हैं कि विनोद कुमार शुक्ल के निधन के बाद साहित्य के कितने बड़े मंचों ने उनकी याद में ऐसा कोई कार्यक्रम किया, जो उनकी किताबों की तरह यादगार हो। क्या विश्व पुस्तक मेले में विनोद कुमार शुक्ल के रायल्टी विवाद पर किसी तरह की चर्चा की गई? मेले में क्या कहीं, किसी भी कोने में लेखकों ने खुसुर-फुसुर में भी रायल्टी के बारे में बोला? शायद लेखक शुक्ल की किताब की भव्य दीवार देख कर सोचते होंगे कि दीवार में खिड़की के साथ कान भी होते होंगे। कहीं कान सुन न लें कि हमने किताबों की बिक्री के बाबत कुछ बात की है। जब ‘दीवार में एक खिड़की रहती थी’ रायल्टी की प्रतीक बन चुकी है तो क्या यह उम्मीद बेमानी थी कि मेले के अंत में प्रकाशक यह सूची सार्वजनिक करते कि किस लेखक की कितनी किताब बिकी।

आजादी के बाद हालत यही रही कि हिंदी ने खुद को सिर्फ साहित्य की भाषा के रूप में प्रस्तुत किया। हिंदी अन्य अनुशासनात्मक ज्ञान-विज्ञान की भाषा नहीं बन पाई। देश का मध्य-वर्ग आगे बढ़ने के लिए अंग्रेजी की पढ़ाई कर रहा था। आज आजादी के साढ़े सात दशक के बाद जो मध्य-वर्ग है, वह अंग्रेजी भाषा से ही तैयार हुआ है। इसलिए हिंदी भी चुपचाप साहित्य के जरिए ही अस्तित्व बचाने की राह पर चल पड़ी, और हिंदी लेखकों का अस्तित्व भी सिमटता रहा।

हिंदी साहित्य की मुख्यधारा में यह भी इल्जाम है कि यह सरकारी खरीद पर निर्भर है। जिस प्रकाशक की जितनी सरकारी खरीद हो गई, वह उतना मालामाल हो गया। ऐसे में हालत में सुधार की तवक्को भी सरकार की तरफ से की जा सकती है। सरकार ऐसा नियम क्यों नहीं बनाती कि किताबों की खरीद-बिक्री में पारदर्शिता हो। सरकारी संस्थाएं तो अपने द्वारा खरीदी गई किताबों को सार्वजनिक कर ही सकती हैं। किस संस्थान ने किस उद्देश्य से कितनी प्रतियां खरीदीं। इससे यह अंदाजा तो लग ही जाएगा कि क्या वाकई हिंदी के लेखक अपने स्तर पर पाठक बना पाए हैं, या उनका अस्तित्व ‘सरकारी’ ही है।

हिंदी के इतर अंग्रेजी, मलयालम, तमिल में ऐसी बुरी हालत नहीं है। इन भाषाओं के लेखक पाठकों को खुद के बल पर जोड़ पाए हैं। इसकी वजह यह है कि इन भाषाओं ने अपनी दीवार में अन्य ज्ञान-विज्ञान की भी खिड़की खुलने दी है। हिंदी में यह संभावना खुली भी है तो इतिहास व अन्य सामाजिक विज्ञानों की उन किताबों तक सीमित है, जो प्रशासनिक सेवाओं के प्रतियोगी परीक्षार्थियों की नजर से लिखे जाते हैं।

भारत जैसे देश में भाषा और रोजगार का अन्योन्याश्रय संबंध रहा है। ब्रितानी हुकूमत के कारण औपनिवेशिक काल से ही अंग्रेजी रोजगार की भाषा बनी और आजादी के बाद भी एक बड़े तबके के लिए रोजगार का मतलब अंग्रेजी ही रही। शायद हिंदी की इसी स्थिति की वजह से हिंदी में लिखने को रोजगार के दायरे से बाहर ही रखा गया। लेखकों ने कभी इसे स्वांत: सुखाय तो कभी संघर्ष की तरह माना और अपने रचना-कर्म से कमाई की उम्मीद रखनी छोड़ दी। हिंदी के लेखक अपने पूर्वजों से विरासत में सबसे पहले यही नाउम्मीदी पाते हैं।

अब जबकि सरकार मैकाले वाली नीति के खिलाफ जंग छेड़ने का एलान कर चुकी है तो उसे हिंदी के लेखकों की स्थिति के बारे में भी सोचना चाहिए। क्या वाकई हिंदी का प्रकाशन क्षेत्र सरकारी खरीद पर टिका है? लेखक, प्रकाशक और पाठकों के बीच क्या कभी कोई ऐसी खिड़की खुल पाएगी जिससे हमें हकीकत का अंदाजा हो? मैकाले वाली भाषा के मुकाबले में आने के लिए सबसे पहले हिंदी के मुनाफे के रहस्य की खिड़की खोलनी होगी, जिसके लिए फिलहाल कोई पक्ष तैयार नहीं दिख रहा है।