तेजी से फैलते उपभोक्तावादी तंत्र के बीच ‘फास्ट-कामर्स’ यानी तुरंत सामान हासिल करना या उसकी आपूर्ति करने का तंत्र एक ऐसी आक्रामक व्यवस्था बनकर उभरा है, जो सुविधा के नाम पर समाज की संवेदनात्मक परतों, बाजार की स्वाभाविक लय और अर्थव्यवस्था की स्थायी संरचनाओं को भीतर ही भीतर क्षीण कर रहा है। मनुष्य की आवश्यकताओं को तात्कालिकता में बांधकर यह प्रारूप न केवल हमारी जीवन-दृष्टि को उथला बना रहा है, बल्कि पूंजी के एकाधिकारवादी विस्तार को सामाजिक अनिवार्यता के रूप में आरोपित कर रहा है।
तत्काल आपूर्ति के इस कारोबार का उभार किसी साधारण तकनीकी प्रगति का संकेत भर नहीं है। यह आधुनिक पूंजीवादी संरचना की वह शाखा है, जो मानव जीवन को उत्पादन-उपभोग की निरंतर दौड़ में धकेलकर उसकी संवेदनशीलता, सामुदायिक आत्मा और उसके आर्थिक विवेक को क्रमश: नष्ट कर रहा है। सुविधा के चकाचौंध भरे आवरण के भीतर छिपी यह व्यवस्था उपभोक्ता को उस बिंदु तक ले जाती है, जहां तात्कालिक संतुष्टि को जीवन का मूल मूल्य मान लिया जाता है और किसी वस्तु की प्राप्ति में अगर कुछ क्षणों का भी विलंब हो जाए, तो व्यक्ति उसे व्यक्तिगत असुविधा नहीं, बल्कि जीवन में अस्वीकार्य बाधा समझ बैठता है।
यही वह मनोवैज्ञानिक विकृति है, जिसे पूंजीवाद अपने महत्त्वाकांक्षी विस्तार के लिए पोषित करता है। एक ऐसा उपभोक्ता, जो संयम, प्रतीक्षा, विवेक और स्थानीय संबंधों की गरिमा को भूलकर लगातार, अनवरत, आवेगपूर्ण खरीदारी के चक्र में फंसा रहे।
यह तेज-रफ्तार प्रणाली स्थानीय बाजारों के लिए एक विषैली चुनौती बन चुकी है। पुरानी किराना संरचना, छोटे व्यापारों की आत्मनिर्भर प्रणाली और पड़ोस की जीवंत आर्थिक संस्कृति इस व्यवस्थित अतिक्रमण के आगे क्षीण होती जा रही है। तीव्रगामी वाणिज्य की विशाल कंपनियां अल्गोरिद्म पर आधारित मूल्य-निर्धारण और पूंजी के असीमित संसाधनों के बल पर ऐसे दाम प्रस्तुत करती हैं, जिनसे छोटे व्यापारी प्रतिस्पर्धा कर ही नहीं सकते।
नतीजतन, स्थानीय अर्थव्यवस्था भयावह संकुचन की ओर बढ़ती है, आय के स्रोत केंद्रित होते जाते हैं और समाज का आर्थिक संतुलन टूटने लगता है। उपभोक्ता को सस्ती सुविधाओं का भ्रम मिलता है। मगर वास्तविकता यह है कि वह अपनी ही सामुदायिक आर्थिक सुरक्षा को घाटे के घाट उतार रहा होता है।
श्रम के क्षेत्र में भी यह प्रारूप अत्यंत अमानवीय परिस्थितियां निर्मित करता है। मिनटों में आपूर्ति की आकांक्षा सामान पहुंचाने वाले उन कर्मियों पर असाधारण दबाव डालती है, जिनके पास सुरक्षा, स्थायित्व, बीमा या सम्मानजनक श्रम-नीतियों का न्यूनतम आधार भी नहीं होता।
पूंजीवादी संरचना उनकी थकान, जोखिम, समय और जीवन को एक ऐसे अदृश्य लागत-तंत्र में बदल देती है, जिसे उपभोक्ता सुविधा के नाम पर सहज ही स्वीकार कर लेता है। यह वही जटिल पूंजीवादी विडंबना है, जहां लाभ का संचय ऊपर केंद्रित होता जाता है और श्रम का बोझ नीचे तक धकेल दिया जाता है।
तत्काल आपूर्ति का चलन मानव समाज की उन स्वाभाविक प्रक्रियाओं को नष्ट करता है, जिनके माध्यम से नस्लें, समुदाय और पड़ोस अपने भीतर सामाजिक आदान-प्रदान, संवाद और सह-अस्तित्व की संस्कृति विकसित करते थे। अब मानव संपर्क का स्थान स्क्रीन ले चुकी है, बाजारों की विविधता की जगह विभिन्न एप की एकरूपता ने ले ली है और सामुदायिक सहयोग की जगह व्यक्ति की अकेली उपभोग-यात्रा ने कब्जा कर लिया है। यह परिवर्तन सभ्यता को गति तो देता है, पर गहराई से खाली भी करता है।
कारोबार के इस स्वरूप का एक गहन दुष्प्रभाव पर्यावरणीय ह्रास के रूप में सामने आता है। तीव्र आपूर्ति की इस व्यवस्था में साजो-सामान की आपूर्ति के सूक्ष्म तंत्र का जो असंगत विस्तार हुआ है, वह सड़क-जाल, वाहन-उपयोग और ईंधन-उपभोग के रूप में एक ऐसी अदृश्य पर्यावरणीय आपदा रच रहा है, जिसकी कीमत न वर्तमान उपभोक्ता समझ रहा है और न ही पूंजी-चालित कंपनियां स्वीकार करने को तैयार हैं।
हर घंटे, हर मिनट, हर सेकंड को लक्ष्य बनाकर चलने वाली डिलीवरी-प्रणाली का अर्थ है अनगिनत छोटे पैकेट, असीमित प्लास्टिक, अनवरत वाहनों की आवाजाही और कार्बन-उत्सर्जन का बढ़ता दबाव। यह तरीका जलवायु-संवेदनशील देशों, विशेषकर वैश्विक दक्षिण की अर्थव्यवस्थाओं पर अतिरिक्त बोझ डालता है।
पूंजीवाद का स्वभाव ही यही है कि वह लागत को प्रकृति पर थोपकर लाभ को अपने केंद्र में समेट ले। तीव्र आपूर्ति इसी प्रवृत्ति का वर्तमान और अत्यधिक उग्र रूप है। उपभोक्ता को जो त्वरित सुविधा मिलती है, उसकी वास्तविक पर्यावरणीय कीमत पृथ्वी आने वाली पीढ़ियों से वसूलेगी। यह सच जितना भयावह है, उतना ही अनदेखा भी। अगर समाज इस प्रणाली की पर्यावरण-विरोधी संरचना को न पहचाने, तो वह सुविधा के मोह में अपने पारिस्थितिक भविष्य को दांव पर लगा देगा।
तीव्र आपूर्ति एक ऐसा आधुनिक मिथक बन चुका है, जो सुविधा को प्रगति और तात्कालिकता को आधुनिकता का पर्याय बताता है। मगर इस चमकीली सतह के नीचे एक गहरा संरचनात्मक संकट छिपा है- संकुचित होता स्थानीय बाजार, शोषित होता श्रम, व्यवस्थित रूप से नियंत्रित होता उपभोक्ता और टूटता हुआ सामाजिक ताना-बाना।
अगर समाज इस स्वरूप को बिना विवेक स्वीकार करता रहा, तो वह धीरे-धीरे ऐसी आर्थिक निर्भरता में फंस जाएगा, जहां विकल्प, स्वतंत्रता और समुदाय- ये तीनों ही मूल्य पूंजीवादी मशीनरी के आगे अप्रासंगिक हो जाएंगे।
