समय की गति बहुत तेज है और इस बदलाव के साथ ही जीने और काम करने के तरीके भी पूरी तरह बदल चुके हैं। बहुत समय से समाज में यह बात गहराई से बैठी हुई थी कि अगर जीवन में सफल होना है, तो एक बड़ी डिग्री का होना सबसे जरूरी है। मगर अब चारों तरफ यह चर्चा हो रही है कि आने वाले समय में सिर्फ डिग्री पाना ही काफी नहीं होगा। कौशल विकास का पैमाना अहम होगा। ऐसे में क्या डिग्री की प्रासंगिकता का सवाल उन करोड़ों छात्रों और अभिभावकों के लिए उठ खड़ा हुआ है, जो अपनी मेहनत की कमाई और जीवन का कीमती समय एक डिग्री हासिल करने में लगा देते हैं।
पहले यह माना जाता था कि स्कूल और कालेज की पढ़ाई खत्म करने के बाद जो प्रमाणपत्र मिलता है, वही उज्ज्वल भविष्य की एकमात्र चाबी है, लेकिन अब वह चाबी अपनी चमक खो रही है। दुनिया उस दिशा में आगे बढ़ रही है, जहां इस बात से ज्यादा फर्क पड़ता है कि किसी को काम क्या आता है, वह कितनी कुशलता से उसे पूरा कर सकता है।
भारत की शिक्षा व्यवस्था में हाल ही में जो बड़े बदलाव किए गए हैं, उनका मुख्य उद्देश्य भी इसी पुरानी सोच को बदलना है। पुराने समय की पढ़ाई ऐसी थी, जैसे सबको एक ही सांचे में ढालने की कोशिश की जा रही हो। इसे अक्सर ‘मैकाले की शिक्षा पद्धति’ कहा जाता था, जिसका काम केवल सरकारी और निजी दफ्तरों के लिए एक जैसे कर्मचारी तैयार करना था।
उस व्यवस्था में छात्रों की अपनी रुचि और उनकी छिपी हुई प्रतिभा के लिए बहुत कम जगह थी। मगर अब सोच पूरी तरह बदल रही है। शिक्षा मंत्री ने भी हाल में कहा कि अब देश को केवल डिग्री बांटने वाले संस्थानों की नहीं, बल्कि हुनर भी सिखाने वाले केंद्रों की जरूरत है। आज के समय में अंतरराष्ट्रीय कंपनियां नौकरी देते समय कालेज का नाम या डिग्री का साल नहीं पूछतीं, बल्कि यह देखती हैं कि सामने वाला व्यक्ति उनकी चुनौतियों को सुलझाने की क्षमता रखता है या नहीं। अब एक हुनरमंद व्यक्ति, जिसके पास कोई बहुत बड़ी डिग्री नहीं है, वह भी अपनी मेहनत और योग्यता के दम पर ऊंचे मुकाम पर पहुंच सकता है।
पहले अगर कोई छात्र कालेज की पढ़ाई किसी मजबूरी के कारण बीच में छोड़ देता था, तो उसे अच्छा नहीं समझा जाता था और उसके पिछले साल भी पूरी तरह बेकार चले जाते थे, लेकिन अब ऐसी व्यवस्था बनाई गई है कि छात्र का एक भी दिन बेकार नहीं जाएगा। अब अगर कोई एक साल पढ़ाई करके छोड़ता है, तो उसे प्रमाणपत्र मिलेगा और अगर दो साल बाद छोड़ता है, तो डिप्लोमा दिया जाएगा। यह बड़ी राहत की बात है। यह इस बात की स्वीकृति है कि सीखना कभी बेकार नहीं जाता और इंसान का हर अनुभव उसकी एक अलग योग्यता है।
इससे छात्रों पर यह मानसिक दबाव काफी कम हुआ है कि उन्हें हर हाल में लगातार तीन या चार वर्ष तक एक ही कमरे में बैठ कर पढ़ाई पूरी करनी ही है। अब वे अपनी जरूरत और परिस्थिति के हिसाब से पढ़ाई कर सकते हैं और जब भी चाहें वापस आकर अपनी शिक्षा पूरी कर सकते हैं।
भारत जैसे विशाल देश में जहां हर वर्ष लाखों युवा अपनी पढ़ाई पूरी करते हैं, वहां सभी को सरकारी नौकरी नहीं मिल सकती। इसीलिए अब कौशल विकास पर जोर दिया जा रहा है। स्कूलों में छठी कक्षा से ही बच्चों को ऐसी चीजें सिखाई जा रही हैं जो उन्हें कामकाज के लिए तैयार करती हैं।
चाहे वह कंप्यूटर कोडिंग हो, बिजली का काम हो, बढ़ई का काम हो या कोई और हस्तशिल्प। अब इन सबको पढ़ाई का जरूरी हिस्सा माना जा रहा है। पहले इन कामों को छोटा समझा जाता था, लेकिन अब यह समझ विकसित हो रही है कि कोई भी काम छोटा या बड़ा नहीं होता, बस उसे करने की विशेषज्ञता और उसमें हासिल की गई महारत मायने रखती है।
ऐसे में एक अच्छा मैकेनिक या कलाकार किसी औसत डिग्रीधारी से कहीं ज्यादा बेहतर जीवन जी सकता है। यानी शिक्षा के साथ-साथ कौशल विकास अब समय की मांग और जरूरत बनता जा रहा है। कृत्रिम मेधा (एआइ) के आने से डिग्रियों का मोल और भी कम हुआ है। जो काम पहले लोग वर्षों किताबी पढ़ाई के बाद करते थे, वह अब कंप्यूटर और मशीनें कुछ ही सेकंड में और कहीं ज्यादा सटीकता से कर लेती हैं।
ऐसे में वह सब सीखना अब और भी जरूरी हो गया है जो मशीनें कभी नहीं कर सकतीं। जैसे कि नई और मौलिक सोच, दूसरों की भावनाओं को समझना, टीम के साथ मिल कर काम करना और मुश्किल हालातों में सही फैसला लेना।
ये ऐसी मानवीय खूबियां हैं जिन्हें किसी किताब को रट कर या कोई परीक्षा पास करके हासिल नहीं किया जा सकता। इन्हें सीखने के लिए निरंतर अनुभव, गलतियों से सबक लेने की इच्छा और लगातार अभ्यास की जरूरत होती है।
इसलिए भविष्य की शिक्षा में अब ‘क्या पढ़ना है’ के बजाय ‘सीखने की प्रक्रिया’ पर ध्यान देने की जरूरत है। अब हर किसी को पूरी जिंदगी एक सक्रिय छात्र बने रहना होगा, क्योंकि जो तकनीक आज नई है, वह कल पुरानी हो जाएगी। पुरानी डिग्री की ताकत केवल शिक्षण संस्थान तक थी, लेकिन हुनर की ताकत पूरी जिंदगी साथ रहती है। एक बहुत अच्छी डिग्री वाला व्यक्ति भी कभी-कभी जीवन की दौड़ में पीछे छूट जाता है और बेरोजगार बैठा रहता है, जबकि अब एक हुनरमंद व्यक्ति अपना छोटा सा काम शुरू करके भी सफलता की ऊंचाइयों को छू रहा है।
इससे समाज की वह पुरानी सोच टूट रही है जो केवल डाक्टर, इंजीनियर या आइएएस बनने को ही सफल जीवन का पैमाना मानती थी। एक पहलू यह भी है कि आने वाले समय में कंपनियां डिग्री के बजाय वह काम दिखाने के लिए कहेंगी जो वास्तव में पहले किया है।
उदाहरण के लिए, अगर कोई ग्राफिक डिजाइनर बनना चाहता है, तो उसकी डिग्री से ज्यादा यह देखा जाएगा कि उसने अब तक कौन-कौन से डिजाइन बनाए हैं। यानी जो सच में काबिल होगा, अब वही आगे बढ़ पाएगा। यह व्यवस्था उन लोगों के लिए वरदान है जो आर्थिक रूप से कमजोर हैं और बड़े कालेजों की फीस नहीं भर सकते, लेकिन जिनमें कुछ कर दिखाने का जज्बा है।
बहरहाल, डिग्री पूरी तरह से गायब तो नहीं होगी, लेकिन उसका पुराना स्वरूप जरूर खत्म हो जाएगा। वह अब केवल करिअर की शुरुआत का एक छोटा सा रास्ता बन कर रह जाएगी, मंजिल नहीं। असली पहचान हमेशा उस काम से होगी जो कोई व्यक्ति अपनी मेहनत और कौशल से जमीन पर करके दिखाएगा। आने वाला सुनहरा समय उन लोगों का है, जो खुद को समय के साथ बदलने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं और जो कभी यह नहीं सोचते कि उनकी पढ़ाई और सीखने का समय खत्म हो गया है।
कागजों के भारी बोझ को अब कंधों से उतार कर हुनर के पंख फैलाने का सही वक्त आ गया है। शिक्षा का असली और एकमात्र अर्थ भी यही है कि वह इंसान को आत्मनिर्भर, जागरूक और एक जिम्मेदार नागरिक बनाए।
