दुनिया में अगर कोई एक चीज ऐसी है जो अमीर-गरीब, ज्ञानी-अज्ञानी, राजा-रंक और साधु-पापी, सबको बराबर मिलती है, तो वह है वक्त। यही वह अदृश्य पूंजी है, जिसे न कोई चुरा सकता है, न बांट सकता है और न ही वापस पा सकता है। समय का यह न्याय इतना कठोर और निष्पक्ष है कि इतिहास के सभी निर्णय, सभी परिवर्तन और सभी क्रांतियां इसी की गोद में पली हैं। समय के तराजू में किसी की पहचान नहीं तौली जाती, केवल कर्म का भार मापा जाता है। एक ही सूरज सब पर समान रूप से उगता है।

एक ही दिन सभी के लिए चौबीस घंटे का होता है, पर कोई उसी में स्वप्न साकार कर लेता है और कोई शिकायतें संजोकर सो जाता है। फर्क वक्त के वितरण में नहीं, बल्कि उसके उपयोग की दृष्टि में है। किसी ने उन चौबीस घंटों में भविष्य गढ़ लिया, किसी ने उन्हें पछतावे में गंवा दिया। हालांकि इसी दुनिया में ऐसे भी लोग हैं, जिनकी जीवन स्थितियां उनका अपना चुनाव नहीं है और अपने जीने के जद्दोजहद में उनका समूचा वक्त निकल जाता है। ऐसे लोग भी चाहते हैं कि उनके जीवन में इतना वक्त हो कि वे अपने या अपनों या फिर दुनिया के बारे में कुछ सोच सकें, कुछ जान सकें और उसके बाद अपने जीवन को कोई नई दिशा दे सकें।

समय का मूल्य व्यक्ति खुद तय करता है

बहरहाल, यह समय का चमत्कार है कि यह समान मात्रा में बंटता है, पर उसका मूल्य व्यक्ति खुद तय करता है। जीवन दरअसल वक्त का दूसरा नाम ही है। हम सोचते हैं कि जीवन बीत रहा है, जबकि बीतता समय है। हर बीतता पल हमें मृत्यु के एक क्षण पास ले जाता है, लेकिन साथ ही हर क्षण यह अवसर भी देता है कि हम उस बीतने को सार्थक बना सकें। मनुष्य का जीवनकाल समय का एक संक्षिप्त अनुबंध है। इसकी अवधि तय नहीं होती, पर इसका उपयोग पूरी तरह हमारे विवेक पर निर्भर होता है। कभी-कभी लगता है कि समय बहुत तेजी से भाग रहा है, पर सच यह है कि समय स्थिर है, भागता तो मनुष्य है अपनी इच्छाओं, महत्त्वाकांक्षाओं और असंतोष के पीछे।

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समय कभी बोलता नहीं, लेकिन उसका मौन सबसे प्रखर भाषा है। यह हर व्यक्ति को उसकी हैसियत, कीमत और नियति का बोध कराता है। कभी यह शिक्षक बनकर अनुशासन सिखाता है, कभी कठोर परीक्षक बनकर हमारे कर्मों का परिणाम दिखाता है। जो लोग समय के साथ चलना सीख जाते हैं, वे इतिहास रचते हैं, जो लोग समय को ठुकरा देते हैं, इतिहास उन्हें भुला देता है। बुद्ध के ध्यान से लेकर गांधी के सत्याग्रह और फिर उससे आगे विज्ञान की खोजों तक- हर परिवर्तन समय के साथ की गई साधना का परिणाम है।

वक्त के सामने सबसे बड़ा भ्रम अहंकार है। राजा सोचता है, राज्य उसका है; व्यापारी सोचता है, धन उसका है;  बुद्धिजीवी सोचता है, विचार उसके हैं। पर समय धीरे से हंसता है और कहता है- ‘ये सब मेरे उधार हैं, एक दिन लौटा देने होंगे।’ वक्त जब पलटता है, तो सिंहासन भी झुका देता है और भिखारी को भी प्रतिष्ठा दे देता है। यही उसका संतुलन है, यही उसका दार्शनिक सौंदर्य। जो व्यक्ति यह समझ लेता है कि ‘मैं नहीं, समय बड़ा है’, वही शांति पाता है। समय की साधना का अर्थ है- वर्तमान में जीना। भविष्य की चिंता और अतीत का बोझ मनुष्य को उस एकमात्र सत्य से दूर ले जाते हैं, जो उसके पास है- यह क्षण।

बीता हुआ पल किसी भी धन से खरीदा नहीं जा सकता

दरअसल, वर्तमान ही समय का वास्तविक रूप है। न अतीत को पकड़ा जा सकता है, न भविष्य को छुआ जा सकता है। महर्षि पतंजलि ने योगसूत्रों में कहा- ‘क्षणक्षणं युगवत् भवति।’ यानी हर क्षण में युगों की संभावना छिपी है। अगर कोई व्यक्ति हर क्षण को सच्चे मन से जी सके, तो वही क्षण उसके जीवन का स्वर्णयुग बन सकता है। समय के मूल्य को केवल वही जानता है, जिसने उसे खोया है। बीता हुआ पल किसी भी धन से खरीदा नहीं जा सकता। कभी-कभी हम सोचते हैं कि भविष्य में सब ठीक कर लेंगे, पर यह भूल जाते हैं कि भविष्य वही है, जो वर्तमान से बनता है।

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समय को आदर देना दरअसल अपने जीवन को आदर देना है। जो लोग समय को ‘सहेजना’ जानते हैं, वे जीवन की हर लड़ाई जीत लेते हैं। और जो उसे ‘टालना’ जानते हैं, वे धीरे-धीरे अपनी ही क्षमता को खो देते हैं। वक्त किसी का दुश्मन नहीं होता, लेकिन यह किसी के प्रति दयालु भी नहीं होता। यह बस अपना धर्म निभाता है- बहना, बदलना और सबको परखना। जो इसके साथ चलना सीख जाए, वह आगे बढ़ता है। जो इसके विरोध में जिये, वह ठहर जाता है। इसलिए वक्त को समझना एक दार्शनिक साधना है- यह हमें सिखाता है कि जीवन सीमित है, इसलिए हर क्षण को सार्थक बनाओ। यह बताता है कि सबको बराबर मिलता है, पर जो उसका सम्मान करता है, वही वास्तव में ‘जीता’ है। वक्त अदृश्य, अजेय और अपरिहार्य है। जो इसे पहचान लेता है, वह खुद को पहचान लेता है।