प्रभात कुमार

हम जिन चीजों का इस्तेमाल नहीं कर रहे, नहीं कर पा रहे या नहीं करना चाहते, उन्हें कोई दूसरा उपयोग कर सकता है। हमारी कोई चीज किसी को अच्छी लग रही हो, बेहद पसंद आ रही हो, हमें यह अंदाजा हो जाए और हम वह चीज किसी को भेंट कर दें, तो वह व्यक्ति खुश हो सकता है।

हम लकीर के बहुत पुराने फकीर है, लेकिन त्याग के नए अर्थ गढ़ रहे हैं। खुद त्याग करें, न करें, मगर दूसरों से अपेक्षा करते हैं कि वे स्वार्थी न बनें। त्याग करें, बलिदान दें, समर्पण करें। अब तो मानवीय रिश्ते भी वस्तुओं की मानिंद हो गए हैं। एक-दूसरे पर, चीजों और संपत्ति पर नजर रखी जा रही है।

काफी कुछ जैसे-तैसे हासिल करने की कोशिश की जा रही है। न मिले तो मारना-पीटना तो कम है, मनमानी हरकत भी की जा रही है। क्रूर शैली में जान तक ली जा रही है। विवाह नामक पारंपरिक, सांस्कृतिक संस्था जोखिम में है। ऐसा लगता है कि वचनों की मर्यादा जैसे जिंदगी की भूल-भुलैया में भटक रही है।

बदलाव सकारात्मक हो, मानवीय हो, तो इससे अच्छा क्या होगा। मगर बाजार की गिरफ्त में फंसी दुनिया में आए बदलावों ने सबसे ज्यादा परेशान मानवीय रिश्तों को किया है। किसी को नहीं पता कि विवाह के बंधन में उलझे इंसानी रिश्ते, कब तक कौन-सा रूप बनाए रखेंगे, कब अचानक बदल जाएंगे।

पति-पत्नी के रिश्तों के आयाम बदल रहे

यह नए तरह के विकास की ही ‘मेहरबानी’ है कि पति-पत्नी के रिश्तों के आयाम बदल रहे हैं और उनके बीच नई अपेक्षाएं पैदा हो रही हैं। फिल्में भी ऐसे रिश्ते-नातों के उतार-चढ़ावों को आकर्षक बना कर पेश कर रही हैं। अनेक धारावाहिक भी ऐसे सुलझते, उलझते रिश्तों के कारण खूब पसंद किए जा रहे हैं और वे सफल भी हो रहे हैं। यह समाज में आ रहे बदलाव से निर्मित स्वीकृति है।

विकास के एक मानक माने जा रहे मोबाइल के जरिए बनते वीडियो और तस्वीरों की दुनिया ने खूब मनोरंजन किया है, संप्रेषण को खूब बढ़ावा दिया है, सूचनाओं की अति कर दी है। डिजिटल संपर्क इतना हो गया है कि माहौल का मौसम संक्रमित हो गया। इस क्रम में संवाद की बार-बार हत्या होने लगी है।

जीवन की आचार संहिता और मूल्यों के नुकसान का ग्राफ बढ़ता गया है। भौतिकता इंसानी रिश्तों में बहुत गहरे घुसपैठ कर चुकी है। मानवीय रिश्तों से दिल दुखाता स्वार्थ लगातार रिसने लगा है। फिल्मों की कहानी जैसी अविश्वसनीय बातें आंखों के सामने घटनाएं बनने लगीं। कभी फिल्में सामाजिक घटनाओं और सच्चाइयों का आईना होती थीं, इंसान को उचित राह पर लौटने के लिए प्रेरित करती थीं।

मगर ऐसा लगता है कि अब फिल्में सिर्फ पैसा कमाने के लिए बनाई जा रही हैं और उनमें परोसी जा रही हिंसा, क्रूरता, नफरत और चापलूसी देखने का असर दिमाग पर हो रहा है।

युवाओं से लेकर बच्चों और महिलाओं पर बहुत दिख रहा प्रभाव

बदलते वातावरण का प्रभाव युवाओं से लेकर बच्चों और महिलाओं पर बहुत दिख रहा है। यह माहौल यही चाहता है कि महिलाएं नौकरी करे, पैसा कमाए, लेकिन साथ-साथ सुबह घर से निकलने से पहले या घर पर काम करते समय समूचे घर-परिवार का ध्यान रखे। इसके बाद फिर शाम को लौट कर घरेलू काम संभाले और सारी दुनियादारी भी निभाए। यानी दूसरों के लिए सुविधा बनी रहे। निरंतर त्याग करती रहे।

मगर अब महिलाएं भी बदल रही हैं। दबी-छिपी इच्छाओं की गली से निकल रही हैं। नौकरी या व्यवसाय करना चाहती हैं। अपने पांव पर खड़ी होकर रिश्तों के अपने चुनाव के रास्ते पर चल रही हैं। विवाह उनकी एकमात्र या आखिरी मंजिल नहीं। किसी दबाव या अन्य कारणों से शादी करती हैं, तो अपनी सुविधा के मुताबिक संतान प्राप्त करने का समय तय करती हैं।

प्रेम विवाह, सप्रेम न चल रहा हो, तो परिस्थिति अनुसार मानसिक रूप से अलग रहने लगती हैं। उसी पुरानी छत के नीचे नई छत बना लेती हैं। यानी त्याग का सूत्र वहां भी काम करता है, फिर चाहे वहां कई अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़े। जीवन में कलुष को पीछे छोड़ नई राह पर निकलने के सामाजिक, व्यक्तिगत और पारिवारिक खतरे भी रहते हैं। पसंदीदा और संवेदनशील व्यक्ति मिल जाए और जब तक समझ बनी रहे, तब तक आपसी समन्वय को जिंदगी संवारने, व्यक्तित्व सुधारने के नजरिए से देखा-समझा जा सकता है।

इस तरह का व्यवहार समाज में किसी की ओर से संभव है। कभी-कभी तो यह काफी हद तक खालिस व्यावसायिक भी हो सकता है। यहां भी विचारों का त्याग काम आता है। जिंदगी में वैचारिक उकताहट बढ़ जाए, तो त्याग का सूत्र कामयाब नहीं होता। नई छत का निर्माण नहीं, पुराना फर्श भी छोड़ने को तैयार रहना पड़ता है। त्याग दरअसल नफरत, बड़प्पन, प्रतिशोध संभालता कई स्वादों वाला व्यंजन है।

यह वियोग का उत्सव मनाने की तरह है, जिसमें आने वाले समय में मनचाही स्वतंत्रता के साथ, अकेले या किसी के संपर्क में रहना है। त्याग करना यानी जिंदगी से गैरजरूरी हटाना अपनी गुस्ताखियां कम करने जैसा है। इसे ही आजकल जीवन का सकारात्मक रास्ता माना जा रहा है। एक बार मिली जिंदगी में कुछ ऐसा ही किया जाए, जिससे मन को कुछ संतुष्टि और शांति का एहसास हो।

यह भी पढ़ें: जीवन के रंग: जीवन एक खाली कैनवास, हम इसमें रंग भरने वाले चित्रकार