हम अक्सर बचपन को नादान, मासूम और अबोध मान लेते हैं, लेकिन उम्र का यह पड़ाव हमें बहुत कुछ सिखाता है। हमने देखा होगा कि बच्चे कई बार किसी खिलौने से खेलते हुए ऊब जाते हैं और नया लेने की जिद करते हैं या फिर उसी से किसी नए रूप में खेलने लगते हैं।
उनकी यह हरकत एक शरारत होने के बजाय मनुष्य की एक बहुत सकारात्मक प्रकृति की ओर संकेत करती है। वह यह कि मनुष्य का स्वभाव अत्यंत जटिल होता है। वह जो कुछ भी रचता है, चाहे वे वस्तुएं हों, विचार हों या रिश्ते- एक समय के बाद उनसे ऊबने लगता है।
यह ऊब कभी-कभी बहुत नकारात्मक लगने लगती है, क्योंकि इसके कारण टूटन, असंतोष और पलायन की प्रवृत्ति जन्म लेती है। अगर गहराई से देखा जाए, तो यही ऊब मनुष्य को आगे बढ़ने, कुछ नया सोचने और बेहतर रचने की प्रेरणा भी देती है। प्रश्न यह नहीं है कि ऊब होना सही है या गलत, बल्कि यह है कि हम उस ऊब के साथ क्या करते हैं! उसे तोड़ते हैं या तराशते हैं!
दार्शनिक आर्थर शोपेनहावर ने कहा था, ‘मनुष्य या तो पीड़ा में होता है या ऊब में।’ इस कथन में जीवन का गहरा सत्य छिपा है। जब हमारे पास कुछ नहीं होता, तब हम उसके न होने की पीड़ा महसूस करते हैं और जब सब कुछ मिल जाता है, तब ऊब जाते हैं। यही द्वंद्व मनुष्य को निरंतर गतिशील बनाए रखता है। नए के लिए प्रेरित करते रहता है। देखा जाए तो ऊब विनाश नहीं, संभावनाओं के द्वार खोलती है।
इतिहास गवाह है कि मानव सभ्यता के कई आविष्कार ऊब की कोख से ही जन्मे हैं। जब मनुष्य एक ही ढर्रे पर जीते-जीते थक जाता है, तभी वह नए रास्ते खोजता है। पहिया, आग, लेखन, विज्ञान, तकनीक- ये सब किसी न किसी रूप में पुराने से असंतोष और ऊब के ही परिणाम हैं।
अगर मनुष्य संतोष की स्थिर अवस्था में ही ठहर जाता, तो शायद प्रगति की कहानी कभी लिखी ही न जाती। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था, ‘कल्पना ज्ञान से अधिक महत्त्वपूर्ण है।’ और कल्पना अक्सर तभी जन्म लेती है, जब वर्तमान स्थिति हमें अधूरी लगने लगती है। फिर उस अधूरेपन को दूर करने के लिए हम कुछ नया करने लग जाते हैं। यानी ऊब अगर सही दिशा में बहाई जाए, तो सृजन की नदी बन सकती है।
समस्या तब खड़ी होती है, जब यही ऊब मनुष्य के रिश्तों में प्रवेश कर जाती है। आज के समय में रिश्तों का व्यवहार वस्तुओं की तरह किया जाने लगा है। जब तक वे नए हैं, चमकदार हैं, तब तक ठीक हैं। जैसे ही उनमें पुरानापन आया, बदल दिए जाते हैं।
पति-पत्नी, मित्र, यहां तक कि माता-पिता और संतान के संबंध भी इस मानसिकता से अछूते नहीं रहे। प्रसिद्ध विचारक एरिक फ्राम ने अपनी पुस्तक ‘द आर्ट आफ लविंग’ में लिखा है कि ‘प्रेम एक कला है, जिसे सीखना और साधना पड़ता है।’ मगर हममें से अधिकांश लोग प्रेम को एक स्वाभाविक घटना मानकर उसे यों ही छोड़ देते हैं।
जब उसमें नयापन कम होने लगता है, तो हम प्रयास करने के बजाय उससे बाहर निकलने का रास्ता ढूंढ़ने लगते हैं। जबकि समझने की जरूरत है कि रिश्तों को तोड़ना आसान है, निभाना कठिन। आज तलाक, मित्रता में दरार और पारिवारिक विघटन के बढ़ते आंकड़े इस बात के प्रमाण हैं कि हम इस ऊब से लड़ने के बजाय उससे भागना चुन रहे हैं।
जबकि नैतिक दृष्टि से देखा जाए, तो किसी भी रिश्ते को तोड़ना अंतिम विकल्प होना चाहिए, पहला नहीं। संबंधों में मजबूती त्याग और समझ से आती है, अधिकार से नहीं।
रिश्ते केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि चेतन प्रयास से जीवित रहते हैं। जिस प्रकार एक पौधे को रोज पानी देना पड़ता है, उसी तरह रिश्तों को भी संवाद, समय और संवेदनशीलता की आवश्यकता होती है। नहीं तो उन्हें मुरझाते समय नहीं लगता। उनमें एक नयापन बनाए रखना चाहिए। यह नयापन कोई बाहरी वस्तु नहीं है, जिसे बाजार से खरीदा जा सके। बस नजरिया बदलने की जरूरत है। वही व्यक्ति, वही संबंध, पर देखने का नया तरीका।
एक साधारण उदाहरण लिया जा सकता है। पचास वर्षों से साथ रह रहे कोई वृद्ध दंपति का जीवन बाहर से देखने पर नीरस लग सकता है, लेकिन उनके छोटे-छोटे संवाद, साझा स्मृतियां और एक-दूसरे की मौन उपस्थिति ही उनका नयापन है। उन्होंने रिश्ते को बदलने की नहीं, बल्कि उसे गहराने की कोशिश की हमेशा। जिसके कारण वे उम्र के आखिरी पायदान तक साथ रहे।
प्रेम की परिपक्वता में चमक कम हो सकती है, पर गहराई अधिक होती है। इसलिए ऊब होने पर सबसे पहले स्वयं से प्रश्न करना चाहिए कि क्या सचमुच रिश्ता खोखला हो गया है, या मेरी ही अपेक्षाएं असंतुलित हो गई हैं? क्या मैं भी उतना ही दे रहा हूं, जितना चाहता हूं कि मुझे मिले? आज की संस्कृति ‘इंस्टैंट’ यानी तत्काल की है। तत्काल काफी, तत्काल खुशी, तत्काल रिश्ते। मगर नैतिकता हमें धैर्य सिखाती है। वह कहती है कि हर समस्या का समाधान त्याग नहीं, संवाद हो सकता है।
मनुष्य की ऊब न तो शत्रु है और न ही उसका दोष। वह एक संकेत है कि अब कुछ नया सोचा जाए। यह नई सोच तोड़ने में नहीं, संवारने में होनी चाहिए। आविष्कार हों, तो दुनिया के लिए और प्रयास हों, तो रिश्तों के लिए। यही कहा जा सकता है कि ऊब हमें रास्ता दिखाती है, लेकिन दिशा तो हम ही तय करते हैं। अगर हम उसे सृजन की ओर मोड़ें, तो वह प्रगति बन जाती है और यदि पलायन की ओर, तो विघटन। नैतिकता हमें यही सिखाती है कि जो टूट सकता है, उसे जोड़ने की कोशिश पहले की जाए।
