दुनिया संकट के मुहाने पर है। इसका कारण ट्रंप और पुतिन नहीं, हम स्वयं हैं। भौतिकता हमें इतनी रास आने लगी है कि हम उसका गुलाम बनने में अपनी सफलता मान रहे हैं। और यही ‘गुलामी’ हमें व्यक्तिवादी, मानसिक रूप से आलसी बनाती है और किसी भी प्रकार का जोखिम उठाने से रोकती है। इसी भौतिकता केंद्रित संस्कृति से उपजी भिन्न राजनीतिक संस्कृति को हम नापसंद तो करते हैं, पर नकारने की स्थिति में नहीं होते हैं। ट्रंप का अमेरिकी लोकतंत्र में फिर से उदय यही प्रमाणित करता है।

विकसित लोकतंत्र का दावा करने वाले देश के शीर्ष पर बैठे राजनेता मध्ययुगीन राजाओं की तरह व्यवहार कर रहे हैं। ताकत की भाषा ने तर्क की भाषा को पूरी तरह विस्थापित कर दिया है। ट्रंपवाद का मतलब है ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’। यह कोई कूटनीति नहीं है, बर्बर मध्ययुगीन संस्कृति है। युद्ध, मारकाट, चेतावनी, धमकी, अमर्यादित भाषा कथित विकसित लोकतंत्र के राजनयिकों का चरित्र हो गया है और हम उसे नियति मानकर स्वीकार कर रहे हैं।

प्रतिकार, संशोधन या असहमति का संगठित स्वर अंकुरित होने से पूर्व ही समाप्त हो जाता है। ऐसा नहीं है कि इन समस्याओं के बारे में लोग नहीं जानते हैं। पर समाधान के लिए मंथन तो दूर, पहल भी नहीं हो रही है।

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समाधान का सूत्र गणितीय नहीं होता है, जिसे लागू करते ही हम क्षण भर में इच्छित परिणाम तक पहुंच जाते हैं। यह समाजशास्त्रीय है। यह मनुष्य को फिर से मनुष्य बनाता है। यूरोप में मार्टिन लूथर से मार्टिन लूथर किंग (जूनियर) ने विवेकवाद को उभारा। इसमें तीन बातें है—भाग्यवादी सोच पर हमला, समानता के लिए आग्रह और विवेक के आधार पर घटनाओं, दर्शन और नायकों को परखने की क्षमता का विकास।

इनके समन्वय से वैज्ञानिक सोच और आलोचनात्मक दृष्टि विकसित होती है। इसकी कमी सर्वत्र महसूस की जा रही है। समाजशास्त्र, साहित्य और सुधारक की त्रिवेणी जब बहती है, तब नए दौर की शुरुआत होती है। वाल्तेयर (1694-1778) ने साहित्यिक लेखन से बदलाव को जन्म दिया। वे कैथोलिक चर्च की ताकत से घबराए नहीं। धर्म की आड़ में बढ़ती अराजक सोच, विभाजनकारी प्रवृतियों को उन्होंने निशाना बनाया।

व्यक्ति की अपनी अहमियत तब दिखाई पड़ने लगी, जब वह ‘विवेक’ और ‘वैज्ञानिक सोच’ को अपनाने लगा। फिर भेड़चाल थमने लगती है। थामस कार्लाइल, गोर्की, टाल्सटाय जैसे अनेक नाम हैं, जिन्होंने मनुष्य की जड़ता, सोच में यथास्थितिवाद और मस्तिष्क के आलस्य को खत्म किया।

यह मनुष्य को असहमत होने की ताकत देता है। असहमति तो होती है, पर मन के बाहर निकालकर सार्वजनिक करने की क्षमता नहीं होती है। लोकतंत्र में इसका केंद्रीय स्थान होता है। यह सूक्ष्म होता है, पर स्थूल के बुनियाद को हिला देता है। वैसे ही जैसे चींटी हाथी की सूंड़ में प्रवेश कर उसे बेचैन कर देती है।

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आंद्रेई सखारोव भौतिक विज्ञानी थे। पूर्व सोवियत संघ में उन्होंने व्यवस्था से असहमति का सवाल उठाकर उसे प्रतीकात्मक बना दिया। वे मानवाधिकार के प्रवक्ता बनकर उभरे। ठीक उसी प्रकार चेकोस्लोवाकिया में ताकतवर राजनीतिक व्यवस्था की वैधानिकता को वाकलाव हावेल की पुस्तक ‘द पावर आफ पावरलेस’ ने चुनौती दी थी।

आज संकट गहरा है। हमने भौतिक चमक-दमक को आधुनिक मनुष्य होने का एकमात्र विकल्प मान लिया है। मध्ययुग से आधुनिक युग में प्रवेश मनुष्य के आचरण, उसकी सोच और मस्तिष्क में परिवर्तन के कारण हुआ था। वह प्रक्रिया थम गई है।

भारत में समाज सुधार और साहित्य की भूमिका तो रही है, समाजशास्त्र अपने पांवों पर कभी खड़ा ही नहीं हुआ। साहित्य ही समाजशास्त्र की कमियों को कुछ हद तक भरता रहा है। प्रेमचंद से लेकर रामधारी सिंह दिनकर की प्रगतिशील लेखनी इसके प्रमाण हैं। राजा राममोहन राय से लेकर एम जी राणाडे मनुष्य के चिंतन में बदलाव की सामाजिक पहल करते रहे।

जब-जब सामाजिक-सांस्कृतिक पहल राजनीति के निकट गई, उसमें गिरावट आई।

बदलाव पर तब ग्रहण लगता है, जब सोच, चिंतन, दृष्टिकोणों का केंद्रीकरण हो जाता है। यह आलोचनात्मक प्रवृत्ति, जो विशेषता होती है, उसे अनपेक्षित बना देती है। भेड़चाल यहीं से शुरू होती है।

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साम्यवाद समाप्त हो गया, उसकी सोच का केंद्रीकरण उसके शत्रुओं ने भी उपयोगी मानकर अपना लिया है। रास्ता सोच के विकेंद्रीकरण में है। पश्चिम में क्लबों और भारत में सार्वजनिक स्थानों या खुले आसमान के नीचे बैठकर यह होता रहा है। वहां इसी ने ‘फेबियन समाजवाद’ को जन्म दिया, तो भारत में अद्वैत और नवन्याय का दर्शन विकसित हुआ।

भौतिकता के अपने हथियार होते हैं। यह मनुष्य को दूसरे प्रकार का व्यक्तिवादी बनाता है। मध्ययुग के बाद जो व्यक्तिवाद आया, उसमें व्यक्ति अपने अस्तित्व को विवेक और असहमति के अधिकारों में देखता था। अब जो व्यक्तिवाद है, उसमें वह स्वयं के भौतिक सुख के लिए सब कुछ, जिसमें पारिवारिक, सामुदायिक जिम्मेदारी होती है, को नकारने में देखता है।

भौतिकता आर्थिक संस्कृति की सर्वोच्चता स्थापित कर साहित्य, समाजशास्त्र और सुधार को भी अपने अधीनस्थ कर लेती है। राजाओं के किसी ‘नवरत्न’ ने समाज को सूक्ष्म या स्थूल स्तर पर बदलने वाली रचना नहीं की है।

दुनिया में बदलाव का नेतृत्व हमेशा विश्वविद्यालय परिसर के बाहर के बौद्धिकों द्वारा हुआ है। आज जब मनुष्य संकट से जूझ रहा है, तब नाम का डंका पीटने वाले आक्सफोर्ड, कैम्ब्रिज, हावर्ड विश्वविद्यालयों के बौद्धिक असहमति का वैकल्पिक दर्शन देने की बात तो दूर, अपने आपको बचाने में ही अपना बौद्धिक पसीना बहा रहे हैं।

विश्वविद्यालय करिअरवाद की बुनियाद रखता है। जो अपवादस्वरूप इससे बच निकलते हैं, वे ही परिवर्तन के सारथी बनते हैं। आज पूंजीवाद के विकृत रूप ने मनुष्य को वैज्ञानिक चिंतन और आलोचनात्मक दृष्टि के स्व-समर्पण के लिए वातावरण पैदा कर दिया है। यह नस्ल, धर्म, जाति एवं संकीर्ण पहचानों के प्रवक्ताओं और आंदोलनों को सहायता तथा समर्थन देता है। वहीं यह आज के साहित्य और समाजशास्त्र का संगीत बनकर दुनिया के कानों को सुख दे रहा है। इसे तोड़ना ही विवेकवाद का जन्म होगा।