अंतरिक्ष अब मानव सभ्यता की दूरस्थ सीमा नहीं रहा। आज यह हमारे रोजमर्रा के जीवन, राष्ट्रीय सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और भू-राजनीति का अभिन्न हिस्सा बन चुका है। संचार उपग्रहों से लेकर मौसम पूर्वानुमान, आपदा प्रबंधन और सैन्य निगरानी तक, आधुनिक दुनिया की धड़कन अंतरिक्ष से जुड़ी है। मगर इसी प्रगति के साथ एक ऐसा संकट भी जन्म ले चुका है, जिस पर गंभीरता से चर्चा नहीं होती। वह है-अंतरिक्ष में बढ़ रहा कचरा और उससे अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा को खतरे का मसला। यह केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि मानव जीवन, वैश्विक सहयोग और भविष्य की अंतरिक्ष नीति से जुड़ा प्रश्न है। आज जब दुनिया चंद्रमा, मंगल और उससे आगे मानव की उपस्थिति को लेकर योजना बना रही है, तब यह पूछना अनिवार्य हो जाता है कि क्या हमने पृथ्वी के आसपास के अंतरिक्ष को सुरक्षित रखा है?
पिछले छह दशकों में अंतरिक्ष गतिविधियों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। हजारों उपग्रह, सैकड़ों प्रक्षेपण और अनगिनत प्रयोग। इन सबका एक अनचाहा परिणाम है-अंतरिक्ष में फैल रहा मलबा। निष्क्रिय उपग्रह, टकराव से बने टुकड़े और सूक्ष्म कण आज पृथ्वी की कक्षा में एक अनियंत्रित जाल की तरह फैल चुके हैं। समस्या केवल संख्या की नहीं, बल्कि शृंखलाबद्ध खतरे की है। दो वस्तुओं की टक्कर से मलबा और बढ़ता है, जो आगे और टकराव को जन्म देता है। वैज्ञानिक इसे ‘केसलर सिंड्रोम’ कहते हैं। यानी एक ऐसी स्थिति, जहां कक्षा में मलबा इतना बढ़ जाए कि अंतरिक्ष गतिविधियां ही असंभव हो जाएं। इस परिदृश्य में सबसे पहले और सबसे ज्यादा खतरे में होंगे मानवयुक्त मिशन और अंतरिक्ष यात्री।
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशनमानव सभ्यता की सबसे जटिल संरचना
अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (आइएसएस) मानव सभ्यता की सबसे जटिल संरचना है। मगर यह उपलब्धि भी एक असुरक्षित वातावरण में टिकी है। लगभग चार सौ किलोमीटर की ऊंचाई पर यह स्टेशन उसी कक्षा में है, जहां सबसे अधिक मलबा मौजूद है। यह विडंबना ही है कि अत्याधुनिक तकनीक से लैस अंतरिक्ष यात्री एक ऐसे वातावरण में काम करते हैं, जहां पेंट का एक कण भी प्राणघातक बन सकता है। सात से आठ किलोमीटर प्रति सेकंड की रफ्तार से घूमता मलबा किसी भी मानवीय प्रतिक्रिया से कहीं तेज है। यानी खतरे की स्थिति में निर्णय का समय सेकंड से भी कम होता है। यहां यह सवाल उठता है कि क्या हम अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा को केवल तकनीकी प्रबंधन का विषय मान कर संतुष्ट हो सकते हैं या यह एक गहरे नीति-स्तरीय हस्तक्षेप की मांग करता है?
आज अंतरिक्ष मलबे से बचाव का सबसे अहम आधार है- निगरानी और पूर्व चेतावनी। शक्तिशाली रडार और दूरबीन हजारों वस्तुओं की निगरानी करते हैं। मगर इस व्यवस्था की एक मौलिक सीमा है। केवल बड़े टुकड़ों का ही सटीक रूप से पता किया जा सकता है। लाखों छोटे कण ऐसे हैं, जो निगरानी तंत्र से बाहर हैं। मगर उनके टकराने की संभावना बनी रहती है। इसका अर्थ यह हुआ कि अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा एक आंशिक जानकारी पर आधारित है, पूर्ण नियंत्रण पर नहीं। जब पृथ्वी की कक्षा में घूमता कोई अंतरिक्ष मलबा अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन के बहुत पास से गुजरने वाला होता है, तब स्टेशन की कक्षा को थोड़ी देर के लिए बदला जाता है।
यह उपाय अब अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षा का एक नियमित हिस्सा बन चुका है। मगर यही तथ्य अपने-आप में यह बताने के लिए काफी है कि अंतरिक्ष कचरे की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है। कक्षा बदलना देखने में भले ही एक छोटा सा तकनीकी कदम लगे, लेकिन इसके पीछे बड़ी कीमत छिपी होती है। अंतरिक्ष स्टेशन अपने आप नहीं घूमता, बल्कि उसे सही कक्षा में बनाए रखने के लिए लगातार ईंधन की जरूरत पड़ती है। जब भी स्टेशन को ऊपर या नीचे किया जाता है, तो इंजन चलाए जाते हैं। इससे कीमती ईंधन खर्च होता है। यह ईंधन सीमित होता है और भविष्य की आपात स्थितियों के लिए भी बचा कर रखना पड़ता है। यानी हर बार कक्षा बदलने से स्टेशन की जीवन अवधि थोड़ी कम हो जाती है। इसका दूसरा असर स्टेशन के संसाधनों पर पड़ता है। कक्षा बदलने की प्रक्रिया के दौरान वैज्ञानिक प्रयोगों को रोकना पड़ता है।
दीर्घकालिक अभियानों के लिए समस्या और भी गंभीर
दीर्घकालिक अभियानों के लिए यह समस्या और भी गंभीर हो जाती है। अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन को दशकों तक काम करने के लिए तैयार किया गया है। मगर बार-बार होने वाले कक्षा परिवर्तन उसकी संरचना, उपकरणों और योजनाओं पर दबाव डालते हैं। जितनी बार ऐसे बदलाव होंगे, उतना ही अधिक जोखिम भविष्य के अभियानों के लिए पैदा होगा। दूसरे शब्दों मे कहें तो मलबे से बचने की कोशिश करते-करते हम खुद अपनी अंतरिक्ष क्षमता को सीमित कर रहे हैं। सबसे अहम बात यह है कि कक्षा बदलना समस्या का समाधान नहीं, बल्कि उसका अस्थायी इलाज है। अंतरिक्ष स्टेशन की कक्षा बदलने की बढ़ती घटनाएं एक बड़ी चेतावनी हैं। वे बताती हैं कि अंतरिक्ष में कचरे का बढ़ता दायरा अब भविष्य का खतरा नहीं, बल्कि वर्तमान की समस्या बन चुका है।
इसलिए कक्षा बदलने को तकनीकी सफलता मानने के साथ-साथ इसे एक चेतावनी संकेत के रूप में भी देखना जरूरी है कि अंतरिक्ष को हमने जितनी तेजी से इस्तेमाल किया है, उतनी ही तेजी से उसे साफ और सुरक्षित बनाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी। हालांकि अंतरिक्ष स्टेशन को विशेष ढालों से सुरक्षित किया गया है, जो छोटे मलबे को झेल सकती हैं, लेकिन बड़ा मलबा अब भी गंभीर खतरा बना हुआ है। आपात स्थितियों के लिए अंतरिक्ष यात्रियों को कठोर प्रशिक्षण दिया जाता है। मगर यह प्रशिक्षण भी उस स्थिति में सीमित हो जाता है, जब टकराव अचानक और विनाशकारी हो। अंतरिक्ष में बढ़ते कचरे से निपटने का स्थायी समाधान बचाव नहीं, बल्कि सफाई है। मगर यही वह बिंदु है, जहां वैश्विक राजनीति और राष्ट्रीय हित आड़े आ जाते हैं। किसका मलबा हटाया जाए? कौन खर्च उठाए? क्या किसी देश का निष्क्रिय उपग्रह दूसरे देश द्वारा हटाया जा सकता है? ये सवाल तकनीक से ज्यादा राजनीतिक हैं। जब तक अंतरिक्ष को साझा विरासत मान कर संयुक्त जिम्मेदारी तय नहीं की जाती, तब तक मलबा हटाने की पहल सीमित प्रयोगों तक ही सिमटी रहेगी।
अंतरिक्ष मानवता की साझा संपदा
भारत गगनयान मिशन की ओर बढ़ रहा है। इसका अर्थ है कि अंतरिक्ष मलबा अब भारत के लिए भी सैद्धांतिक नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष मानवीय जोखिम बन चुका है। यह चेतावनी भी है और अवसर भी। चेतावनी इसलिए कि लापरवाही भविष्य में भारी पड़ सकती है। अवसर इसलिए कि भारत जिम्मेदार और नैतिक अंतरिक्ष शक्ति के रूप में वैश्विक नेतृत्व दिखा सकता है। अंतरिक्ष मानवता की साझा संपदा है, न किसी एक देश की और न किसी एक पीढ़ी की। इसने हमें संचार, विज्ञान और भविष्य के सपने दिए हैं, लेकिन आज वही अंतरिक्ष मलबे से भरता जा रहा है। अंतरिक्ष को गंदा करना आसान है, पर सुरक्षित रखना कठिन। इसके लिए दूरदर्शिता चाहिए, ताकि तात्कालिक लाभ से ऊपर उठकर भविष्य को बचाया जा सके। संयम चाहिए, ताकि हर देश जिम्मेदारी से व्यवहार करे और वैश्विक सहयोग चाहिए, क्योंकि अंतरिक्ष किसी सीमा में नहीं बंधा है।
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