देश में एक ओर नारी शक्ति वंदन अधिनियम और ‘बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान के जरिए महिला सशक्तीकरण की दिशा में कदम आगे बढ़ाए जा रहे हैं, दूसरी तरफ समाज में कुछ प्रथाएं और संकीर्ण मानसिकता आज भी मौजूद हैं, जो लड़कियों को शिक्षित और आत्मनिर्भर बनने से वंचित कर देती हैं। हाल में राजस्थान के भरतपुर जिले में एक लड़की की मर्मस्पर्शी कहानी सामने आई। वह रोज सुबह स्कूल के दरवाजे तक जाती और वहीं से लौट आती थी। एक दिन वजह पूछने पर उसने बताया कि मां का कहना है कि पढ़ाई बेटियों के लिए नहीं होती है। उसके घर में पीढ़ियों से यह तय है कि लड़कियां पढ़ें नहीं, बल्कि घर चलाने में मदद करें। बाहर से देखने पर यह मदद नाच-गाने की लगती है, पर असल में यह एक खास सामाजिक वर्ग में प्रचलित ‘बेड़िया प्रथा’ है। यह एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था है, जहां बेटियों की जिंदगी परिवार की परंपरा के बोझ तले कुचल जाती है।

झालावाड़ जिले की एक अन्य लड़की की भी इसी तरह की दास्तान सामने आई थी। वह तेरह वर्ष की थी, जब उसे कला सिखाने के बहाने नाच-गाने के कार्यक्रमों में भेजा जाने लगा। धीरे-धीरे उसे समझ आया कि यह कोई कला नहीं, बल्कि मजबूरी की जंजीर है। वर्ष 2018 में एक गैर सरकारी संगठन की मदद से उसे आवासीय विद्यालय में दाखिला मिला।

दरअसल, जिस वर्ग में यह बेड़िया प्रथा प्रचलित है, उसके बारे में माना जाता है कि यह मूलत: घुमंतू या अर्ध-घुमंतू समुदाय है। इसकी मध्य भारत (मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश), राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में उपस्थिति रही है। बेड़िया समुदाय का इतिहास लोकनृत्य और गायन से जुड़ा रहा है। यह समुदाय पहले मेलों, राजदरबारों और सामाजिक कार्यक्रमों में नाच-गाने का काम करता था, लेकिन सामाजिक ढांचा बदलने लगा और आर्थिक अवसर सीमित हुए, तब यह पेशा गरीबी का माध्यम बन गया। अशिक्षा और सामाजिक तिरस्कार ने इस समुदाय को ऐसी स्थिति में पहुंचा दिया कि उनके नाच-गाने के पेशे पर शोषण और देह व्यापार की काली छाया पड़ गई। अब यह कुप्रथा पीढ़ी दर पीढ़ी चलने वाली परंपरा के रूप में स्थापित हो चुकी है, जहां बेटियां अपने परिवारों की आर्थिक जिम्मेदारी ढोने के लिए शोषण का शिकार हो जाती हैं।

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बेड़िया प्रथा एक ऐसी सामाजिक व्यवस्था को दर्शाती है, जहां महिलाएं और बेटियां परंपरा, गरीबी तथा मजबूरी के नाम पर अपने अधिकारों और गरिमा से वंचित कर दी जाती हैं। इस प्रथा में एक ऐसी विकृत प्रवृत्ति देखने को मिलती है, जहां कई परिवार अपनी बेटियों को आर्थिक साधन के रूप में देखने लगते हैं और बाद में उन्हें देह व्यापार में धकेल दिया जाता है। इस प्रकार, बेटियों की शिक्षा, स्वास्थ्य, गरिमा और समान अवसर सब पीछे छूट जाते हैं। इस प्रथा का एक प्रत्यक्ष सामाजिक असर यह है कि बेड़िया समुदाय की महिलाएं न तो समाज में पूर्ण रूप से स्वीकार की जाती हैं और न ही उन्हें स्थायी आजीविका के अवसर मिल पाते हैं। इस वजह से आज भी यह कुप्रथा बेहद भयानक रूप में जिंदा है। बेड़िया समुदाय की लड़कियां आमतौर पर शिक्षा से वंचित हैं और छोटी उम्र में ही इस प्रथा में झोंक दी जाती हैं। यह सामाजिक और मानव अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है।

संयुक्त राष्ट्र की एक रपट के अनुसार, भारत में महिला तस्करी और यौन शोषण के मामलों में सबसे अधिक पीड़ित वर्ग वे महिलाएं हैं, जो पारंपरिक रूप से ऐसे समुदायों से आती हैं। यह स्थिति भारत में लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण की दिशा में हो रहे प्रयासों को चुनौती देती है। अगर राजस्थान की बात करें, तो यहां बेड़िया समुदाय की स्थिति विकट है। भरतपुर, धौलपुर, कोटा, बूंदी, झालावाड़ और सवाई माधोपुर जिलों में इस समुदाय के परिवार बड़ी संख्या में पाए जाते हैं। एक अध्ययन के अनुसार, भरतपुर जिले के एक गांव में लगभग 70 बेड़िया परिवारों में से 58 परिवारों ने अपनी बेटियों को इस प्रथा में झोंक दिया है। इसी तरह पांची के नगला गांव में वर्ष 2004 से 2012 के बीच 27 मामले दर्ज हुए, जहां लड़कियों को पारंपरिक रूप से इस पेशे में धकेला गया।

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राजस्थान महिला आयोग और ग्रामीण शिक्षा संस्थान की एक रपट में पाया गया कि बेड़िया समुदाय में महिला साक्षरता दर केवल इक्कीस फीसद है और अधिकांश लड़कियां 14-16 वर्ष की उम्र में स्कूल छोड़ देती हैं। वहीं राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की वर्ष 2023 की रपट के अनुसार, राजस्थान में कुल 363 मानव तस्करी के मामले पाए गए, जिनमें से 98 फीसद बच्चे थे। इनमें बड़ी संख्या उन समुदायों से आती है, जहां बेड़िया समुदाय जैसी प्रथाएं सामाजिक रूप में मौजूद हैं। इसी तरह राष्ट्रीय महिला आयोग की वर्ष 2024 की रपट से पता चलता है कि राजस्थान में लगभग 8,000 से 10,000 लड़कियां ऐसे पेशे से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जुड़ी हुई हैं। इनमें से अधिकांश दलित या घुमंतू जनजातीय समुदाय से हैं, जिनमें बेड़िया भी शामिल है। राजस्थान के कोटा और बूंदी, मध्य प्रदेश के मुरैना और श्योपुर तथा उत्तर प्रदेश के झांसी जिलों में यह प्रथा गहराई से जमी हुई है। इन क्षेत्रों में महिला साक्षरता दर राष्ट्रीय औसत से बेहद कम है। जहां राष्ट्रीय स्तर पर महिला साक्षरता दर लगभग 70 फीसद है, वहीं इन क्षेत्रों में यह मुश्किल से 35-40 फीसद तक है। इसका सीधा प्रभाव आने वाली पीढ़ियों पर पड़ता है।

हालांकि अब बदलाव की बयार भी चल पड़ी है। राजस्थान सरकार ने एक नई योजना और ‘मिशन परिवर्तन’ के तहत इस समुदाय की महिलाओं के लिए रोजगार एवं शिक्षा के अवसर बढ़ाए हैं। केंद्र सरकार ने स्वाधार गृह योजना और बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ जैसे कई अभियान के तहत कुछ कार्यक्रम शुरू किए हैं, जिनका उद्देश्य इन महिलाओं को पुनर्वास, शिक्षा और आत्मनिर्भरता की ओर ले जाना है। कोटा जिले में वर्ष 2022 में उज्ज्वला केंद्र शुरू किया गया, जहां बेड़िया समुदाय की चालीस से अधिक महिलाओं को प्रशिक्षण और सुरक्षा दी गई। स्वाधार गृह योजना के माध्यम से कई महिलाओं को पुनर्वास मिला। इसके अलावा, प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना इन महिलाओं को वैकल्पिक रोजगार के अवसर उपलब्ध कराती हैं। वहीं कई गैर सरकारी संगठन इन समुदायों में जाकर शिक्षा केंद्र और पुनर्वास शिविर चला रहे हैं।

इसी तरह राजस्थान में भरतपुर के घाटोली में पंचायत ने वर्ष 2022 में सार्वजनिक घोषणा की कि कोई भी परिवार नाबालिग लड़कियों को शहर न भेजे, अन्यथा प्रशासनिक कार्रवाई होगी। धौलपुर के सायपुर में वर्ष 2023 में पंचायत ने रात्रि सर्वे शुरू किया। जिन घरों से लड़कियां लगातार बाहर भेजी जा रही थीं, उन्हें नोटिस दिया गया। वर्ष 2024 में कोटा के एक खंड में सुरक्षा रजिस्टर लागू किया गया, जिसके तहत समुदाय की हर लड़की की शिक्षा, स्वास्थ्य एवं सुरक्षा की निगरानी की जा रही है। अगर इस तरह के प्रयासों को और व्यापक किया जाए तो, आने वाले समय में बेड़िया समुदाय के बीच प्रचलित या अन्य ऐसी प्रथाओं को जड़ से कमजोर किया जा सकता है। याद रखना होगा कि कोई भी परंपरा या प्रथा जन्म से नहीं, परिस्थितियों से बनती है। जब साहस, शिक्षा और सहयोग मिल जाए, तो सबसे पुरानी बेड़ियों को भी तोड़ा जा सकता है। जब तक हर बेटी को अपनी जिंदगी का निर्णय लेने की आजादी नहीं मिलेगी, तब तक महिला सशक्तीकरण के सारे नारे अधूरे ही रहेंगे।